रांची। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) के अध्यक्ष न्यायमूर्ति अरुण कुमार मिश्रा ने कहा कि अस्पताल में स्वस्थ मरीजों को एक दिन के लिए भी शरण में रखना अपराध है। एक स्वस्थ रोगी को शरण में रखना जेल में बंद लोगों को रखने के समान है। न्यायमूर्ति अरुण कुमार मिश्रा रिनपास और सीआईपी की ओर से गुरुवार को ‘मुद्दे और चुनौतियां’ पर आयोजित कार्यशाला में बोल रहे थे।
उन्होंने अधिकारियों से कहा कि वे एक मानसिक रोगी को सम्मानजनक जीवन देने के लिए उचित ध्यान दें। रोगियों को फिट करें और बिना किसी और देरी के उनकी रिहाई सुनिश्चित करने के लिए कार्रवाई करें। न्यायमूर्ति अरुण कुमार मिश्रा ने कहा कि स्वस्थ हो चुके मानसिक मरीजों को शरण में रखना मानवाधिकारों का उल्लंघन है। इसकी जिम्मेदारी उन लोगों पर है, जो इसे चलाने के लिए जिम्मेदार हैं। अक्सर कहा जाता है कि फिट मरीजों को इसलिए अस्पताल में रखा जाता है, क्योंकि कोई भी परिजन उन्हें घर वापस ले जाने के लिए नहीं आता है।
एनएचआरसी के अध्यक्ष ने कहा कि अधिकारी अपनी जिम्मेदारी से नहीं कतरा सकते। इस संबंध में कार्रवाई करने की जिम्मेदारी उनकी है। उन्होंने कहा कि वैसे संस्थानों को बंद करना बेहतर है, यदि वर्तमान में इसे चलाने वाले लोग जीर्ण-शीर्ण इमारतों और इसके खराब रखरखाव पर अपनी चिंता व्यक्त करने से पहले इसे ठीक से चलाने में सक्षम नहीं हैं। न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा ने अधिकारियों से जेल से आने वाले रोगियों के प्रवेश पर उचित ध्यान देने के लिए भी कहा।
उन्होंने कहा कि एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश होने के नाते उन्हें पता है कि मानसिक अस्पताल का दुरुपयोग उन लोगों को रखने के लिए किया जा रहा है, जिन्हें यहां रखने की आवश्यकता नहीं है। रोगियों के ग्रेड के अनुसार भोजन उपलब्ध कराने में भेदभाव पर कहा कि सभी रोगियों को उनकी वित्तीय स्थिति के बावजूद सर्वोत्तम पोषण दिया जाना चाहिए। गुणवत्तापूर्ण भोजन परोसने में कोई पक्षपात नहीं होना चाहिए। अस्पताल में संकायों और समर्पित कर्मचारियों की कमी पर भी उन्होंने चिंता जतायी।
कार्यक्रम में प्रधान न्याययुक्त एके राय, सीआईपी के निदेशक डॉक्टर बासुदेव दास, रिनपास के निदेशक डॉ जयंती सिमालिया और स्वास्थ्य सचिव अरुण कुमार सिंह सहित अन्य उपस्थित रहे।