झारखंड नथवाणी के लिए विकास, विश्वास, समर्पण और नि:स्वार्थ भाव का केंद्र रहा
-परिमल नथवाणी की 2026 में वापसी, विकास के नये अध्याय का शंखनाद

राजनीति में अक्सर लोग सत्ता के लिए जुड़ते हैं, लेकिन कुछ विरले ही होते हैं, जो किसी माटी को अपनी ‘कर्मभूमि’ और वहां के लोगों को अपना परिवार मान लेते हैं। कुछ जगहों पर जाना महज एक दौरा होता है, लेकिन कुछ जगहों पर लौटनाअपने घर लौटने जैसा लगता है। इतिहास और राजनीति के पन्नों में अक्सर विकास के वादे और चुनावी दौरे दर्ज होते हैं, लेकिन जब कोई जनप्रतिनिधि किसी राज्य की मिट्टी से भावनात्मक रूप से जुड़ जाये, तो वह कहानी खास बन जाती है। परिमल नथवाणी के लिए झारखंड हमेशा से वही घर रहा है। 2008 से 2020 तक उन्होंने न सिर्फ राज्यसभा में इस राज्य की आवाज बुलंद की, बल्कि अपने निजी संसाधनों से यहां के गांवों, आदिवासियों और आम लोगों के जीवन में एक मूक क्रांति ला दी। उन्होंने इस दौरान राज्य का प्रतिनिधित्व करने से लेकर, अपने निजी कोष से करोड़ों खर्च कर गांवों की तस्वीर बदलने और संकट के समय आम आदमी के साथ खड़े रहने तक जो कुछ किया, उनका यह समर्पण बेमिसाल रहा है। वर्ष 2026 में उनकी यह झारखंड वापसी महज एक राजनीतिक घटनाक्रम नहीं है, यह उस अटूट रिश्ते के एक नये अध्याय की शुरूआत है, जिसकी नींव उन्होंने पिछले डेढ़ दशक में अपने नि:स्वार्थ काम और जनता के प्रति अपनी प्रतिबद्धता से रखी है। झारखंड और परिमल नथवाणी के इस बेमिसाल रिश्ते की कहानी को साझा कर रहे हैं आजाद सिपाही के संपादक राकेश सिंह।

-परिमल नथवाणी और झारखंड: एक अटूट रिश्ते और समर्पण की कहानी
कुछ जगहों की यात्रा केवल एक दौरा होती है, लेकिन कुछ जगहों पर लौटना अपनी जड़ों की ओर लौटने जैसा, यानी घर लौटने जैसा महसूस होता है। परिमल नथवाणी और झारखंड राज्य के बीच का संबंध कुछ ऐसा ही गहरा और आत्मीय रहा है। वर्ष 2008 से 2020 तक लगातार राज्यसभा में झारखंड का प्रतिनिधित्व करते हुए, उन्होंने यह साबित किया कि उनका इस धरती और यहां के लोगों के साथ जुड़ाव केवल एक राजनीतिक या औपचारिक दायित्व नहीं था। यह जुड़ाव यहां के लोगों के संघर्ष, उनके सपनों और उनकी आकांक्षाओं के साथ रहा। उन्होंने झारखंड को महज अपना कार्यक्षेत्र नहीं, बल्कि अपनी सच्ची कर्मभूमि माना।

-ग्रामीण विकास और ‘आदर्श ग्राम’ का जमीनी मॉडल
परिमल नथवाणी ने अपना ध्यान केवल शहरों तक सीमित नहीं रखा, बल्कि झारखंड की आत्मा यानी इसके गांवों को सशक्त बनाने का बीड़ा उठाया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ‘आदर्श ग्राम योजना’ से प्रेरित होकर, उन्होंने जिन पंचायतों को गोद लिया, वहां बदलाव केवल फाइलों में दर्ज नहीं हुआ, बल्कि जमीन पर साकार हुआ। काम दिखा और लोगों ने सराहा। लोगों की जिंदगी में खुशहाली आयी। जीवन सुलभ बना।

-जराटोली-बड़ाम, चुट्टू और बरवादाग पंचायत का काय कल्प
परिमल नथवाणी के कार्यकाल में इन क्षेत्रों के विकास के लिए सात करोड़ रुपये से अधिक की धनराशि खर्च की गयी। इस निवेश से न केवल बुनियादी ढांचे का विकास हुआ, बल्कि स्थानीय लोगों के लिए लगभग 90 हजार मानव दिवस का रोजगार भी सृजित हुआ। इन पंचायतों में पक्की सड़कें, स्वच्छ पेयजल, प्रकाश की व्यवस्था और स्वच्छता अभियान जैसे कार्य युद्ध स्तर पर किये गये, जिससे ग्रामीणों का जीवन स्तर उल्लेखनीय रूप से ऊपर उठा।

-सांसद निधि के साथ-साथ अपने निजी कोष को भी जनता के लिए खोल दिया
एक स्वस्थ समाज ही एक मजबूत राज्य की नींव रख सकता है। इस विचार को धरातल पर उतारने के लिए परिमल नथवाणी ने सांसद निधि के साथ-साथ अपने निजी कोष को भी जनता के लिए खोल दिया।

-रातू रोड अस्पताल का जीर्णोद्धार
रांची नगर निगम के अंतर्गत आने वाला रातू रोड स्थित अस्पताल एक समय जर्जर स्थिति में था। परिमल नथवाणी ने इसके पुनर्निर्माण और आधुनिकीकरण के लिए अपने निजी कोष से एक करोड़ रुपये से अधिक का योगदान दिया, ताकि आम आदमी को बेहतर चिकित्सा सुविधाएं मिल सकें। वहीं इस्लाम नगर बस्ती में पार्क, स्वास्थ्य और शिक्षा संबंधी सुविधाओं के लिए भी निजी संसाधनों से योगदान लिया।

-संकटमोचक की भूमिका
वर्ष 2011 में जब इस्लाम नगर बस्ती के निवासियों पर बेघर होने का बड़ा संकट मंडरा रहा था, तब वे एक सच्चे जनप्रतिनिधि की तरह उनके साथ खड़े हुए। उन्होंने प्रभावित और असहाय परिवारों की आवाज को सड़क से लेकर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग और सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचाया और उन्हें न्याय दिलाने के लिए लंबी कानूनी लड़ाई में उनका संबल बने।

-आदिवासी और सामाजिक कल्याण
झारखंड की पहचान यहां की समृद्ध आदिवासी संस्कृति से है। परिमल नथवाणी ने आदिवासी समुदायों की शिक्षा, स्वास्थ्य और खेलकूद को बढ़ावा देने के लिए करोड़ों रुपये खर्च किए। उनका मानना है कि अगर यहां के युवाओं को सही मंच और संसाधन मिलें, तो वे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर राज्य का नाम रोशन कर सकते हैं। सरना स्थलों का सौंदर्यीकरण, धुमकुड़िया भवनों का निर्माण और पारंपरिक त्योहारों में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेने की परिपार्टी जो उन्होंने स्थापित की, वह अनुकरणीय है।

-एक नये अध्याय का शंखनाद
झारखंड के साथ परिमल नथवानी का यह रिश्ता केवल एक नेता और जनता का नहीं है। यह विश्वास, गहरी संवेदना और नि:स्वार्थ समर्पण की कहानी है। वर्ष 2026 में परिमल नथवाणी की झारखंड वापसी को महज एक राजनीतिक घटनाक्रम के रूप में नहीं देखा जा सकता। यह उस अटूट रिश्ते के एक नये अध्याय की शुरूआत है, जिसकी नींव उन्होंने पिछले डेढ़ दशक में अपने काम, अपने निजी योगदान और जनता के प्रति अपनी प्रतिबद्धता से रखी है। उनकी यह वापसी उन विकास कार्यों को फिर से गति देने और झारखंड के लोगों के अधूरे सपनों को पूरा करने का एक नया संकल्प है। इसका परिचय उन्होंने दे भी दिया है, जब राज्यसभा के लिए चुने जाने के बाद से उनकी टीम झारखंड की समस्याओं के अध्ययन में जुट गयी है। खुद नथवाणी इसकी मॉनिटरिंग कर रहे हैं।

Share.
Leave A Reply

Exit mobile version