कोरोना महामारी के कारण पिछले साढ़े पांच महीने से जारी लॉकडाउन के बीच बिहार में विधानसभा चुनाव की तैयारियां सियासी महकमों में पूरे जोर-शोर से चल रही हैं। अक्टूबर-नवंबर में होनेवाले चुनाव में राज्य विधानसभा की 243 सीटों पर सत्ताधारी एनडीए का मुकाबला राजद के नेतृत्व में आकार ले रहे महागठबंधन से होना लगभग तय है। इस सीधे मुकाबले में किसका पलड़ा भारी रहेगा, इसको लेकर अभी से जोड़-घटाव होने लगे हैं। देश के सियासी तापमान का एक पैमाना हमेशा से बिहार रहा है और यहां के चुनाव हमेशा से पूरे देश का ध्यान खींचते रहे हैं। इस बात में कोई संदेह नहीं है कि बिहार की राजनीति का असर देश की सियासत पर भी दिखाई पड़ता है, लेकिन दोनों राष्ट्रीय पार्टियां यहां आकर सहयोगी की भूमिका निभाने लगती हैं, क्योंकि यहां मुख्य मुकाबले की कमान जदयू और राजद के हाथों में ही रहती है। बिहार की सियासत में जातीय समीकरण की हमेशा से प्रमुख भूमिका रही है और सामंतवादी सोच के पिंजड़े से यह प्रदेश अब तक पूरी तरह बाहर नहीं निकल सका है। यही कारण है कि बिहार के चुनाव में राष्ट्रीय दलों की भूमिका सहयोगी की होती है। देश भर में अनलॉक का चौथा चरण शुरू होने के साथ बिहार में राजनीतिक गतिविधियां अब तेज होने लगी हैं। स्वाभाविक तौर पर इसका असर झारखंड पर भी पड़ेगा, क्योंकि यह भी कभी बिहार का ही हिस्सा था। बिहार के चुनावी परिदृश्य का आकलन करती आजाद सिपाही पॉलिटिकल ब्यूरो की विशेष रिपोर्ट।
बिहार, जिसका नाम पूरी दुनिया में इसकी राजनीतिक संवेदनशीलता के कारण लिया जाता है, एक बार फिर विधानसभा चुनाव के मुहाने पर खड़ा है। कोरोना महामारी के बीच यह पहला राज्य है, जहां अगले दो महीने के भीतर विधानसभा के चुनाव होंगे। जातीय समीकरण और अलग किस्म की राजनीति के लिए मशहूर बिहार में अब तक चुनाव की घोषणा नहीं हुई है, लेकिन चुनाव आयोग ने साफ कर दिया है कि वह तय समय पर चुनाव कराने के लिए पूरी तरह तैयार है। इसलिए तमाम राजनीतिक दल अपने-अपने किले को मजबूत करने में जुट गये हैं। राज्य में पिछले 15 साल से सत्तारूढ़ नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार इस बार चौका लगाने के लिए तैयार दिख रही है, जबकि उसका रास्ता रोकने के लिए राजद के नेतृत्व वाले महागठबंधन में इस बात पर मंथन चल रहा है कि सत्ता हासिल करने के रास्ते में पड़ी बाधाओं को हटाने के लिए किसे आगे किया जाये।
बात शुरू करते हैं सत्ताधारी एनडीए से। इस गठबंधन की कमान एक बार फिर नीतीश कुमार के हाथों में रहेगी। यह बात न केवल जदयू, बल्कि भाजपा भी स्पष्ट कर चुकी है। पिछले विधानसभा चुनाव में, जब नीतीश ने एनडीए से अलग होकर लालू से हाथ मिला लिया था और भाजपा को पराजय का सामना करना पड़ा था, तब से ही दुनिया की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी को अपनी गलती का एहसास हो रहा है। इसलिए इस बार वह किसी भी कीमत पर नीतीश के समानांतर नेतृत्व विकसित करने का प्रयास भी नहीं कर रही है। एनडीए के लिए लाभ की स्थिति यह है कि भाजपा जहां सवर्ण वोटों को एकजुट रखने में सफल होती दिख रही है, वहीं नीतीश का चेहरा कुरमी और मुस्लिम मतदाताओं में अपनी जमीन को अटूट रखने में अब तक सफल रहा है। एनडीए को उस समय महागठबंधन के मुकाबले बड़ी सियासी जीत हासिल हुई, जब हिंदुस्तान अवाम मोर्चा के जीतन राम मांझी महागठबंधन से अलग होकर एनडीए में आ गये। एनडीए को भरोसा है कि हम और लोजपा के जरिये वह राजद के पिछड़े वोटों में अच्छी-खासी सेंधमारी कर लेगा। इसके साथ ही नेता के रूप में नीतीश कुमार उसके सबसे बड़े हथियार हैं, जिनके सामने महागठबंधन का कोई नेता नहीं टिकता है। केंद्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का चेहरा एनडीए के आयुध भंडार को अतिरिक्त ताकत प्रदान कर रहा है।
जहां तक महागठबंधन की बात है, तो इसकी कमान राजद के हाथों में है। कांग्रेस सहयोगी की भूमिका में है। इस खेमे के भीतर की हालत यह है कि अब तक इसका नेता ही तय नहीं हो पाया है। लालू यादव हालांकि जेल में रहते हुए विधानसभा चुनाव के मद्देनजर सक्रिय बताये जाते हैं, लेकिन लंबे समय से सियासत से अलग रहने के कारण अपनी ही पार्टी पर उनकी पकड़ ढीली पड़ती दिख रही है। उन्होंने अपने छोटे पुत्र तेजस्वी को अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी तो बना दिया है, लेकिन गठबंधन तो दूर की बात, राजद में ही उनके नाम पर मतैक्य नहीं दिख रहा है। लालू के बड़े पुत्र तेजप्रताप के तेवर भी अलग हैं। राजद के भीतर का तीसरा खेमा उन वरिष्ठ नेताओं का है, जो कभी लालू के नजदीकी हुआ करते थे, लेकिन अब हाशिये पर हैं। विधानसभा चुनाव में राजद के भीतर का यह टकराव महागठबंधन के लिए महंगा पड़ सकता है। राजद फिलहाल अपने कुनबे को संभालने में जितनी ताकत लगा रहा है, उससे तो यही लगता है कि उसकी नाव इस चुनावी सुनामी का सामना करने के लिए पूरी तरह तैयार भी नहीं होगी।
जहां तक कांग्रेस का सवाल है, तो दिसंबर में झारखंड में हुए चुनाव ने उसे नयी ऊर्जा दी है। पार्टी नेताओं को भरोसा है कि इसका असर बिहार में भी पड़ेगा। इसलिए पार्टी खुद को एक बार फिर खड़ा करने के लिए हर जुगत भिड़ा रही है। पार्टी का चुनावी अभियान तीन दिन बाद शुरू होनेवाला है, जिसमें उसके नेता वर्चुअल रैली के माध्यम से लोगों तक पहुंचने की कोशिश में जुट गये हैं। लेकिन बिहार की सियासत में कांग्रेस का वापस आना बेहद मुश्किल लग रहा है। महागठबंधन में शामिल अन्य दलों की स्थिति लगभग वैसी ही है, जैसे सब्जी में तेजपत्ते का होता है।
बहरहाल, एक बात तय है कि बिहार विधानसभा की 243 सीटों के लिए होनेवाला चुनाव हर बार की तरह इस बार भी बेहद रोमांचक होगा। पिछले चुनाव में राजद को सबसे अधिक सीटें मिली थीं, लेकिन उस समय लालू यादव परिदृश्य में थे। इस बार राजद को उनकी कमी खल रही है। बिहार में क्या होगा और किसकी गोटी लाल होगी, यह कहना अभी जल्दबाजी होगी, लेकिन इतना जरूर कहा जा सकता है कि सियासत का यह महाभारत किसी भी पक्ष के लिए आसान नहीं होगा।