रांची। राज्यसभा सांसद महेश पोद्दार ने 15वें वित्त आयोग को पत्र लिखकर झारखंड को अधिकाधिक आर्थिक संरक्षण और वाजिब हिस्सेदारी देने की मांग की है। 15वें वित्त आयोग के अध्यक्ष को लिखे पत्र में महेश पोद्दार ने आवंटन की अब तक की प्रणाली में व्याप्त विसंगतियों का जिक्र किया है और वैज्ञानिक एवं नीड बेस्ड आवंटन पद्धति अपनाने के लिए सुझाव भी दिये हैं। महेश पोद्दार ने कहा कि वैसे खनिजों के उत्पादन को जिनका मूल्यवर्द्धन करनेवाले कारखाने अन्य राज्यों में हैं, राज्य की जीडीपी में शामिल नहीं किया जाना चाहिए। खनिजों के उत्पादन को राज्य की जीडीपी में तभी जोड़ा जाये, जब उनका मूल्यवर्द्धन और इस्तेमाल राज्य में ही हो रहा हो। इससे हो यह रहा है कि आर्थिक लाभ किसी अन्य राज्य को मिल रहा है, झारखंड को केवल रॉयल्टी मिल रही है, लेकिन राज्य की जीडीपी में वृद्धि का भ्रम उत्पन्न होता है।
नीलामी से प्राप्त राजस्व जनसेवाओं के रूप में भी हो
महेश पोद्दार ने कहा कि खदानों की नीलामी से राज्य को प्राप्त राजस्व नकद के साथ-साथ जनसेवाओं के रूप में भी हो। इस प्रक्रिया के माध्यम से खनिज उत्पादक द्वारा सीधे-सीधे आम जनता के लिए मौलिक सुविधाओं का सृजन होगा, जो अंतत: देश की उत्पादकता बढ़ाने में सहायक होगा। कहा कि इसी प्रकार की समस्या औद्योगिक संयंत्रों और राष्ट्रीय स्तर के संस्थानों के मामले में भी है। उदाहरण के रूप में दामोदर घाटी निगम के अधिकांश ताप विद्युत संयंत्र, अधिकांश जलागार, अधिकांश जल विद्युत संयंत्र झारखंड में हैं, लेकिन निगम का मुख्यालय राज्य में नहीं होने की वजह से झारखंड अर्जित राजस्व के एक बड़े हिस्से से वंचित हो जाता है। शहरी विकास योजनाओं के लिए निर्गत राशि राज्य सरकार को न भेजकर सीधे संबंधित नगर निकायों को भेजी जानी चाहिए।
सब्जी उत्पादन किसानों का बड़ा आर्थिक आधार
सब्जियों के उत्पादन में झारखंड अग्रणी है, लेकिन उत्पादित सब्जियों को लंबे समय तक सुरक्षित रखने का पर्याप्त इंतजाम नहीं होने की वजह से कृषकों द्वारा इन्हें सड़क पर फेंककर बर्बाद कर देना पड़ता है, या फिर लागत मूल्य से भी कम कीमत पर बेचने को विवश होना पड़ता है। यदि कोल्ड चेन उपलब्ध कराकर कृषकों को उत्पादित सब्जियां लंबे समय तक सुरक्षित रखने और बाजार में अच्छी कीमत मिलने पर बेचने की सुविधा दे दी जाये, तो सब्जी उत्पादन झारखंड के किसानों का एक बड़ा आर्थिक आधार बन सकता है। अगर वित्त आयोग का समर्थन मिले, तो राज्य सरकार अनाजों की तरह ही सब्जियों के लिए भी उत्पादन लागत का डेढ़ गुणा न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित कर सब्जियां खरीद सकती है और वेजफेड के माध्यम से उसका विपणन कर सकती है।
किसानों को कम कीमत पर बेचनी पड़ती है फसल
झारखंड की कृषि योग्य भूमि एक फसली है, पैदावार भी कम होती है और मार्केटिंग संबंधी सुदृढ़ ढांचा उपलब्ध ना होने की वजह से किसानों को कम कीमत पर फसल बेचनी पड़ती है। इससे कृषकों की अवस्था खराब हो रही है। बेहतर होगा कि इनके लिए कोई उत्कृष्ट फंडिंग पैटर्न अपनाया जाये, ताकि वे कृषि से विमुख होने को विवश ना हों। महिलाओं को कम पारिश्रमिक वाले रोजगार की बजाय उच्च पारिश्रमिक वाले रोजगार से जोड़ना श्रेयस्कर हो सकता है। इसके लिए उन्हें स्वास्थ्य परिचारिका का प्रशिक्षण उपलब्ध कराना एक उत्कृष्ट जरिया होगा।