रांची। झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने खान एवं खनिज (विकास एवं विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 को लेकर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से हस्तक्षेप की मांग की है। मुख्यमंत्री ने 13 अगस्त को राष्ट्रपति को पत्र लिखकर विधेयक को झारखंड के वित्तीय अधिकारों, राज्य की स्वायत्तता और संघीय व्यवस्था से जुड़ा गंभीर विषय बताया है।
राष्ट्रपति के झारखंड से जुड़ाव का किया उल्लेख
मुख्यमंत्री ने अपने पत्र में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के झारखंड से पुराने संबंधों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति वर्ष 2015 से 2021 तक झारखंड की राज्यपाल रही हैं और इस दौरान उन्होंने राज्य के आदिवासी क्षेत्रों, खनन प्रभावित इलाकों और वहां रहने वाले लोगों की समस्याओं को करीब से देखा है।
हेमंत सोरेन ने कहा कि झारखंड के आदिवासी समाज और संघर्षरत परिवारों की परिस्थितियों से राष्ट्रपति परिचित हैं। उन्होंने उम्मीद जताई कि इस संवेदनशील मुद्दे पर राष्ट्रपति राज्य के हितों को ध्यान में रखते हुए हस्तक्षेप करेंगी।
धारा 9D को लेकर राज्य की आपत्ति
मुख्यमंत्री ने कहा कि संशोधन विधेयक में MMDR Act में धारा 9D जोड़ने का प्रस्ताव है। इसके तहत राज्य सरकारें खनिज अधिकारों या खनिज वाली जमीन पर टैक्स, सेस या अन्य लेवी केवल केंद्र सरकार द्वारा तय शर्तों और सीमाओं के तहत ही लगा सकेंगी।
सोरेन के अनुसार, झारखंड सरकार ने इस विषय को पहले प्रधानमंत्री के समक्ष भी उठाया था, लेकिन इसके बावजूद विधेयक संसद के दोनों सदनों से पारित हो गया। राज्य सरकार को आशंका है कि प्रस्तावित प्रावधान का असर पहले से लगाए गए सेस और उससे जुड़े बकाया दावों पर भी पड़ सकता है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का दिया हवाला
मुख्यमंत्री ने अपने पत्र में सुप्रीम कोर्ट की नौ सदस्यीय संविधान पीठ के Mineral Area Development Authority बनाम Steel Authority of India Ltd. मामले में दिए गए फैसले का भी उल्लेख किया।
पत्र के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने संविधान की सातवीं अनुसूची की राज्य सूची की प्रविष्टि 49 के तहत राज्यों को खनिज वाली जमीन पर टैक्स या सेस लगाने के अधिकार को स्वीकार किया था। कोर्ट ने यह भी माना था कि खनिज का मूल्य या उसका उत्पादन ऐसे टैक्स के निर्धारण का आधार हो सकता है।
इसी फैसले के आधार पर झारखंड विधानसभा ने Jharkhand Mineral Bearing Land Cess Act, 2024 पारित किया था।
खनन प्रभावित क्षेत्रों के विकास में खर्च का दावा
हेमंत सोरेन ने कहा कि झारखंड मिनरल बेयरिंग लैंड सेस का उद्देश्य केवल राज्य का राजस्व बढ़ाना नहीं है। इसके जरिए खनन प्रभावित क्षेत्रों में सामाजिक सुरक्षा और विकास कार्यों को बढ़ावा देने की योजना है।
मुख्यमंत्री के मुताबिक, सेस से मिलने वाली राशि का इस्तेमाल शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल, ग्रामीण सड़कों और अन्य बुनियादी सुविधाओं के विकास में किया जा सकता है। उनका कहना है कि खनिज संपदा वाले क्षेत्रों के लोगों को भी राज्य की प्राकृतिक संपदा से होने वाली आर्थिक गतिविधियों का लाभ मिलना चाहिए।
खनन से विस्थापन और प्रदूषण का भी जिक्र
मुख्यमंत्री ने पत्र में झारखंड के आदिवासी और स्थानीय समुदायों की समस्याओं का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि झारखंड देश के प्रमुख खनिज संपदा वाले राज्यों में शामिल है, लेकिन औद्योगिक विकास की सामाजिक और पर्यावरणीय कीमत यहां के लोगों को चुकानी पड़ी है।
खनन के कारण कई परिवारों को विस्थापन, जमीन के नुकसान, प्रदूषण और पारंपरिक रोजगार से जुड़ी परेशानियों का सामना करना पड़ा है। ऐसे में मुख्यमंत्री ने खनिज से होने वाली आर्थिक आय का उचित हिस्सा खनन प्रभावित क्षेत्रों के विकास पर खर्च किए जाने की आवश्यकता बताई।
राज्य के गैर-कर राजस्व में खनन की बड़ी हिस्सेदारी
मुख्यमंत्री ने पत्र में आर्थिक सर्वेक्षण के आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि वर्ष 2024-25 में झारखंड के अपने गैर-कर राजस्व का करीब 84.9 प्रतिशत हिस्सा खनन क्षेत्र से आया था।
उनके अनुसार, झारखंड मिनरल बेयरिंग लैंड सेस से वर्ष 2024-25 में राज्य को करीब 1,379 करोड़ रुपये की आय हुई, जबकि वर्ष 2025-26 में यह राशि बढ़कर 7,488 करोड़ रुपये हो गई।
2026-27 में 13,215 करोड़ रुपये की आय का अनुमान
हेमंत सोरेन ने बताया कि मौजूदा रुझान को देखते हुए वर्ष 2026-27 में इस सेस से करीब 13,215 करोड़ रुपये की आय का अनुमान है। मुख्यमंत्री के मुताबिक, यह राजस्व अब राज्य की आर्थिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है।
उन्होंने कहा कि राज्य सरकार इसी तरह के राजस्व स्रोतों के जरिए महिलाओं, किसानों, गरीब परिवारों और विद्यार्थियों के लिए विभिन्न कल्याणकारी योजनाएं संचालित करती है।
मंईयां सम्मान योजना पर भी चिंता
मुख्यमंत्री ने पत्र में मुख्यमंत्री मंईयां सम्मान योजना का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि इस योजना के तहत 50 लाख से अधिक महिलाओं को आर्थिक सहायता दी जा रही है।
सोरेन के अनुसार, यदि राज्य के अपने राजस्व स्रोत कमजोर होते हैं तो इसका असर ऐसी कल्याणकारी योजनाओं के साथ-साथ शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक सुरक्षा और खनन प्रभावित क्षेत्रों के विकास पर भी पड़ सकता है।
हर साल हजारों करोड़ के राजस्व नुकसान की आशंका
मुख्यमंत्री ने दावा किया कि यदि संशोधन लागू होने के बाद राज्य की सेस लगाने की शक्ति सीमित या समाप्त हो जाती है, तो झारखंड को हर साल हजारों करोड़ रुपये के संभावित राजस्व नुकसान का सामना करना पड़ सकता है।
उन्होंने कहा कि इससे राज्य की आर्थिक क्षमता प्रभावित होगी और विकास योजनाओं, सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रमों तथा खनन प्रभावित क्षेत्रों के लिए चलाए जा रहे कल्याणकारी कार्यों पर भी इसका असर पड़ सकता है।
राष्ट्रपति से हस्तक्षेप की मांग
हेमंत सोरेन ने पूरे मामले को केवल राज्य के राजस्व से जुड़ा विषय न बताते हुए इसे राज्यों के संवैधानिक अधिकार, संघीय ढांचे और खनिज संपदा वाले राज्यों की वित्तीय स्वायत्तता से जुड़ा मुद्दा बताया।
मुख्यमंत्री ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से मामले पर गंभीरता से विचार करने और झारखंड के संवैधानिक एवं वित्तीय अधिकारों की रक्षा के लिए हस्तक्षेप करने की अपील की है।
