- बड़ा सवाल: नीतीश कुमार की राजनीति का यह ब्रह्मास्त्र कितना कारगर होगा
जदयू के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष और पूर्व केंद्रीय मंत्री आरसीपी सिंह को नीतीश कुमार से अदावत की कीमत अब पता चल रही है। उनकी पार्टी ने ही उन पर गंभीर आरोप लगाते हुए एक नोटिस भेजा है। पार्टी ने उन पर आरोप लगाया है कि उन्होंने जदयू में रहते हुए अकूत संपत्ति बनायी है। इस मामले को लेकर जदयू ने आरसीपी सिंह को नोटिस भेज कर जवाब मांगा है। जदयू ने नोटिस में कहा है कि सभी इस बात को जानते हैं कि नीतीश कुमार भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस नीति पर काम करते हैं। इतने लंबे सार्वजानिक करियर के बाद भी आज तक उन पर कोई आरोप नहीं लगा है। इसलिए पार्टी आपसे भी यही उम्मीद करती है कि आप परिवाद के बिंदुओं पर बिंदुवार अपनी राय से पार्टी को तुरंत अवगत करायें। नोटिस के बार आरसीपी सिंह ने जदयू से इस्तीफा दे दिया है। राजनीतिक नजरिये से इस नोटिस को भले ही नीतीश के ब्रह्मास्त्र के रूप में देखा जा रहा हो, हकीकत यही है कि यह कदम उठा कर नीतीश कुमार ने राजनीति में लंबी लकीर खींची है। अपने ही पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष, पूर्व केंद्रीय मंत्री के खिलाफ भ्रष्टाचार का खुला आरोप लगा कर उनसे जवाब तलब करना भारत के राजनीतिक इतिहास की पहली घटना है। लेकिन राजनीति में कोई भी घटना बिना सियासी मतलब के नहीं होती है। इसमें भी यही कहा जा रहा है। नीतीश कुमार ने आरसीपी सिंह की राजनीति में वापसी के अंतिम दरवाजे पर इस नोटिस को चिपका कर उनके लिए आगे का रास्ता बंद कर दिया है, लेकिन इसके साथ ही अपनी राह में भी उन्होंने कांटे बिछा लिये हैं। भाजपा के साथ तल्ख रिश्तों के बीच नीतीश का यह कदम उनके ट्रैक रिकॉर्ड को देखते हुए कितना कारगर होगा, यह तो समय के गर्भ में है, लेकिन फिलहाल उन्होंने आरसीपी पर बढ़त जरूर बना ली है। इस कदम से उन्होंने भाजपा को भी एक संदेश दे दिया है। चुनौती भी कि अगर उनमें भी दम है, तो अपने भ्रष्ट नेताओं को नोटिस भेज कर दिखायें। बिहार की सियासत में अचानक आये इस तूफान के संभावित असर का आकलन कर रहे हैं आजाद सिपाही के विशेष संवाददाता राकेश सिंह।
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार राजनीतिक तौर पर क्या कुछ करेंगे, इसका अंदाजा उनके निकट सहयोगियों तक को नहीं होता है। कहा तो यहां तक जाता है कि नीतीश के बायें हाथ को भी पता नहीं होता कि उनका दाहिना हाथ क्या करनेवाला है। इसलिए समय-समय पर वह लोगों को अपने फैसले से चौंकाते रहे हैं। अब कभी नीतीश के सबसे करीबियों में से एक, पूर्व केंद्रीय मंत्री और जदयू के पूर्व अध्यक्ष आरसीपी सिंह को पार्टी द्वारा जारी नोटिस को ही लिया जाये। नीतीश कुमार ने भारत के राजनीतिक इतिहास में अब तक का अभूतपूर्व कदम उठाते हुए अपने पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष आरसीपी सिंह पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगाये हैं और उनसे जवाब तलब किया है। जदयू का यह नोटिस आरसीपी सिंह को उस समय दिया गया है, जब वह नीतीश कुमार के खिलाफ माहौल बना रहे थे और अपने हाथ-पैर फैला रहे थे। लेकिन नीतीश ने इस नोटिस के जरिये न केवल आरसीपी के लिए आगे का रास्ता बंद कर दिया है, बल्कि उनके साथ गलबहियां करने को आतुर दलों को भी एक सतर्कता सिग्नल दे दिया है।
वास्तव में नीतीश कुमार का यह कदम उनकी राजनीतिक कार्यशैली का चरम बताया जा रहा है। वह जब आरसीपी सिंह को तवज्जो दे रहे थे, तब उनके कई सहयोगियों ने उन्हें आगाह किया था, लेकिन नीतीश ने किसी की नहीं सुनी। नीतीश जानते थे कि आरसीपी कोई जनाधार वाले नेता नहीं हैं। वह नौकरशाही के रास्ते से नीतीश कुमार के भरोसे से राजनीति में आये थे और उनकी मनमर्जी पर ही आरसीपी का राजनीतिक भविष्य निर्भर कर रहा है। उनका राजनीतिक जीवन भी उनकी नौकरशाही के करियर की तरह ही धीरे-धीरे जमा है। वह सपा नेता बेनी प्रसाद वर्मा की मदद से नीतीश कुमार के करीब आये और फिर दोनों के रिश्ते इतने गहरे हो गये कि आरसीपी देखते ही देखते राजनीति की सीढ़ियां चढ़ते गये। आरसीपी सिंह का नीतीश से रिश्ता कितना मजबूत था, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यूपी कैडर का आइएएस होने के बावजूद नीतीश उन्हें बिहार ले आये और प्रधान सचिव बनाया। देखते ही देखते वह नीतीश के कान और आंख बन गये। उनके बारे में बिहार विधानसभा के नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने सार्वजनिक तौर पर आरोप लगाया था कि बिहार में हर नियुक्ति-तबादले में एक आरसीपी टैक्स देना होता है। इसी दौर में जदयू के अंदर संसाधनों के इंतजाम का जिम्मा भी आरसीपी सिंह के इर्द-गिर्द सिमटता गया। 2010 में आरसीपी सिंह ने वीआरएस लिया, फिर जेडीयू ने उन्हें राज्यसभा के लिए नामित कर दिया। 2016 में वह पार्टी की ओर से दोबारा राज्यसभा पहुंचे और शरद यादव की जगह राज्यसभा में पार्टी के नेता भी मनोनीत किये गये। 2020 में उन्हें पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष भी बनाया गया। 2021 में जब केंद्र में मोदी कैबिनेट का विस्तार हुआ, तो आरसीपी सिंह जेडीयू कोटे से केंद्र सरकार में मंत्री बना दिये गये। उन्हें इस्पात विभाग का मंत्री बनाया गया था। लेकिन पिछले महीने जब नीतीश ने उन्हें राज्यसभा में नहीं भेजा और उन्हें केंद्रीय मंत्री का पद छोड़ना पड़ा, तब आरसीपी की राजनीतिक महत्वाकांक्षा अचानक हिलोरें मारने लगीं। इसके कारण वह कहीं न कहीं नीतीश कुमार को ही चुनौती देने लगे। वह भूल गये कि उनका राजनीतिक वजूद नीतीश कुमार से शुरू होकर वहीं खत्म भी हो जाता है। वह अचानक बिहार लौटे और सीधे नीतीश कुमार से टकराने की रणनीति बनाने लगे। इस क्रम में वह भूल गये कि जॉर्ज फर्नांडीस और शरद यादव सरीखे दिग्गज राजनेता भी नीतीश से टकराने की कीमत चुका चुके हैं, तो महज नालंदा का होने के बल पर उनकी क्या बिसात। आरसीपी कहीं से भी राजनेता नहीं थे और न ही बिहार में कहीं भी उन्होंने अपनी राजनीतिक जमीन तैयार की थी।
दरअसल, आरसीपी सिंह का राजनीतिक सफर उसी समय पथरीले रास्ते पर बढ़ने लगा था, जब राज्यसभा का टिकट कटने और पूर्व केंद्रीय मंत्री के पद से इस्तीफा देने के बाद वह बिहार में नीतीश को चुनौती देने लगे थे। उन्हें यह गुमान हो गया था कि नीतीश उनके बिना कुछ नहीं कर सकते। केंद्र की राजनीति में आरसीपी की अपनी अलग छवि बनाने की कोशिशों ने भी उनके लिए मुश्किलें खड़ी की हैं और नीतीश कुमार उन पर अंकुश लगा रहे हैं। नीतीश ने अब साफ कर दिया है कि भाजपा के साथ संबंधों को बनाये रखने के लिए वह आरसीपी पर उतने निर्भर नहीं हैं, लेकिन आरसीपी भूल गये कि वह नीतीश के पहले सिपहसालार नहीं हैं, जिन्हें अर्श से फर्श पर उतारा गया है। इनसे पहले जिन लोगों को नीतीश ने राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया, उनको बाहर भी इसी तरह किया गया। जॉर्ज फर्नांडीस हों या शरद यादव, जो भी उनकी राह से भटका, या अपनी अलग पहचान बनाने की कोशिश की, उसे पार्टी से अलग का रास्ता दिखा दिया गया।
नीतीश कुमार की आदत रही है कि पार्टी या सरकार में अपने खिलाफ चलनेवालों को देर-सबेर राजनीतिक रूप से निपटा ही देते हैं। उनका राजनीतिक स्वभाव रहा है कि वह जिससे नाराज होते हैं, उससे बदला लेने में वह किसी भी हद तक चले जाते हैं। भले ही वह पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष जैसे पद पर ही क्यों न हो। आरसीपी सिंह को नोटिस नीतीश की इस कार्यशैली का उदाहरण है।
इसके साथ ही नीतीश ने आरसीपी को अपने खेमे में लेने के लिए उत्सुक राजनीतिक दलों को भी एक संदेश दे दिया है कि हर चमकनेवाली चीज सोना नहीं होती। उसमें तपिस को सहने की क्षमता भी होनी चाहिए। इसलिए देख-परख कर ही अंतिम फैसला करें। आरसीपी को नोटिस का सियासी मतलब भले ही कुछ भी हो, नैतिक रूप से इसकी तारीफ ही की जानी चाहिए।
जेडीयू के नोटिस में क्या है
जेडीयू के प्रदेश अध्यक्ष उमेश सिंह कुशवाहा ने आरसीपी सिंह को नोटिस भेजा है। इसमें लिखा है, ‘नालंदा जिला जदयू के दो साथियों ने साक्ष्य के साथ शिकायत की है। इसमें कहा गया है कि अब तक उपलब्ध जानकारी के अनुसार आपके एवं आपके परिवार के नाम से वर्ष 2013 से 2022 तक अकूत अचल संपत्ति पंजीकृत करायी गयी है। इसमें कई प्रकार की अनियमितताएं नजर आती हैं। आप लंबे समय से नीतीश कुमार के साथ अधिकारी और राजनीतिक कार्यकर्ता के रूप में काम करते रहे हैं। आपको नीतीश कुमार ने दो बार राज्यसभा का सदस्य, पार्टी का राष्ट्रीय महासचिव, राष्ट्रीय अध्यक्ष तथा केंद्र में मंत्री के रूप में कार्य करने का अवसर पूर्ण विश्वास और भरोसे के साथ दिया। आप इस तथ्य से भी अवगत हैं कि नीतीश कुमार भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस की नीति अपनाते हैं। इतने लंबे सार्वजनिक जीवन के बावजूद उन पर कभी कोई दाग नहीं लगा और न उन्होंने कोई संपत्ति बनायी। निर्देशानुसार पार्टी आपसे अपेक्षा करती है कि शिकायत का बिंदुवार जवाब दें। कुशवाहा ने नोटिस का तत्काल जवाब देने का भी अनुरोध किया है।
आखिर नीतीश और आरसीपी में क्यों बढ़ने लगीं दूरियां
2021 में जब आरसीपी सिंह केंद्रीय मंत्री बने, तो कुछ दिन तक सब कुछ ठीक चला। बताया जाता है कि इसके बाद आरसीपी सिंह और नीतीश कुमार में अनबन की बातें आने लगीं। हालांकि, खुले मंच से दोनों ने कभी एक-दूसरे पर निशाना नहीं साधा। आरसीपी ने उन नेताओं की अनुशंसा को दरकिनार करना शुरू किया, जिन्हें ललन सिंह के करीबी माना जाता था। यही नहीं, केंद्र सरकार में मंत्री बनने के बाद आरसीपी सिंह भाजपा के काफी करीब आ गये थे। इसके चलते उनकी दूरियां नीतीश कुमार से बढ़ने लगी थीं। आरसीपी सिंह यह संदेश देने की कोशिश कर रहे थे कि अगर जदयू ने उन्हें तरजीह नहीं दी, तो वह अपना राजनीतिक रास्ता अलग चुनने से भी नहीं हिचकेंगे। यही कारण है कि आरसीपी सिंह को पार्टी ने दोबारा राज्यसभा नहीं भेजा, जिसके चलते उन्हें केंद्रीय मंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा था।
क्या आरसीपी की राजनीति खत्म करना चाहते हैं नीतीश
जेडीयू ने जिस तरह से आरसीपी सिंह को नोटिस दिया है, उससे साफ पता लगता है कि नीतीश कुमार और आरसीपी सिंह के बीच कड़वाहट काफी बढ़ चुकी है। किसी भी सार्वजनिक नेता पर भ्रष्टाचार का आरोप काफी गंभीर होता है। वह भी तब, जब अपनी ही पार्टी की तरफ से इस तरह के आरोप लगाये गये हों। मतलब साफ है कि जेडीयू में कुछ लोग हैं, जो आरसीपी सिंह की राजनीति अब पूरी तरह से खत्म करना चाहते हैं। आरसीपी सिंह जब तक केंद्रीय मंत्री और राज्यसभा के सांसद थे, तब तक उन्हें पार्टी में भी कुछ सम्मान मिल जाता था। जब से वह मंत्री पद से हटे हैं, हर कोई उनसे दूरी बनाने लगा है। चूंकि आरसीपी सिंह की लड़ाई सीधे नीतीश कुमार से चल रही है, इसलिए पार्टी का कोई भी नेता आरसीपी सिंह के करीब नहीं जाना चाहता है। अब चूंकि भ्रष्टाचार का भी आरोप लग गया है, ऐसे में वह पार्टी में पूरी तरह से अलग-थलग पड़ जायेंंगे। केंद्रीय मंत्री रहते हुए आरसीपी सिंह के रिश्ते भाजपा से काफी अच्छे हो गये थे। कहा जाने लगा था कि वह भाजपा जॉइन कर सकते हैं। अब चूंकि उनकी अपनी ही पार्टी ने उन पर भ्रष्टाचार का आरोप लगा दिया है तो भाजपा में जाने की संभावना भी खत्म होती जा रही है। इस तरह से कांग्रेस और राजद के दरवाजे भी आरसीपी सिंह के लिए बंद हो जायेंगे। आमतौर पर अगर पार्टी के अंदर भी किसी पर आरोप लगते हैं तो गोपनीय तरीके से विवाद को हल कर लिया जाता है। आरसीपी सिंह के मामले में ऐसा नहीं हुआ। उन्हें जो नोटिस जारी किया गया था, उसे बाकायदा प्रेस के साथ साझा किया गया है। मतलब साफ है कि उनकी पार्टी चाहती है कि आम जनता तक ये आरोप पहुंचे, जिससे आरसीपी सिंह की छवि खराब हो जाये और उनका सार्वजनिक राजनीति के कॅरियर पर फुल स्टॉप लग जाये।
आरसीपी के बहाने नीतीश कुमार ने उन सभी नेताओं को यह संदेश देने की कोशिश की है, जां पार्टी की विचारधारा या नीतीश की इच्छा के विरुद्ध जाकर अपना अलग पैर फैलाना चाहते हैं। नीतीश यह बता देना चाहते हैं कि बिहार में अगर राजनीति करनी है, वह भी जदयू के प्लेटफार्म से, तो कोई भी व्यक्ति अपनी अलग पहचान बनाने की कोशिश नहीं करे। वहीं नीतीश ने बिहार भाजपा के नेताओं को भी यह संदेश देने की कोशिश की है कि अगर उन्होंने नीतीश को आईना दिखाने की कोशिश की, तो उन्हें भी उसकी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी। उन्होंने इसके बहाने जदयू में एकनाथ शिंदे बनने का सपना देखनेवालों को भी संदेश दे दिया है कि वे ऐसा नहीं करे, वरना दिन में ही तारे दिखा देंगे।