बदलाव : पार्टी सांसदों की समय से पहले संसद में उपस्थिति, लाइब्रेरी में भी भीड़ बढ़ी

केंद्र की भाजपा में विगत सात वर्षों में काफी बदलाव आया है। मोदी-शाह की जोड़ी ने भाजपा नेताओं और पार्टी सांसदों के पुराने रंगरूप को बदल दिया है। पार्टी के क्रियाकलापों को वर्तमान राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा आगे बढ़ा रहे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दूसरी बार पद संभाला। पहली पारी के बाद दूसरी पारी में वह और ज्यादा खुल कर खेल रहे। सांसदों की कार्य संस्कृति बदल रही है। उनके काम के तौर तरीके बदल गये हैं। संसद से लेकर मंत्रालय तक में उनकी मौजूदगी बढ़ गयी है। सरकार की हर बात की जानकारी को रट कर रखना पड़ रहा है। संसद की कार्यवाही के दौरान भाजपा का हर सांसद सुबह नौ बजे संसद के लिए निकल जा रहा है और निश्चित रूप से लाइब्रेरी में उपस्थिति दर्ज करा रहा है। संसद की कार्यवाही के दौरान सांसदों को बाहर जाने की मनाही है। उन्हें आंकड़ों की जानकारी उंगलियों पर रखनी पड़ रही है। वहीं पार्टी में भी नेताओं का व्यवहार और काम करने की दिशा बदल रही है। उन्हें भी हर मामले में अपडेट रहना पड़ रहा है। अगर ये कहें कि भाजपा ने ‘कॉरपोरेट कल्चर’ को अपना लिया है, तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। सांसद हो या पार्टी के नेता व्यवस्थित रूप से एक समान दिशा की ओर बढ़ते हुए दिख रहे हैं। भाजपा सांसदों और पार्टी के बदलते रंग को खंगालती आजाद सिपाही राजनीतिक ब्यूरो की यह विशेष रिपोर्ट।

पूर्व प्रधानमंत्री स्व अटल बिहारी वाजपेयी के समय में भाजपा ने एक नारा दिया था, ‘हमारा चाल, चरित्र और चेहरा अन्य पार्टियों से अलग है।’ अटल के समय भाजपा ने यह नारा किस संदर्भ में दिया था, यह सभी जानते हैं। यह विपक्ष पर वंशवाद, उनके कामकाज और सरकार चलाने के तरीके को देख कर दिया गया था। मोदी राज में इस नारे को एक नये रूप में देखा गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और तत्कालीन भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष सह वर्तमान में गृह मंत्री अमित शाह की जोड़ी ने सरकार और पार्टी दोनों के लिए स्व अटल बिहारी के समय के नारे को नये रूप में ढाल दिया। एक समय औसत स्थिति में रहनेवाली भाजपा को उस मुकाम पर लाया गया, जहां सभी राजनीतिक दल ढेर हो गये। हालत ऐसी हो गयी कि कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय पार्टी के साथ-साथ कोई भी राजनीतिक दल भाजपा से अकेले लड़ने में खुद को सक्षम नहीं पा रहा है। एक समय देश में एक नारा बहुत ही- शोर से गूंजा था। ‘इंडिया इज इंदिरा, इंदिरा इज इंडिया।’ कुछ वैसी ही स्थिति आज है, बस नाम में फेर बदल देखने को मिल रहा है। ‘इंडिया इज मोदी, मोदी इज इंडिया’ में बदल गया है। भाजपा को 2024 के लोकसभा चुनाव में परास्त करने के लिए पूरे विपक्ष को एक मंच पर आने की जरूरत महसूस हो रही है। इसके लिए प्रयास भी शुरू हो गया है। एक तरफ अकेले मोदी की सल्तनत है, दूसरी तरफ कांग्रेस, तृणमूल, राजद, सपा, बसपा समेत अन्य सभी दल हैं। यह तो आनेवाला वक्त बतायेगा कि मोदी की सल्तनत गिरेगी या नहीं। पर भाजपा की सल्तनत कायम रखने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमति शाह, पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा समेत तमाम शीर्ष के नेता तैयारी में जुटे हैं। इसी का नतीजा है कि भाजपा सांसदों से लेकर पार्टी नेताओं के एक-एक क्रियाकलाप को बदल कर रख दिया गया है, जिसे ‘कॉरपोरेट कल्चर’ कहा जा रहा।

आखिर ‘कॉरपोरेट कल्चर’ है क्या
कहीं भी कुछ बदलाव होता है, तो सभी इससे संतुष्ट हों यह संभव नहीं है। भाजपा के अंदर भी इस बदलाव को लेकर अकसर चर्चा होती है। कहा जाता है कि भाजपा ने तो कॉरपोरेट कल्चर अपना लिया है। विपक्ष भी समय-समय पर ताना मारता है। सवाल है कि आखिर यह ‘कॉरपोरेट कल्चर’ है क्या? सामान्य भाषा में समझा जाये तो कॉरपोरेट कल्चर काम करने का एक तरीका है। कॉरपोरेट कल्चर की मुख्य बातें यह हैं कि अपने सभी कार्यों का लेखा-जोखा रखें। कोई भी कभी भी काम से संबंधित कुछ पूछे, तो तत्काल सटीक और संतुष्टिपूर्ण जवाब दे पायें। अपने वरिष्ठ अधिकारी के सामने किसी समस्या के साथ जायें, तो समाधान भी सोच कर जायें। देर तक कार्य करना या प्रयास करना महत्वपूर्ण नहीं है। महत्व परिणाम का है। संस्थान या संगठन के हित में कदम उठायें। वह कैसे आगे बढ़े, इस पर लगातार मंथन करें। जब यह किसी व्यवसाय या कंपनी की सफलता का राज हो सकता है, तो किसी राजनीतिक पार्टी द्वारा इसे अपनाना क्यों गलत है? आखिरकार राजनीतिक पार्टी को भी सफलता की जरूरत है। जो सत्ता में है, उन्हें जनहित में काम कर के दिखाना है। सरकार के मंत्रियों को काम करना है। सांसदों का काम है कि संसद में जनहित की बातों को उठायें। पार्टी नेताओं का काम है कि वे जनता के बीच जायें। सरकार ने जो योजनाएं शुरू की हैं, उसका लाभ मिल रहा या नहीं देखें। उनकी जरूरत के बारे में सरकार को बतायें। यानी सरकार और जनता के बीच एक कड़ी का काम करें। यह सब तभी संभव है, जब आप खुद को सरकार की योजनाओं और क्रियाकलापों से अपडेट रखेंगे। जनता के बीच जायेंगे। सारी बातें आपको मुंह जबानी याद रहनी चाहिए। तभी आप विपक्ष को भी जवाब दे पायेंगे।

भाजपा की पाठशाला में ऐसा ही पढ़ाया जा रहा पाठ
भाजपा की पाठशाला में 2024 की तैयारी को लेकर सांसदों और पार्टी नेताओं को कुछ इसी तरह का पाठ पढ़ाया जा रहा है। जिसे ‘कॉरपोरेट कल्चर’ का नाम दिया जा रहा है। भाजपा के आलोचक कहते हैं कि दो लोग पार्टी चलाते हैं-मोदी और शाह। अब इस श्रेणी में जेपी नड्डा भी शामिल हो गये हैं। इस पर बहस हो सकती है कि पार्टी यही दो लोग चलाते हैं या नहीं। लेकिन एक बात निर्विवाद है कि भाजपा की राजनीतिक कार्य संस्कृति में बदलाव लाने की सोच और क्षमता इन्हीं दो नेताओं ने दिखायी। जिस पर आज भी भाजपा सांसद और पार्टी नेता खड़े हैं और 2024 के लिए आगे बढ़ा जा रहा है। भाजपा सांसदों का सदन की कार्यवाही के दौरान पूरा समय देना अनिवार्य कर दिया गया है। यहां तक कि भोजनावकाश भी ज्यादा लंबा नहीं ले सकते हैं। कार्यवाही के दौरान संसद से बाहर जाने की मनाही है। एक-एक सांसद और पार्टी नेताओं को क्षेत्र में ड्यूटी लगायी जा रही है। वह कम से कम तीन दिन जनता के साथ रहेंगे। सरकार के कामकाज का प्रचार-प्रसार किया जायेगा। वहीं, सरकार के मंत्रियों को भी कई तरह की हिदायतें दी गयी हैं। उन्हें भी अपने-अपने विभाग की पूरी-पूरी जानकारी मुंह जुबानी याद रखने के लिए कहा गया है। किसी के ज्ञापन या आग्रह पर तत्काल पूरा करने का आश्वासन नहीं दें। पहले आग्रह को देख लें, वह करने लायक है या नहीं, फिर लिखित रूप में इसकी जानकारी संबंधित व्यक्ति को दें। सांसदों को अफसरों के ट्रांसफर-पोस्टिंग से दूर रहने को कहा गया है। इसी तरह पार्टी नेताओं को भी हिदायत दी गयी है। राष्ट्रीय स्तर से लेकर प्रदेश, जिला और मंडल स्तर तक सभी को सक्रिय बनाये रखने की योजना पर काम किया जा रहा है।

जीवन खपाने वाले कार्यकर्ताओं का सम्मान
राज्यपालों की नियुक्ति में भी पार्टी में नयी कार्य संस्कृति की झलक मिलती है। कांग्रेस दशकों तक पूर्व नौकरशाहों और परिवार के वफादारों को इस पद से नवाजती रही है। मोदी सरकार ने दो-तीन अपवादों को छोड़ कर उन्हीं लोगों को राजभवन भेजा, जिन्होंने जनसंघ से भाजपा के दौर में पार्टी के लिए संघर्ष किया। यह नयी राजनीतिक संस्कृति संगठन के लिए जीवन खपाने वाले कार्यकर्ताओं का सम्मान है। कोई भी संगठन उतना ही मजबूत या कमजोर होता है, जितना उसके कार्यकर्ता। भाजपा को परिवारवाद से भी बचाये रखा। एक-दो अपवाद को छोड़ दें, तो भाजपा में परिवारवाद नहीं के बराबर है। लोकसभा चुनाव हो या विधानसभा चुनाव, टिकटों का वितरण हो या मंत्रिमंडल का गठन, सबमें इस बात का खयाल रखा जा रहा है कि परिवारवाद की बढ़ती प्रवृत्ति पर लगाम लगायी जाये। कुछ अपवादों को छोड़ कर इस नियम का बड़ी कड़ाई से पालन किया जा रहा है। इसके कारण पार्टी के अंदर विरोध भी झेलना पड़ रहा है। कुल मिलाकर भाजपा में पार्टी के अंदर और केंद्र सरकार में एक व्यवस्था ऐसी बन रही है कि सांसद, विधायक, पार्टी पदाधिकारी, नेता, कार्यकर्ता सभी एक साथ मिल कर एक काम के लिए समर्पित हों और उसे एक मुकाम पर पहुंचाया जाये। उन्हें यह घुट्टी पिलायी जा रही है कि सेवा ही संगठन है, जिससे पार्टी में टॉप टू बॉटम सभी की सक्रियता बनी रहे।

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