वरीय संवाददाता
रांची। राज्य सरकार की स्थानीय नीति पर शुक्रवार को झारखंड हाइकोर्ट की मुहर लग गयी। हाइकोर्ट के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश एचसी मिश्रा की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने राज्य सरकार की स्थानीय नीति को सही ठहराया। कोर्ट ने स्थानीय नीति को चुनौती देने वाली आदिवासी बुद्धिजीवी मंच की याचिका को खारिज कर दिया। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने माना कि प्रार्थी का आग्रह निराधार है, सरकार ने सोच-समझ कर स्थानीय नीति बनायी है। इसलिए इस पर हस्तक्षेप करने का कोई मतलब नहीं है। प्रार्थी ने राज्य सरकार की स्थानीय नीति को संविधान के आर्टिकल 14 एवं 16 के विरुद्ध बताते हुए इसे निरस्त करने का आग्रह कोर्ट से किया था। साथ ही कहा था कि स्थानीय नीति समानता का अधिकार और सभी को नियुक्ति में समानता का अधिकार देने के खिलाफ है।
सरकार की ओर से अपर महाधिवक्ता मनोज टंडन ने बताया कि राज्य सरकार ने 18 अपै्रल 2016 को स्थानीय नीति घोषित की थी। हाइकोर्ट के पांच जज की विशेष बेंच के जजमेंट के आलोक में राज्य सरकार ने स्थानीय नीति बनायी है। पांच सदस्यीय विशेष बेंच ने वर्ष 2003 में प्रशांत विद्यार्थी बनाम स्टेट आॅफ झारखंड मामले में अपना जजमेंट दिया था। स्थानीय नीति में सभी वर्गों को प्रोटेक्ट करने की कोशिश की गयी है। स्थानीय के मापदंड में कई बिंदु रखे गये थे। इनसे झारखंड में जो व्यक्ति 30 वर्षो से रह रहा हो, जिसके पास अचल संपत्ति हो, जिसका जन्म झारखंड में हुआ हो, जिसने मैट्रिक झारखंड से पास किया हो, जिसके माता- पिता झारखंड में रहते हों और वे राज्य सरकार एवं केंद्र सरकार के कर्मी हों या राज्य सरकार के बोर्ड निगम के कर्मी हों आदि शामिल हैं। राज्य सरकार ने स्थानीय नीति लाकर लोगों की बहुप्रतीक्षित मांग को पूरा किया है। इसलिए प्रार्थी की याचिका मेंटेनेबल नहीं है, इसे खारिज किया जाये। प्रार्थी की ओर से अधिवक्ता जेजे सांगा ने पैरवी की।
सरकार की स्थानीय नीति पर हाइकोर्ट की मुहर
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