लोकतांत्रिक व्यवस्था में परिवर्तन को आंकने का एक हथियार आंदोलन भी होता है। किसी भी राजनीतिक दल की जनता के बीच पकड़, उसकी मजबूती और प्रभाव के आकलन का सबसे बड़ा पैमाना होता है उसके द्वारा आहूत कार्यक्रमों, आंदोलनों और प्रदर्शन में उसके समर्थकों की उपस्थिति। विषम परिस्थिति में भी वहां उपस्थित नेताओं-कार्यकर्ताओं का धैर्य और अनुशासन। हर कार्यक्रम के बाद पक्ष और विपक्ष इसका आकलन करते हैं। उसी पैमाने के आधार पर कोई कार्यक्रम को सफल तो कोई विफल करार देता है। प्रदेश भाजपा ने विधानसभा में मुसलिम धर्मावलंबियों को नमाज पढ़ने के लिए विधानसभा अध्यक्ष की ओर से कमरा आवंटित करने और नयी नियोजन नीति के साथ-साथ हिंदी, भोजपुरी और अंगिका को हटा देने के विरोध में बुधवार को विधानसभा घेराव का आह्वान किया था। जाहिर है, इस आंदोलन की सफलता और विफलता पर पक्ष-विपक्ष के अपने-अपने तर्क होंगे। विपक्ष जहां आंदोलन को सफल बताते हुए फुले नहीं समा रहा, वहीं सत्ता पक्ष इसे विफल बता रहा है। इन सबके इतर आजाद सिपाही आंदोलन के उन बिंदुओं की तरफ ध्यान आकर्षित कराना चाहता है, जो हजारों की संख्या में जुटे भाजपा कार्यकर्ताओं के बीच देखा गया। पुलिस की तरफ से लाठीचार्ज और उसमें नेताओं-कार्यकर्ताओं की पिटाई के बाद भी कार्यकर्ताओं ने धैर्य बनाये रखा। कार्यकर्ताओं की तरफ से न तो पुलिसकर्मियों पर पत्थरबाजी की गयी और न ही कार्यकर्ताओं ने इस दौरान किसी भी तरह की निजी या सरकारी संपत्ति को निशाना बनाया। आजाद सिपाही के विशेष संवाददाता राकेश सिंह की नजर में भाजपा का यह आंदोलन संयम, धैर्य और अनुशासन की दृष्टि से हाल के दिनों में हुए तमाम आंदोलनों से अलग रहा। उसने एक अलग ही छाप छोड़ी है। उन तमाम बिंदुओं को उकेरती उनकी यह खास रिपोर्ट।
लोकतांत्रिक व्यवस्था में घेराव, प्रदर्शन, बैरिकेडिंग तोड़ना और उसके बाद भीड़ को रोकने के लिए पुलिस की ओर से लाठीचार्ज करना सामान्य घटना है। कारण आंदोलन होता ही है, मौजूदा व्यवस्था को भेदने के लिए और पुलिस लाठीचार्ज इसलिए करती है कि उसे हर हाल में कानून-व्यवस्था बनायी रखनी होती है। जब भीड़ अनियंत्रित हो जाती है, तो उसे रोकने का हथियार पानी की बौछार और फिर लाठीचार्ज ही होता है। बुधवार को झारखंड प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष दीपक प्रकाश और भाजपा विधायक दल के नेता बाबूलाल मरांडी के आह्वान पर राज्य के कोने-कोने से आये नेता और कार्यकर्ता मौजूदा व्यवस्था से एतराज जताने के लिए ही जुटे थे। भाजपा कार्यकर्ताओं की तरफ से व्यवस्था तोड़ने और पुलिस की तरफ से व्यवस्था को हर हाल में बनाये रखने के लिए लाठीचार्ज के दरम्यान तीन ऐसे दृश्य हमारे समक्ष उत्पन्न हुए, जिनमें आंदोलनकारियों और कुछ पुलिसकर्मियों का मानवीय चेहरा सामने आया। आंदोलन दौरान भाजपा ओबीसी मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष अमरदीप यादव को पुलिसकर्मियों ने चारों तरफ से घेर लिया। तीन-चार पुलिसकर्मी लाठी से उन्हें पीटने लगे। भागने के क्रम में अमरजीत यादव गिर पड़े और लाठी के वार से उनका सिर लहूलुहान हो गया। लेकिन इसके बावजूद उन्हें पीटनेवाले पुलिसकर्मी अपना पौरुष दिखाते रहे। इसी बीच एक महिला पुलिसकर्मी की इंसानियत सामने आयी। वह पुलिसकर्मी अमरदीप यादव को बचाने के लिए झुक गयी और इस क्रम में पुलिस की दो-तीन लाठी उसे भी लगी, लेकिन उसने मार खाकर भी अमरदीप यादव को बचाया। यह सामान्य घटना नहीं है। इस घटना में पुलिस का वह चेहरा भी छिपा हुआ है, जिसकी उम्मीद संकट में घिरा हर व्यक्ति करता है। जाहिर है, अगर महिला अमरदीप यादव को अपने सुरक्षा घेरे में नहीं लेती, तो उनकी हालत गंभीर हो सकती थी।
भाजपा प्रदेश महिला मोर्चा की अध्यक्ष आरती कुजूर आंदोलन के क्रम में आक्रामक हो गयीं और वह पुलिस का सुरक्षा घेरा तोड़ आगे बढ़ने की कोशिश करने लगीं। उन्हें रोकने के लिए पांच-छह महिला पुलिसकर्मियों ने उन्हें धक्का देना शुरू किया। इस क्रम में चार-पांच महिला पुलिसकर्मी उन पर लाठियां भी बरसाने लगीं। इसी बीच एक महिला पुलिसकर्मी ने आरती कुजूर को अपनी अकवार में ले लिया और पुलिस की लाठी के वार से उन्हें बचाने का हरसंभव प्रयास किया। इसका असर यह हुआ कि सहयोगी महिला पुलिसकर्मियों की लाठियां थम गयीं और आरती कुजूर की हालत गंभीर होने से बच गयी।
भाजपा विधायक दल के नेता बाबूलाल मरांडी ने खुद कहा है कि अगर सीआरपीएफ जवान नहीं होता, तो आज आप लोग हमारी शोकसभा में उपस्थित होते। जिस समय बाबूलाल मरांडी विरोध स्वरूप पुलिस का सुरक्षा घेरा तोड़ कर आगे बढ़ रहे थे, पुलिस ने उन्हें भी रोकने का प्रयास किया। इसी क्रम में किसी पुलिसकर्मी ने लाठी भाजनी शुरू कर दी। उनके सिर को निशाना बना कर पुलिसकर्मी ने लाठी मारी, लेकिन इसी बीच सुरक्षा में तैनात सीआरपीएफ जवान की चौकन्नी आंखों ने यह देख लिया और बाबूलाल मरांडी के सिर पर लाठी लगने से पहले ही उसने पकड़ लिया। फिर उनके सुरक्षाकर्मियों ने लाठी लिये पुलिसकर्मियों को धक्का देकर हटाया। यानी मारनेवाला भी जवान और बचानेवाला भी जवान।
जब भी कोई बड़ा आंदोलन या आक्रामक आंदोलन होता है, तो उसमें शामिल कार्यकर्ताओं का तेवर बहुत कड़ा होता है। अमूमन लाठीचार्ज के बाद कार्यकर्ता उग्र हो जाते हैं और अपना गुस्सा आम जन पर उतारने लगते हैं। इस क्रम में दुकानों में तोड़फोड़, वाहनों में तोड़फोड़, पत्थरबाजी, र्इंटबाजी सामान्य घटना मानी जाती है। लेकिन बुधवार को भाजपा के आंदोलन में लाठी चार्ज के बाद भी कार्यकर्ताओं का गुस्सा आमजन के खिलाफ नहीं दिखा। किसी दुकान के शीशा टूटने, वाहन में तोड़फोड़ की कोई सूचना सामने नहीं आयी। लगभग दो दर्जन नेताओं-कार्यकर्ताओं के घायल होने के बावजूद उपस्थित भीड़ का यह धैर्य बहुत कुछ कहता है।
दरअसल इस धैर्य में भाजपा प्रदेश अध्यक्ष दीपक प्रकाश की नेतृत्व क्षमता भी परिलक्षित होती है। कार्यकर्ताओं के सिर से खून बहने के बावजूद भीड़ में धैर्य बना रहना लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए सुखद संकेत ही कहा जा सकता है। इसी तरह कई साल बाद भाजपा कार्यकर्ताओं ने बाबूलाल मरांडी का आंदोलकारी चेहरा देखा है। धरना, जुलूस, प्रदर्शन और प्रेस कांफ्रेंस तो वह हमेशा करते रहे हैं, लेकिन बुधवार को बाबूलाल मरांडी भाजपा कार्यकर्ता की भूमिका में थे। पूर्व सांसद डॉ रवींद्र कुमार राय और सांसद वीडी राम के साथ जुलूस में चल रहे थे। इस दरम्यान बाबूलाल मरांडी अपने दोनों हाथ उठा-उठा कर नारा लगा रहे थे। उनकी चाल बता रही थी कि वह जोश से लबरेज हैं। नेताओं का यह उत्साह कार्यकर्ताओं में जोश भरता है।
इस आंदोलन की सफलता-विफलता का आकलन पक्ष और विपक्ष अलग-अलग तरीके से करेंगे। कोई इसे लोकतंत्र पर हमला बतायेगा, तो कोई इसकी खामियां गिनायेगा। कुछ दल भाजपा की जम कर आलोचना करेंगे, तो भाजपाई पुलिस की बर्बरता की बात कहेंगे। लेकिन यह सच है कि 1992 के बाद आंदोलन के क्रम में भाजपा का यह चेहरा अब दिखायी पड़ा है। 2014 के पहले भी कुछ अवसरों पर भाजपा ने यह एकजुटता दिखायी थी, जिसमें राजभवन के सामने धरना पर बैठे यशवंत सिन्हा और अन्य नेताओं ने लाठियां खायी थीं, लेकिन उस धरना में प्रेदश कार्यकर्ताओं का चेहरा नहीं था। उसमें सिर्फ रांची के कार्यकर्ता शामिल हुए थे और उनकी संख्या एक हजार के आसपास रही होगी।
सच कहा जाये, तो लंबे समय के बाद भाजपा के कार्यकर्ता फेसबुक और ट्विटर से बाहर निकले हैं। जन्मदिन की बधाई, वैवाहिक वर्षगांठ और गुड मार्निंग और गुड नाइट से अलग हट कर अपनी पूरी ऊर्जा को आंदोलन में लगाया है। एक और बात उल्लेखनीय रही कि इसमें किसी नेता में नेतृत्व की होड़ नहीं दिखी। नेता कार्यकर्ताओं के साथ कंधे से कंधा मिला कर चल रहे थे। यह पहला अवसर था, जहां दीपक प्रकाश, बाबूलाल मरांडी, रघुवर दास के साथ-साथ सांसद, विधायक और तमाम मोर्चा के नेता-कार्यकर्ता एक चाल में दिखे। नेता की भूमिका से अलग, कार्यकर्ता की भूमिका में।
2019 में सत्ता गंवाने के बाद जिस तरीके से भाजपा कार्यकर्ता और नेता निराश, हताश और मौन मुद्रा में चले गये थे, आज वही नेता-कार्यकर्ता सदन से सड़क तक फुल चार्ज हैं। कहते हैं नेता अगर घर बैठ जाये तो वह अपनी धार और उद्देश्य दोनों खो बैठता है। दीपक प्रकाश यह बखूबी समझ रहे थे। वह जान रहे थे कि अगर कार्यकर्ताओं में जान फूंकनी है, हार के बाद नीरस हो रहे नेताओं में जोश जगाना है तो सड़क पर निकलना ही होगा। और इसके लिए भाजपा कार्यकर्ताओं को संगठित होना जरूरी था। हर पोलिटिकल पार्टी के अंदर भी पॉलिटिक्स होती है, लेकिन भाजपा नेता-कार्यकर्ता यह अच्छी तरह समझ रहे थे कि अभी दल-दल का खेल खेलने का वक़्त नहीं था। हार के दल-दल से निकलने का वक़्त था। जिस प्रकार से भाजपा ने मुद्दों को पकड़ना शुरू किया और अंत तक अपनी उपस्थिति उन मुद्दों को अंजाम तक पहुंचने में दर्ज करायी, यही कारण रहा कि आज पार्टी में फिर से जान आ गयी है। बुधवार को हुए आंदोलन में भाजपा नेताओं और काफी संख्या में कार्यकर्ताओं की उपस्थिति एक कुशल नेतृत्व क्षमता की ओर ही कि इशारा कर रही है। अनुमान लगाया जा सकत ा है जब पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष दीपक प्रकाश के पेट में लाठी घुसेड़ने की कोशिश की गयी। उनकी बांह पर प्रहार किया गया, बाबूलाल मरांडी जैसे नेता को टारगेट कर सिर पर लाठी बरसाने की कोशिश की गयी, तब भी उनके साथ खड़े कार्यकर्ताओं का धैर्य जवाब नहीं दिया। ये एक कुशल नेतृत्व को ही परिभाषित करता है।
आंदोलन के दरम्यान बाबूलाल मरांडी जिस अंदाज में नजर आये, ऐसा लग रहा था कि एक समर्पित युवा कार्यकर्ता सड़क पर उतर कर अपनी पार्टी और आंदोलन को नयी धार देने की कोशिश कर रहा है। वहीं बात करें दीपक प्रकाश की, तो इस आंदोलन के दौरान उनकी लीडरशिप निखर कर सामने आयी। जिस प्रकार से लाठी डंडों के बीच वह अपने घायल कार्यकर्ताओं का हौसला बढ़ा रहे थे और खुद चोटिल होने के बाद भी वह तनिक भी अपने पथ से विचलित नहीं हुए। वह कभी घायल कार्यकर्ता को दौड़ दौड़ कर पानी पिला रहे थे, कहीं अपने कार्यकर्ताओं को बचा रहे थे। कभी कार्यकर्ताओं में जोश जगा रहे थे। कहते रहे भाजपा लाठी डंडों से डरनेवाली नहीं है। यह एक सशक्त लीडरशिप की ओर इशारा करता है। दीपक प्रकाश कहते हैं: इस आंदोलन के दौरान भारतीय जनता पार्टी एक पार्टी ही नहीं एक परिवार के रूप में सामने आयी। अगर किसी को चोट लग रही थी तो दर्द सभी को हो रहा था। क्या नेता, क्या बड़ा नेता, क्या प्रवक्ता इस आंदोलन में हर कोई कार्यकर्ता की भूमिका निभा रहा था।
वहीं सांसद संजय सेठ, वीडी राम, रघुवर दस, रविंद्र राय, सुबोध सिंह गुड्डू, दीपक बंका, प्रतुल शाहदेव, ललित ओझा, आरती कुजूर, संजय जायसवाल और अन्य बड़े नेता भी इस आंदोलन में शामिल होकर पार्टी का हौसला बढ़ा रहे थे। इसी तरह विधानसभा में विधायक बिरंची नारायण, सीपी सिंह, अनंत ओझा, अमर कुमार बाउरी, भानू प्रताप शाही, नारायण दास समेत अन्य विधायक विधानसभा के प्रांगण और सदन में आंदोलन को जीवित रखा। जो नेता जहां था, वह वहीं से इस आंदोलन में शामिल हो रहा था। चाहे फेसबुक के माध्यम से हो या ट्विटर से। झारखंड भाजपा के लिए यह आंदोलन एक नयी ऊर्जा दे गया। इस आंदोलन ने यह भी स्थापित कर दिया कि लाठी डंडा खाने के बाद भी बिना तोड़ फोड़, आगजनी और लूटपाट के भी आंदोलन सफल हो सकता है। बिना पब्लिक प्रॉपर्टी को नुकसान पहुंचाये झारखंड में आंदोलन हो सकता है। बिना किसी बिल्डिंग का शीशा फोड़े आंदोलन हो सकता है। बिना किसी आम इंसान को नुकसान पहुचाये आंदोलन हो सकता है। भाजपा ने इस आंदोलन के जरिये एक नयी रेखा खिंच दी है।