अंग्रेजी साहित्य की एक खूबसूरत और चर्चित कृति है ‘लॉस्ट ब्वॉयज’। यह पीटर पैन नामक एक लड़के की कहानी है, जो हमेशा बड़ा होने से इनकार करता रहा। वह हमेशा बच्चा बना रहना था और किसी की नहीं सुनता था। एकाकी जीवन उसे पसंद था। इसलिए उसके दोस्त भी बहुत कम थे। वह जब प्रौढ़ावस्था में पहुंचा, तो पूरी तरह अकेला था। आज के संदर्भ में यह कहानी कांग्रेस पर सटीक बैठती है। पार्टी के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी और पार्टी में उनके साथी-सहयोगी भी पीटर पैन की तरह का बर्ताव करने लगे हैं।
हालत यह है कि पार्टी की अगली पीढ़ी के इन नेताओं का अकेलापन और तकलीफ इतनी ज्यादा बढ़ रही है कि वे अब इसे छोड़ने के मूड में आ गये हैं।
लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की करारी हार के बाद राहुल गांधी ने पार्टी अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया। वक्त बदला और कांग्रेस एक बार फिर पुराने नेताओं के हाथों में आ गयी। राहुल के दौर में कांग्रेस में कई युवा नेताओं की जम कर खातिरदारी हुई, उनकी बातें सुनी गयीं, लेकिन राहुल के जाने के बाद इन युवा नेताओं के सामने भविष्य का संकट पैदा हो गया है। ये युवा नेता ऐसे परिवारों के हैं, जिनका समाज में दबदबा है। हम बात कर रहे हैं ज्योतिरादित्य सिंधिया, मिलिंद देवड़ा, जितिन प्रसाद, दीपेंद्र हुड्डा और सचिन पायलट की। इन लोगों का कोई कसूर नहीं होते हुए भी इनका उत्थान और पतन उसी तरह हुआ, जिस तरह राहुल गांधी का हुआ।
कहानी शुरू करते हैं ज्योतिरादित्य सिंधिया से। पार्टी में कभी उनकी तूती बोलती थी। अपने दिवंगत पिता की राजनीतिक विरासत संभालने के लिए उन्होंने चुनाव लड़ा और जीते भी। प्रशासन का तजुर्बा दिलवाने के लिए उन्हें राज्यमंत्री भी बनाया गया। आज हालत यह है कि वह मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ और ‘सुपर चीफ मिनिस्टर’ कहे जाने वाले दिग्विजय सिंह की जोड़ी के खिलाफ अकेले लड़ाई लड़ रहे हैं। लोकसभा चुनाव में पराजित होने के बावजूद सिंधिया ने राजनीति में अपनी जगह बचाने के लिए सब कुछ किया, लेकिन आज वह पूरी तरह अकेले पड़ गये हैं। लोकसभा चुनाव में अपनी गुना सीट हार जाने के बाद ज्योतिरादित्य सिंधिया को अपने ही गढ़ में पार्टी द्वारा लगभग अप्रासंगिक बना दिया गया। उन्हें ऐसी जिम्मेवारियां दी गयीं, जिन्हें वह कभी चाहते ही नहीं थे। अब अटकलें हैं कि ज्योतिरादित्य सिंधिया कांग्रेस छोड़कर भाजपा में जाने की कोशिश कर रहे हैं। इसकी बातचीत काफी आगे पहुंच चुकी है।
कांग्रेस के दिग्गज मुरली देवड़ा के पुत्र मिलिंद देवड़ा भी पार्टी से निराश हैं। मुंबई दक्षिण संसदीय क्षेत्र से चुनाव हार चुके मिलिंद देवड़ा भी कांग्रेस को डूबती हुई नाव मान चुके हैं और इससे छलांग लगाने की तैयारी में हैं। लगभग यही स्थिति जितिन प्रसाद और हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र हुड्डा के पुत्र दीपेंद्र हुड्डा की है।
इन चारों नेताओं के हाल के बयानों से स्पष्ट है कि ये बेहद बेचैन हैं और अपने राजनीतिक भविष्य को लेकर चिंतित भी हैं। चाहे अनुच्छेद 370 को हटाने का मामला हो या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जनसंख्या नियंत्रण के विचार का, इन सभी ने पार्टी लाइन से अलग हट कर स्वागत किया था।
जितिन प्रसाद तो लोकसभा चुनाव से पहले ही भाजपा में जाने की पूरी तैयारी कर चुके थे। बताया जाता है कि राहुल गांधी के साथ कार में बैठकर की गयी एक यात्रा के बाद उन्होंने अपना इरादा बदल लिया था। अब कांग्रेस में राहुल का युग खत्म होने के बाद वह एक बार फिर भाजपा से बातचीत करने लगे हैं।
राजस्थान का मुख्यमंत्री बनने की अपनी आकांक्षा को कई बार सार्वजनिक कर चुके सचिन पायलट भी अपने स्वभाव के विपरीत मौजूदा अफरा-तफरी में बिल्कुल चुप्पी साधे हुए हैं। हालांकि भाजपा में उन्हें कोई भविष्य नहीं दिखता, क्योंकि भाजपा के पास राजस्थान में वसुंधरा राजे और गजेंद्र सिंह शेखावत हैं।
इसलिए चर्चा है कि सचिन भाजपा में जाने की बजाय चुपचाप खुद की एक क्षेत्रीय पार्टी लांच करने पर विचार कर रहे हैं।
कांग्रेस में अगली पीढ़ी के नेता तरक्की के अवसरों के अभाव और पार्टी के मौजूदा वैचारिक ठहराव की वजह से नाराज हैं। पार्टी के युवा नेताओं का कहना है कि हम चुनाव हारते रहेंगे, क्योंकि मतदाताओं को पता ही नहीं है कि हम किस बात का समर्थन कर रहे हैं। अर्थव्यवस्था की खराब स्थिति को लेकर हम जमीन पर एक विरोध प्रदर्शन तक नहीं कर सकते, क्योंकि हमारे पास न नेतृत्व है, न कार्यकर्ता। यह राहुल गांधी के लिए सही हो सकता है, क्योंकि वह मनमोहन सिंह के कैबिनेट में भी मंत्री नहीं बनना चाहते थे। लेकिन हम राहुल गांधी नहीं हैं। हम मंत्री बनना चाहते थे। हमने मेहनत की और तौर-तरीके सीखे। अब उनकी गद्दी को तो उनकी मां ने संभाल लिया है, लेकिन सवाल यह है कि हम कहां जायें।
कांग्रेस के भीतर चल रही इस उथल-पुथल के कारण जहां पार्टी का वजूद संकट में है, वहां देश का राजनीतिक परिदृश्य भी बदलाव के दौर में है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि कांग्रेस इस बदलाव के झटकों को कितना और कैसे झेलती है।

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