बुजुर्गों का सम्मान और युवाओं का स्वाभिमान बनाये रखने की अहम चुनौती
दिन: शनिवार। समय: दोपहर एक बजे। स्थान: रांची का बिरसा मुंडा एयरपोर्ट। हजारों की भीड़। यह भीड़ मात्र तमाशबीन नहीं थी, बल्कि झारखंड कांग्रेस के नये अध्याय की शुरूआत की गवाह बनने आयी थी। भले ही 28 अगस्त को रांची के अन्य इलाकों में आम दिनों की तरह ही चहल-पहल रही होगी, लेकिन रांची एयरपोर्ट का नजारा कुछ अलग था। एयरपोर्ट से एक किलोमीटर पहले से ही गाड़ियों की कतार और उमड़ा जनसैलाब देखनेवालों की रगों में उत्कंठा पैदा कर रहा था। इतिहास गवाह है कि जब-जब जनसैलाब उमड़ा है, तब-तब एक नये दौर की शुरूआत हुई है। इसी जनसैलाब के बढ़ते कदमों के साथ देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस झारखंड में कदमताल करते हुए नये दौर में प्रवेश कर रही थी। अपने नेताओं के स्वागत के लिए कांग्रेसी कार्यकर्ताओं का इतनी संख्या में जुटना झारखंड कांग्रेस के लिए अजूबा-सा था। वह भी ऐसे समय में, जब एक बड़े वर्ग को ऐसा लग रहा था कि पार्टी के भीतर सब कुछ ठीकठाक नहीं है। कांग्रेस कार्यकर्ताओं का अपने नेताओं पर से विश्वास उठने लगा है, लेकिन उस भीड़ का हिस्सा बने एक-एक कार्यकर्ता के चेहरे पर उत्साह, जोश और जज्बा, चाल में रवानगी, हाथों में तख्तियां और फिजाओं में कांग्रेस की जिंदाबाद के चहुंओर नारों ने उन सभी सवालों पर अल्पविराम लगा दिया, जो हाल के दिनों में कहीं ना कहीं कांग्रेस की जड़ों को कमजोर कर रहा था। मौका था दिल्ली से लौट रहे अपने नवनियुक्त प्रदेश अध्यक्ष राजेश ठाकुर और कार्यकारी अध्यक्षों गीता कोड़ा, बंधु तिर्की, जलेश्वर महतो और शहजादा अनवर के स्वागत और अभिनंदन करने का। क्या कार्यकर्ता, क्या नेता और क्या विधायक सभी उस भीड़ के उत्साह में इस कदर समा गये थे मानो सभी एक समान हों। शायद यही लोकतंत्र की खूबसूरती है, जो उस वक्त रांची एयरपोर्ट पर देखी जा सकती थी। झारखंड में कांग्रेस के नये दौर की शुरूआत और कार्यकर्ताओं का उमड़ा सैलाब के मायने तलाशती आजाद सिपाही के विशेष संवाददाता राहुल सिंह की रिपोर्ट।
आजादी के पहले स्वतंत्रता संग्राम की धुरी रही कांग्रेस, आजादी के बाद एकमात्र ऐसी पार्टी थी, जिसने केंद्र की सत्ता में पूरे 67 सालों तक राज किया। इस दौरान कुछ समय के लिए भाजपा तो कुछ समय के लिए जनता दल का शासन रहा, लेकिन कांग्रेस के दबदबा कायम रहा। इंदिरा गांधी और उसके बाद राजीव गांधी के कार्यकाल तक तो ऐसा लगता था, मानो कांग्रेस का सूरज कभी अस्त ही नहीं होगा। लोगों में एक आम धारणा बन गयी थी कि कांग्रेस ही उसकी हमसफर है। लेकिन कहते हैं न कि लोकतंत्र में जब भी क्षमता से अधिक पावर मिल जाता है, तो व्यक्ति उसका दुरूपयोग करने लगता है। इंदिरा गांधी के समय एक बार ऐसा लग रहा था कि इंदिरा ही इंडिया हैं, लेकिन लोगों के इस असीम प्यार का सत्ता दल ने कुछ अलग ही अर्थ निकाल लिया। आम जन की आलोचना को शासक दल के लोग चुनौती समझ बैठे। दुष्परिणाम थी इमर्जेंसी और उसके बाद इंदिरा गांधी का सत्ता से बाहर का रास्ता देखा। लेकिन कांग्रेस एक बार फिर तन कर खड़ी हुई। इंदिरा गांधी दोबारा सत्ता में लौटीं। उनकी हत्या के बाद आया राजीव गांधी का युग। दरअसल इंदिरा गांधी के समय राजीव गांधी का राजनीति से कोई वास्ता ही नहीं था, लेकिन इंदिरा गांधी की हत्या के बाद देश की जनता ने अपना अपार विश्वास देकर उन्हें प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता सौंप दी।
देखते ही देखते अधिकारी राजनीति के सर्वेसर्वा बन गये
राजीव गांधी का युग सही मायने में एक नया युग था, जिसमें राजनीति की परिभाषा ही बदल दी। राजीव गांधी ने जरूरत से ज्यादा पार्टी में ब्यूरोक्रेट्स और टेक्नोक्रेट्स भर दिये। दुष्परिणाम सामने आने लगा और उसके बाद तो कांग्रेस की कहानी सबको पता है। सत्ता में रहते हुए भी कांग्रेस को दूसरों पर आश्रित होना पड़ा। लोगों का मन कांग्रेस से इस कदर उचटा कि उन्होंने 1999 में भाजपा के अटल बिहारी वाजपेयी के हाथ बागडोर सौंप दी, लेकिन भाजपा के फीलगुड और साइनिंग इंडिया के एहसास से एक बार फिर कांग्रेस की सत्ता में वापसी करायी। यूपीए-1 और यूपीए-2 का शासन सबको याद है। उस दौरान कांग्रेस ने एक बार फिर अपने समर्पित कार्यकर्ताओं को दरकिनार कर ब्यूरोक्रेट्स और टेक्नोक्रेट्स पर ज्यादा भरोसा किया और देखते ही देखते ये अधिकारी राजनीति के सर्वेसर्वा बन गये। जब लोकतांत्रिक व्यवस्था में कार्यकर्ताओं को दरकिनार किया जाने लगता है, तो किसी भी पार्टी का हाशिये पर जाना तय है। कांग्रेस के साथ भी यही हुआ और देश की जनता ने प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता नरेंद्र मोदी के हाथों में सौंप दी। इसके बाद तो कांग्रेस मानो राजनीतिक हाशिये पर ही चली गयी। पार्टी की पकड़ थोड़ी-थोड़ी कमजोर होती गयी और वर्तमान में एकक्षत्र राज करनेवाली पार्टी विपक्ष की भूमिका में आ गयी। कई-कई राज्यों में तो हालात यह हो गये कि कांग्रेस को क्षेत्रीय पार्टियों के साथ समझौता करना पड़ा और उनकी ही शर्तों पर गठबंधन करना पड़ा। झारखंड भी इससे अछूता नहीं रहा। यहां भी कांग्रेस को 2019 में झामुमो की शर्तों पर समझौता करना पड़ा।
2019 का चुनाव कांग्रेस के लिए संजीवनी
लेकिन भाजपा के पांच साल के शासन से उब चुकी जनता ने झारखंड गठन के बाद पहली बार कांग्रेस की झोली में सर्वाधिक सीटें डाल दीं। झारखंड की जनता के बीच कांग्रेस की स्वीकार्यता बढ़ी और पार्टी से 16 विधायक विधानसभा पहुंच गये। कांग्रेस पार्टी के लिए यह जीत किसी संजीवनी से कम नहीं थी। इस जीत से कांग्रेस में नयी ऊर्जा का संचार हुआ और जेएमएम और राजद के साथ गठबंधन कर कांग्रेस सत्ता में आ गयी। इतना ही नही, कांग्रेस कोटे से चार विधायक मंत्री भी बने। इस तरह कांग्रेस धीरे-धीरे फिर से पूरी उत्साह के साथ अस्तित्व में आने लगी। लेकिन तभी कोरोना महामारी का आगमन हुआ और देखते ही देखते पूरा विश्व इसकी चपेट में आ गया। समय के साथ-साथ सरकार से लेकर आम जनता भी त्रस्त होने लगी। कोरोना के कहर ने पूरे विश्व को चहारदीवारी के अंदर कैद कर दिया। धीरे-धीरे कोरोना का कहर कम होते ही, पहिए फिर से घूमने लगे। लेकिन क्या पता था कि झारखंड कांग्रेस की असली परीक्षा अब शुरू होगी।
मतभेद का मनभेद में तब्दील होना
कोरोना के कारण पार्टी की रफ्तार में आयी शिथिलता ने कहीं ना कहीं पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं के बीच एक दूरी पैदा कर दी, जिसके कारण पार्टी में धीरे-धीरे कार्यकर्ताओं और माननीयों के बीच मतभेद उत्पन्न होने लगा। धीरे-धीरे यह मतभेद मनभेद में तब्दील होता गया। समय के साथ-साथ पार्टी के कुछ युवा विधायक अपने को असहज और अपेक्षित महसूस करने लगे। दरअसल, हुआ यह था कि कांग्रेस ने जिन दो कद्दावर नेताओं के हाथ एक तरह से पार्टी की बागडोर सौंपी, उनका राजनीतिक वजन इतना भारी था कि युवा कार्यकर्ता उनसे संवाद करने में अपने को असहज पा रहा था। ऐसा नहीं था कि डॉ रामेश्वर उरांव और आलमगीर आलम ने पार्टी कार्यकर्ताओं के लिए अपने दरवाजे बंद कर लिये थे, बल्कि वे पहले से ज्यादा लिबरल होकर काम कर रहे थे, लेकिन युवा कार्यकर्ताओं को यह साहस ही नहीं हो रहा था कि वह सहज तरीके से उनके पास पहुंचें और अपनी बात रखें। उसके पीछे मुख्य कारण यही था कि इन दोनों नेताओं की जितनी राजनीतिक समझ थी, राजनीति में जितना समय इन्होंने गुजारा है, उतना तो कार्यकर्ताओं की उम्र भी नहीं थी, लिहाजा वे संकोच कर रहे थे। कार्यकर्ताओं के साथ-साथ युवा विधायक भी असहज महसूस करने लगे। इसका एक कारण और था। कोरोना के कारण पार्टी कार्यकर्ताओं, विधायकों के साथ पार्टी नेतृत्व का संवाद नहीं हो पाना। बैठकें नहीं हो पा रही थीं। कार्यकर्ताओं को अपनी समस्याओं का कोई समाधान नजर नहीं आ रहा था, लिहाजा युवा कार्यकर्ता और विधायक दिल्ली का रुख करने लगे। इसने नेतृत्व और इन लोगों के बीच एक दीवार सी खड़ी कर दी। पार्टी की गतिविधियां शिथिल पड़ने लगीं। कार्यकर्ता नेतृत्व के खिलाफ खड़ा होने लगे। आलोचनाओं का दौर शुरू हुआ और कहीं न कहीं पार्टी के अंदर अनुशासनहीनता आने लगी।
कार्यकर्ताओं की अपेक्षाओं पर खरा उतरने की चुनौती
आलाकमान ने इसे महसूसा। न सिर्फ महसूसा, बल्कि उसका रास्ता भी निकाला। उसी का परिणाम है कांग्रेस नेतृत्व में नये दौर का आगमन। आलाकमान ने झारखंड कांग्रेस की कमान राजेश ठाकुर के हाथ सौंपी है। राजेश ठाकुर कांग्रेस के समर्पित कार्यकर्ता रहे हैं। उनके अंदर अभी इगो नहीं पनपा है। हर कोई और खासकर युवा उनके पास बेधड़क जा सकते हैं। अपनी बात रख सकते हैं। अनुभवी और बुजुर्ग उन्हें आदेशात्मक लहजे में भी कुछ कह सकते हैं। उनकी इसी खासियत के कारण उन्हें इतनी बड़ी जिम्मेदारी सौंपी गयी है। बंधु तिर्की भी राजनीति के मंझे हुए खिलाड़ी हैं। उनकी खुद की एक पहचान है। उन्हें उनकी राजनीतिक आक्रामकता के कारण भी जाना जाता है। जाहिर है, कांग्रेस के युवा उनके पास भी बेधड़क जा सकते हैं। गीता कोड़ा, जलेश्वर महतो और शहजादा अनवर को कार्यकर्ताओं की अपेक्षाओं पर खरा उतरने की चुनौती है। उम्मीद की जानी चाहिए कि कांग्रेस के इस नये दौर का लाभ कार्यकर्ताओं को मिलेगा और राजेश ठाकुर और उनकी टीम तमाम तरह की दूरियों को पाटते हुए एक नयी रेखा खींचेगी।