झारखंड हाई कोर्ट के वरीय अधिवक्ता ए अल्लाम के अनुसार 1932 के खतियान के आधार पर स्थानीय नीति बनाना उचित नहीं है। अगर इसे हाई कोर्ट में चुनौती दी गई तो यह कानून की कसौटी पर खरा नहीं उतरेगा और इसे निरस्त कर दिया जाएगा। उन्होंने कहा कि उनका परिवार करीब 70 सालों से यहां रहता है। ऐसे में उनके बच्चे यहीं पैदा हुआ और पढा़ई भी की है। ऐसे में उन्हें कहां की स्थानीयता मिलेगी। इसलिए उक्त राज्य सरकार की उक्त नीति सही नहीं है।
हाई कोर्ट के वरीय अधिवक्ता अजीत कुमार का कहना है कि राज्य सरकार की ओर से ओबीसी के लिए आरक्षण दर बढ़ाया जाना सही हैं। क्योंकि इसको लेकर सुप्रीम कोर्ट ने इंद्रा साहनी और मराठा आरक्षण में की शर्तें लगाई थी। ऐसा प्रतीत होता है कि उन शर्तों को पूरा किए बिना ही आनन-फानन में सरकार ने इस तरह का फैसला लिया है। उन्होंने आशंका जतायी है की यह हाई कोर्ट में नहीं टिकेगी। सुप्रीम कोर्ट के अनुसार एक अपवाद और विशेष परिस्थिति में लागू किया जा सकता है। सरकार का कदम लोक लुभावन जरूर है, लेकिन इससे पिछड़े वर्गों को कोई फायदा नहीं होगा।
हाई कोर्ट के वरीय अधिवक्ता अजीत कुमार ने 1932 के खतियान के आधार पर स्थानीय नीति बनाए जाने पर कहा कि यह स्पष्ट नहीं है कि क्या सरकार ने इसे नियोजन नीति से जोड़ा है। क्योंकि इसे पूर्व में झारखंड हाई कोर्ट की संवैधानिक पीठ खारिज कर चुकी है। सरकार अगर निर्धारित शर्तों का पालन किए बिना ही ऐसी नीति बना रही है, तो यह सिर्फ कागजी रह जाएगा। कुल मिलाकर दोनों फैसले राजनीतिक प्रतीत हो रहे हैं।