काठमांडू। नेपाल में बालेन्द्र शाह सरकार के गठन के बाद विभिन्न सरकारी बोर्डों, समितियों और संस्थानों से 1,594 से अधिक पदाधिकारियों को हटाए जाने के बाद बड़ी संख्या में पद अब भी खाली हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, अब तक करीब 200 पदों पर ही नियुक्तियां हो सकी हैं। पद रिक्त रहने से कई सरकारी निकायों का कामकाज प्रभावित हो रहा है।
मामले की प्रमुख बातें
- अप्रैल में विभिन्न बोर्डों, समितियों और संस्थानों के 1,594 पदाधिकारियों को पदमुक्त किया गया था।
- पद खाली होने के बाद अब तक करीब 200 पदों पर ही नियुक्तियां हो सकी हैं।
- कई आयोगों और संस्थानों का कामकाज प्रभावित होने की बात सामने आई है।
- कुछ संस्थानों में रजिस्ट्रार समेत महत्वपूर्ण पद खाली हैं।
- राजनीतिक नियुक्तियों को खत्म करने के उद्देश्य से विशेष अध्यादेश लाया गया था।
- सरकार पर अपने समर्थकों और कार्यकर्ताओं को नियुक्त करने के आरोप भी लगाए जा रहे हैं।
- नियुक्ति प्रक्रिया में नियमों का पालन नहीं होने पर अदालत ने कुछ नियुक्तियां रद्द की हैं।
अध्यादेश के बाद खाली हुए पद
बालेन्द्र शाह के नेतृत्व में सरकार बनने के बाद अप्रैल में एक अध्यादेश के जरिए विभिन्न सार्वजनिक निकायों में नियुक्त पदाधिकारियों को पदमुक्त किया गया था। सरकार की ओर से इसके पीछे राजनीतिक हस्तक्षेप से संस्थानों को मुक्त कराने का तर्क दिया गया था।
हालांकि, बड़ी संख्या में पद खाली होने के बाद कई निकायों के नियमित कामकाज पर असर पड़ा है। कुछ आयोगों के कामकाज में रुकावट की स्थिति बनी हुई है, जबकि रजिस्ट्रार जैसे महत्वपूर्ण पद खाली होने के कारण कुछ संस्थान बजट, नीतियों और कार्यक्रमों को लेकर भी प्रभावित बताए जा रहे हैं।
नियुक्तियों को लेकर सरकार पर सवाल
सरकार ने राजनीतिक हस्तक्षेप खत्म करने के उद्देश्य से पदमुक्ति की प्रक्रिया शुरू की थी, लेकिन अब सत्तारूढ़ राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी पर अपने कार्यकर्ताओं और समर्थकों को सरकारी संस्थानों में नियुक्त करने के आरोप लग रहे हैं।
कई पदों पर नियुक्ति प्रक्रिया पूरी नहीं होने के कारण सरकारी निकायों में स्थायी व्यवस्था बहाल नहीं हो पाई है।
अदालत ने कुछ नियुक्तियां कीं रद्द
सरकारी नियुक्तियों को लेकर मामला अदालत तक भी पहुंचा है। प्रक्रिया और निर्धारित योग्यता का पालन नहीं होने के आधार पर अदालत ने कई नियुक्तियों को रद्द किया है।
सर्वोच्च अदालत ने पिछले सप्ताह नेपाल वायुसेवा निगम के कार्यकारी अध्यक्ष महेश्वर भक्त श्रेष्ठ की नियुक्ति भी रद्द कर दी। अदालत ने माना कि निर्धारित उम्र सीमा से अधिक उम्र के व्यक्ति की नियुक्ति प्रथम दृष्टया ही स्वीकार योग्य नहीं थी।
यह बालेन्द्र शाह सरकार के कार्यकाल में अदालत द्वारा रद्द की गई नियुक्तियों का पहला मामला नहीं है।
‘पिक एंड चूज’ पर कोर्ट की टिप्पणी
इससे पहले नेपाल वायुसेवा निगम की संचालक समिति में डॉ. दीपक प्रसाद बास्तोला की नियुक्ति भी सर्वोच्च अदालत ने रद्द कर दी थी।
अदालत ने योग्यता और निर्धारित नियुक्ति प्रक्रिया का पालन नहीं होने का हवाला देते हुए जून में नियुक्ति संबंधी निर्णय को खारिज किया था। संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री ने बास्तोला समेत पांच लोगों को संचालक समिति में नियुक्त किया था।
मामले में याचिकाकर्ता उपेन्द्र बहादुर कार्की ने आरोप लगाया था कि चयन समिति की मेरिट सूची में पहले स्थान पर अनुशंसित उम्मीदवार को नजरअंदाज कर सरकार ने अलग निर्णय लिया। अदालत ने इस मामले में मंत्री के निर्णय को ‘पिक एंड चूज’ यानी मनमानी पसंद के तौर पर टिप्पणी की।
सरकारी संस्थानों के कामकाज पर असर
पद रिक्त रहने और नियुक्तियों को लेकर कानूनी विवाद के बीच नेपाल के कई सरकारी संस्थानों में नियमित कामकाज प्रभावित होने की स्थिति बनी हुई है। अब सरकार के सामने खाली पदों को नियमों और निर्धारित प्रक्रिया के तहत भरने की चुनौती है।



