कुमार मुकुल: मंगल ग्रह के पृथ्वी के पास आने की घटना पर लिखी गयी मंगलेश और शुक्ल की कविताओ की तुलना की जा सकती है। दिल्ली के कवियों की एक मजबूरी हो जाती है कि जनता से बनती दूरी के लिए वे एक विकल्प तैयार करते हैं। रघुवीर सहाय राजनीति को, विष्णु खरे फिल्मों को, मिथिलेश श्रीवास्तव चित्रकला को अपना वैकल्पिक आधार बनाते हैं। अपनी उर्जा के वैकल्पिक आधार के रूप में मंगलेश संगीत को चुनते दिखते हैं। संगतकार, रचना प्रक्रिया, अमीर खां, केशव अनुरागी, गुणानंद पथिक जैसी कविताओं में इसे देखा जा सकता है। इन कवतिाओं में मंगलेश दूर के ढोल के सुहावने होने के भीतर की पीड़ा को अभिव्यक्त करते हैं। गुणी ढोलकिया केशव अनुरागी की पीड़ा को वे इस तरह आवाज देते हैं-लेकिन मैं हूं एक अछूत, कौन मुझे कहे कलाकार/ मुझे ही करना होगा आजीवन पायलागन/ महाराज, जय हो सरकार। यह पीड़ा लोकवाद्य बजाने वाले तमाम लोगों की है।

संगतकार कविता में संगीत की दुनिया की परंपरा से चली आ रही खामियों को सामने रखने वाले मंगलेश शायद हिंदी के पहले कवि हैं- तार सप्तक में जब बैठने लगता है उसका गला… तभी मुख्य गायक को ढांढस बंधाता कहीं से चला आता है संगतकार का स्वर। एक विरोधपत्र हूं/ जिस पर उनके हस्ताक्षर हैं जो अब नहीं हैं/ मैं सहेज कर रखता हूं उनके नाम आने वाली चिट्ठियां/ मैं दुख हूं/ मुझमें एक धीमी कांपती हुई रोशनी है। मंगलेश डबराल की दुख शीर्षक इस कविता में विचारधारा और उसको जिलाये रखने का करूण प्रयास एक तारे की तरह टिमटिमा रहा है। यहां तारों की मद्धिम आंच है, यह धीमी रोशनी मरती नहीं, करोड़ो बरस तक। यह कविता का कठजीव है, जिसके प्राण इंतजार में टिमटिमाते रहते हैं। यह इंतजार होता है, विचारों के जीवन क्रिया में बदलने के समय का।

यह कठजीव खामोशी से समय की मार सहता उसमें उपजते विचारों-नामों को चुनता चलता है और खुद को अतीत के विरोधपत्र के रूप में बदल डालता है। मंगलेश का एक दुख यह भी है जो, मुक्तिबोध को सालता रहता था -जीवन क्या जिया। अपनी एक कविता में मंगलेश इसे इस तरह व्यक्त करते हैं- कहीं मुझे जाना था नहीं गया/ कुछ मुझे करना था नहीं किया मंगलेश की विचारधारा की समझ वही है, जो शमशेर की वाम दिशा कविता से लेकर आलोक धन्वा की कविताओं तक का मूल स्वर है। सोवियत संघ के बिखर कर रसिया हो जाने का दुख मंगलेश के यहां स्पष्ट देखा जा सकता है। आज का रसिया ठेठ हिंदी के रसिया के निकट पहुंच चुका है -अब वे महंगी कारें चलाते हैं। सपना देखते हैं। पिछले दशको में हिन्दी कविता पर रघुवीर सहाय और केदारनाथ सिंह का घटाटोप छाया रहा।

मंगलेश की कविताएं इस घटाटोप को चीर कर शमशेर-मुक्तिबोध-नागार्जुन की कविता पीढ़ी से जुड़ने की कोशिश करती दिखती हैं। मंगलेश की कई कविताओं में मुक्तिबोध के चित्र आते हैं। मरणोपांत कवि मे वे लिखते हैं-और बीडी का धुंआ भरता रहा/ उसके चेहरे की झुर्रियों में/ उसकी नौकरियां छूटती रहीं/ और वह जाता रहा बार-बार सभा से बाहर/ गौर से देखो तो वह अब भी/ जाता हुआ दिखायी देता है। मंगलेश की कुछ कविताएं पढ़ते विनोद कुमार शुक्ल और आलोक धन्वा याद आते हैं। उनकी कविता दृश्य की पंक्तियां हैं -जिनसे मिलना संभव नहीं हुआ/ उनकी भी एक याद बनी रहती है जीवन में। शुक्ल की पंक्तियां हैं -जो मेरे घर कभी नहीं आयेंगे/ मैं उनसे मिलने उनके पास चला जाउंगा। अंत तक पहुंचते पहुंचते दृश्य कविता में शुक्ल की जगह आलोक धन्वा की चर्चित कविता पतंग का टोन आ जाता है।

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