- वर्दी में रहे, तो छाप छोड़ी, वर्दी उतारी, तो बन गये इतिहास पुरुष
- क्रिकेट से लेकर प्रशासनिक सेवा तक में जम कर चलाया अपना सिक्का
अमिताभ चौधरी नहीं रहे, यह खबर मंगलवार को जैसे ही फैली, पूरे झारखंड और दुनिया भर में फैले उनके जाननेवालों में एक किस्म का सन्नाटा छा गया। अपने जाननेवालों और नहीं जाननेवालों के बीच अमिताभ चौधरी एक ऐसी शख्सियत रहे, जिसने सामने आयी हर चुनौती का डट कर सामना किया। जब तक वर्दी में रहे, कर्तव्यपालन में कभी कोई कोताही नहीं बरती, खूंखार अपराधियों को सीखंचों के पीछे पहुंचाया और जब वर्दी उतारी, तो क्रिकेट से लेकर राजनीति तक के मैदान में अपनी छाप छोड़ी। इस सफर के दौरान विवाद भी खूब हुए, लेकिन इससे अमिताभ चौधरी कभी घबड़ाये नहीं। काम करने और कुछ कर गुजरने का जुनून ऐसा कि रांची को जेएससीए स्टेडियम का तोहफा देकर देश के क्रिकेट नक्शे पर स्थापित कर दिया। अकेले दम पर, बिना किसी प्रचार और ताम-झाम के जब रांची में यह विश्व स्तरीय क्रिकेट स्टेडियम तैयार हुआ, तो लोगों को आश्चर्य हुआ था कि इतना बड़ा प्रोजेक्ट बिना विवाद के कैसे पूरा हो गया। लोग आज भी कहते हैं कि यदि अमिताभ चौधरी नहीं होते, तो झारखंड में क्रिकेट का मतलब जमशेदपुर होता और क्रिकेट प्रेमियों की मंजिल कीनन स्टेडियम। देश के सर्वश्रेष्ठ आइआइटी खड़गपुर से इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर देश की सबसे कठिन प्रतियोगिता परीक्षा पास कर आइपीएस बननेवाले अमिताभ चौधरी का जीवन इतने रंगों से भरा है कि उन्हें किसी एक स्वरूप में बांध पाना मुश्किल ही नहीं असंभव है। इस शानदार व्यक्तित्व के जीवन से जुड़े विविध पहलुओं को उजागर कर रहे हैं आजाद सिपाही के विशेष संवाददाता राहुल सिंह।
झारखंड की राजधानी स्वतंत्रता दिवस की खुमार से बाहर निकली भी नहीं थी कि मंगलवार को यह मनहूस खबर आयी कि अमिताभ चौधरी का निधन हो गया है। कई लोगों को तो यकीन नहीं हुआ, लेकिन जैसे-जैसे खबर फैली, उन्हें जाननेवाले और नहीं जाननेवाले भी सकते में आ गये। महज दो महीने पहले झारखंड लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष पद से रिटायर होनेवाले अमिताभ चौधरी न केवल रांची और झारखंड, बल्कि पूरी दुनिया में फैले अपने जाननेवालों के लिए एक लोकप्रिय और कड़क प्रशासक थे। क्रिकेट की दुनिया में उनका नाम बड़ी प्रतिष्ठा से लिया जाता था, क्योंकि उन्होंने अपना पूरा जीवन इस खेल के विकास में लगा दिया था।
अमिताभ चौधरी झारखंड के वैसे चर्चित लोगों में शामिल थे, जिन्होंने शासन, प्रशासन, क्रिकेट और राजनीति में एक अलग पहचान बनायी। अमिताभ चौधरी ने 1984 में आइआइटी खड़गपुर से बीटेक की डिग्री हासिल की। इसके बाद 1985 में संघ लोक सेवा आयोग की सिविल सेवा परीक्षा पास पर भारतीय पुलिस सेवा में आये। इन्होंने यूपीएससी की परीक्षा में इतिहास और भूगोल विषय को वैकल्पिक पेपर रखा था। पहले ही प्रयास में इन्होंने परीक्षा पास की और आइपीएस श्रेणी में पूरे भारत में द्वितीय स्थान प्राप्त किया था। इन्हें बिहार कैडर मिला। वह 1997 में रांची के एसएसपी बनाये गये। अलग राज्य बनने के बाद अपनी क्षमता, सूझबूझ और बेहतर टीम की बदौलत इन्होंने रांची की जनता के बीच से अपराधियों का खौफ खत्म किया, जिसे लोग आज भी याद करते हैं। उस समय रांची के दो सबसे खूंखार अपराधियों, सुरेंद्र बंगाली और अनिल शर्मा को गिरफ्तार करने के पीछे अमिताभ चौधरी ही थे। इसके अलावा शाम सात बजे तक बंद हो जानेवाले रांची शहर को अपराधमुक्त बनाने में उन्होंने दिन-रात एक कर दिया। उन दिनों को लोग आज भी भूले नहीं हैं। सुरेंद्र बंगाली का क्या खौफ था। अगर उसने किसी को फोन कर दिया, तो समझो वह गया काम से। उसके नाम का सिक्का चलता था। उसका नाम लेकर दो दर्जन से अधिक लोगों ने करोड़ों कमा लिये थे। बिजनेस मैन को रंगदारी देनी पड़ती थी। छोटे पुलिसकर्मी भी उस पर हाथ डालने से डरते थे। लेकिन अमिताभ चौधरी ने रांची को उसके आतंक से निजात दिलायी। उसके बाद से ही उनका नाम पूरे झारखंड में चर्चित हो गया था। उन्होंने गृह विभाग में विशेष सचिव (एडीजी रैंक) के पद से वीआरएस लिया था। पुलिस सेवा में किये गये उनके कार्य याद किये जाते हैं और उन्हें जनता का एसएसपी माना जाता है।
क्रिकेट को समर्पित जीवन
अमिताभ चौधरी को जाननेवाले बताते हैं कि खाकी वर्दी के बाद उनका दूसरा प्रेम क्रिकेट था। वह खुद तो क्रिकेट खेलते ही थे, आसपास के बच्चों और युवाओं को भी खूब प्रोत्साहन देते थे। नौकरी की व्यस्तता के बावजूद वह क्रिकेट के लिए हमेशा वक्त निकालते थे। झारखंड बनने से पहले तक संयुक्त बिहार में क्रिकेट की राजधानी के रूप में जमशेदपुर का नाम लिया जाता था और कीनन स्टेडियम अंतरराष्ट्रीय स्तर का एकमात्र स्टेडियम था। झारखंड अलग राज्य बनने के बाद अमिताभ चौधरी को यह बात अखरने लगी। उन्होंने अकेले दम पर रांची में जेएससीए स्टेडियम बनवा दिया और रांची को अंतराष्ट्रीय क्रिकेट के नक्शे पर स्थापित कर दिया। यह अमिताभ चौधरी ही थे, जिन्होंने प्रयास कर एचइसी प्रबंधन से जमीन ली थी और उसके बाद तमाम बाधाओं को दूर करते हुए स्टेडियम का निर्माण शुरू हुआ था।
स्टेडियम निर्माण के बाद भी एचइसी और जेएससीए के बीच विवाद चलता रहा और कुछ महीने पहले अमिताभ चौधरी के प्रयास से ही इस विवाद का हमेशा के लिए अंत कर दिया गया।
वर्ष 2002 में वह भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के सदस्य बने। इसके बाद साल 2005 में वह झारखंड स्टेट क्रिकेट एसोसिएशन (जेएससीए) के अध्यक्ष बने। फिर वर्ष 2005 से 2009 तक टीम इंडिया के मैनेजर भी रहे। साल 2013 में उन्होंने आइपीएस की नौकरी से वीआरएस ले लिया।
राजनीति में भी आजमाया हाथ
अमिताभ चौधरी की उपलब्धियों की शृंखला में राजनीति भी है। साल 2013 में नौकरी से वीआरएस लेने के बाद उन्होंने राजनीति में कदम रखा। साल 2014 में रांची से लोकसभा का चुनाव उन्होंने लड़ा। बाबूलाल मरांडी की पूर्व पार्टी जेवीएम से टिकट मिला था, लेकिन 67 हजार वोट लाकर वह चौथे स्थान पर रहे। चुनाव के दिन विवाद भी हुआ था।
जेपीएससी अध्यक्ष भी रहे
भारतीय पुलिस सेवा से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले चुके और झारखंड स्टेट क्रिकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष पद से लेकर बीसीसीआइ के कार्यवाहक सचिव जैसे पदों पर रह चुके अमिताभ चौधरी को राज्य सरकार ने अक्टूबर 2020 में झारखंड लोकसेवा आयोग (जेपीएससी) का अध्यक्ष बनाया था। इनका कार्यकाल जुलाई 2022 में पूरा हुआ था। इस पद पर रहने के दौरान उन्होंने जेपीएससी जैसी संस्था को विवादों से मुक्त करने का प्रयास भी शुरू किया था। उसी क्रम में एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था: सबसे नजदीक रहनेवालों से हमेशा सतर्क रहना चाहिए, क्योंकि नजदीकी लोग ही स्टंप आउट करते हैं।
6 जुलाई 1960 को बिहार के दरभंगा जिले के मनीगाछी प्रखंड के बाथे गांव में जन्मे अमिताभ चौधरी का निधन वास्तव में झारखंड के लिए एक बड़ा नुकसान है। वह जिस भी क्षेत्र में रहे, हमेशा अपनी अलग पहचान बनायी। ऐसे लोग विरले ही मिलते हैं। झारखंड के लोग कहते हैं-एम एस धोनी को तराशने में अमिताभ चौधरी की भी महत्वपूर्ण भूमिका थी। देश में ऐसे सैकड़ों क्रिकेटर हैं, जिन्हें उचित जगह नहीं मिल पाने के कारण उनका कैरियर बर्बाद हो गया। इसमें कोई दो राय नहीं कि धोनी में टैलेंट था। क्रिकेट उनमें कूट-कूट कर भरा था। उन्होंने अपने खेल से क्रिकेट जगत तो शुरू में ही प्रभावित कर दिया था, लेकिन यह भी सच है कि अगर अमिताभ चौधरी जैसे लोग उनके पैरोकार नहीं होते तो क्रिकेट जगत में धोनी को वह स्थान नहीं मिल पाता, जहां आज वह हैं।
छोटे शहरों से निकलनेवाले क्रिकेटर तब तक राष्टÑीय क्षितिज पर नहीं चमकते, जब तक उन्हें वहां पहुंचानेवाला नहीं हो। अमिताभ चौधरी का जाना, सचमुच क्रिकेटप्रेमियों के लिए दुखदायी खबर है।