बाटगुंड (शोपियां) : शुक्रवार सुबह 6.30 बजे अब्दुल राशिद धोबी (74) हनफी मस्जिद में सुबह की नमाज अदा कर रहे थे जब उन्हें बहू की चीख-पुकार सुनाई दी। डरे हुए अब्दुल तुरंत मस्जिद से निकले और अपनी घर की तरफ दौड़े,जितनी तेज वह इस उम्र में दौड़ सकते थे। जल्दबाजी में वह गिरते-गिरते बचे। जैसे वह घर के नजदीक पहुंचे, उनका सबसे बड़ा डर सच साबित हो गया। हिज्बुल मुजाहिदीन के आतंकी उनके बेटे निसार को खींच कर बाहर ले जा रहे थे। उनकी पत्नी रुकसाना उनके पीछे-पीछे दौड़ रही थीं, वह अपने पति को छोड़ने के लिए कह रही थीं। आतंकियों ने रुकसाना पर भी हमला किया।
रुकसाना ने बताया, मेरे ससुर ने अपनी टोपी निकालकर उनके सामने रख दी थी, और भी दूसरे लोगों ने ऐसा ही किया, जो कि नमाज अदा करने वाले थे। अब्दुल ने अल्लाह के नाम पर बेटे को रिहा होने की भीख मांगी, गांव के 23 और बुजुर्गों ने भी ऐसा ही किया, लेकिन आतंकी उनकी टोपियों को पांव से कुचलते हुए आगे बढ़ गए। अब्दुल जमीन पर गिरकर रोने लगे। वह जानते थे कि सबकुछ खत्म हो गया है। लेकिन निराशा में भी उन्होंने एक आखिरी कोशिश की। वे आतंकियों के पीछे-पीछे चलने लगे, उन्हें आवाज लगाते रहे। उनके दोस्तों ने भी वही किया, गांव की महिलाएं भी रहम की भीख मांगती रहीं।
निसार के बेटे ताबिन ने खिड़की से कूदकर खुद को चोटिल कर लिया था, जब आतंकी उसके पिता को लेकर जा रहे थे। निसार की बेटी इंशा अपने मेडिकल करियर को लेकर अनिश्चितता में है क्योंकि पूरा परिवार उनके पिता की कमाई पर ही निर्भर था। शुक्रवार को जिन तीन एसपीओ की हत्या कर दी गई उनमें से एक कुलवंत भी थे जिनका 9 साल का बेटा युद्धवीर 48 घंटे में 7 बार बेहोश हो चुका है और उसे अस्पताल में भर्ती कराया गया है। कुलवंत को बचाने की युद्धवीर की कोशिश नाकाम रही और उसे इस बात का काफी अफसोस है।
वहीं, तीसरे एसपीओ फिरदौस की पत्नी रुकसाना कहती हैं, ‘मैं क्यों कभी अपने बच्चे को पुलिस में भेजूंगी? मेरे पति रिटायरमेंट लेने आए थे। वह अपनी पुलिस की नौकरी छोड़ने ही वाले थे, क्योंकि वह धमकी के साथ काम नहीं करना चाहते थे। वह कश्मीर के लिए लड़े और उन्हें कोई सुरक्षा नहीं मिली।’