भारतीय लोकतंत्र का चुनावी इतिहास हमेशा से रोमांचक संघर्षों का गवाह रहा है, लेकिन इसके अलावा एक और बात, जो भारत के चुनावों ने कई बार प्रमाणित की है, वह है इसकी अनिश्चितता और मतदाताओं की निर्णय क्षमता। हर चुनाव भारत के लोकतंत्र को मजबूती प्रदान करता आया है, नये किस्से, नये समीकरण और नयी सियासी परिस्थितियों का निर्माण करता रहा है। चुनावों में कई नेता खोते रहे हैं, तो कई नये नेताओं के अभ्युदय का गवाह भी चुनावी मैदान बने हैं। लेकिन ऐसा बहुत कम बार हुआ है कि कोई चुनाव पीढ़ियों के बदलाव का गवाह बने। बिहार में इस बार का चुनाव ऐसा ही कुछ है, जिसमें पुरानी पीढ़ी के अवसान और नयी पीढ़ी के उदय होने के साफ संकेत मिल रहे हैं। बिहार में चुनावी मुकाबले की जो तस्वीर तैयार हो रही है, उससे साफ है कि इस बार मुकाबले में पुरानी पीढ़ी के नेता कम ही दिखेंगे और युवा नेताओं की क्षमता की अग्निपरीक्षा होगी। बिहार के चुनावी रण में उतरनेवाले हरेक दल ने इस बार अपने बुजुर्ग नेताओं की अपेक्षा युवाओं को तरजीह दी है। इतना ही नहीं, कम से कम तीन दल की कमान भी युवा नेताओं के कंधों पर है और यह चुनाव उनके नेतृत्व के उभार और पराभव का साक्षी बनेगा। बिहार के चुनाव में युवाओं की धमाकेदार इंट्री पर आजाद सिपाही विशेष की खास रिपोर्ट।
भारतीय राजनीति में 1974 के छात्र आंदोलन को बड़ा टर्निंग प्वाइंट माना जाता है। उस आंदोलन की खास बात यह थी कि वह राजनीति में पीढ़ियों के बदलाव का गवाह बना था। जेपी आंदोलन के नाम से मशहूर उस आंदोलन के बाद पहली बार लागू की गयी इमरजेंसी और बाद में गैर-कांग्रेसी दलों का उदय भी उसी आंदोलन का परिणाम माना जाता है। उस आंदोलन के साढ़े चार दशक बाद आज जब बिहार में चुनाव हो रहे हैं, एक बार फिर पीढ़ियों के बदलाव का नजारा सामने दिख रहा है। जेपी आंदोलन ने बिहार से देश को नया संदेश दिया था, तो क्या इस बार के चुनाव में वही इतिहास दोहराया जायेगा। अभी यह कहना जल्दबाजी होगी, लेकिन एक बात तय है कि बिहार की धरती इस बार युवा नेतृत्व के उदय और पुरानी पीढ़ी के अवसान की गवाह जरूर बनेगी।
यह बात इसलिए भी पक्की है, क्योंकि बिहार में इस बार कम से कम तीन युवा नेताओं की अग्नि परीक्षा होगी, जिन्होंने अलग किस्म की परिस्थितियों में अपनी राजनीति शुरू की। पिछले चार दशक से सियासत में छाये रहे लालू प्रसाद यादव, रामविलास पासवान, सदानंद सिंह और शिवानंद तिवारी सरीखे राजनीतिज्ञों की कमी इस बार खलेगी। लालू प्रसाद भले ही नेपथ्य से अपनी पार्टी की कमान संभाल रहे हैं, लेकिन चुनाव में उनकी भूमिका नहीं होगी, जबकि रामविलास पासवान का निधन हो गया है। शिवानंद तिवारी और सदानंद सिंह ने भी चुनावी राजनीति से विश्राम ले लिया है। इन सभी नेताओं में एक बात समान रूप से लागू होती है कि इन सभी ने सुदूर गांव और कमजोर आर्थिक पृष्ठभूमि से निकल कर सत्ता के शिखर तक की यात्रा तय कर मिसाल भी कायम की।
बिहार में इस बार तीन युवा नेताओं की खूब चर्चा है। इन तीन युवाओं के साथ भी एक बात समान रूप से लागू होती है कि इन्होंने उन परिस्थितियों का सामना कभी नहीं किया, जो उन बुजुर्ग नेताओं ने की थी। इन युवा नेताओं में 30 वर्षीय तेजस्वी महागठबंधन के नेता हैं, तो 37 वर्षीय चिराग लोजपा का चेहरा हैं। इन दोनों को राजनीति विरासत में मिली है। वीआइपी के अध्यक्ष 39 वर्षीय मुकेश सहनी मुंबई में कारोबरी रहे। इन्होंने अपनी पार्टी बनायी और पहली बार चुनाव में उतरे हैं। सहनी ने एनडीए में भाजपा कोटे से 11 सीटें हासिल कर बड़ी कामयाबी भी दर्ज कर ली है। लोकसभा का चुनाव इन्होंने महागठबंधन के बैनर तले लड़ा था। इन तीनों नये नेताओं की सामाजिक पृष्ठभूमि भी मंडलवादी राजनीतिक धारा से जुड़ती है। तेजस्वी पिछड़ा, तो चिराग दलित और मुकेश अति पिछड़ा श्रेणी के हैं। इन तीनों में एक समानता यह भी है कि सियासत का सफर न तो इन्होंने गांव से शुरू किया और न आर्थिक तंगी में रहते हुए। रामविलास पासवान और लालू प्रसाद बहुत साधारण पारिवारिक पृष्ठभूमि से आये और सियासत की बुलंदियों तक पहुंचे। वैचारिक प्रतिबद्धता और बदलाव की सामाजिक चाहत ने इनकी राह आसान की। लेकिन इनके उत्तराधिकारी बने तेजस्वी और चिराग की राह साधन संपन्नता और मजबूत सियासी संरचना के बावजूद आसान नहीं है। तेजस्वी ने महागठबंधन के सीएम पद का उम्मीदवार बनने की बड़ी सफलता दर्ज कर ली है, लेकिन उन्हें सभी सहयोगी दलों को विश्वास में रखकर चलने की क्षमता साबित करनी होगी, तभी उनकी अपनी अलग छवि कायम हो सकेगी। लोकसभा चुनाव में भी तेजस्वी को महागठबंधन में बिहार का नेता बनने का सौभाग्य मिला था, लेकिन उस समय वह सभी दलों को साथ रखकर एकजुटता का प्रदर्शन करने में हर मोर्चे पर चूक गये थे। इसी तरह चिराग को भी अपने पिता की मजबूत सियासी धरातल हाथ लगी है। उन्होंने अकेले चुनाव में जाने की हिम्मत दिखायी है। यह साहस तो रामविलास पासवान भी नहीं दिखा पाये। लेकिन चिराग को यह साबित करना होगा कि उनका फैसला सही था।
इन तीन युवा नेताओं के अलावा कई ऐसे राजनेता भी हैं, जो इस बार चुनाव मैदान में नहीं दिखेंगे। इन नेताओं ने अपनी विरासत अपने पुत्र-पुत्रियों को सौंप दी है। कई नेता ऐसे भी हैं, जिन्होंने अपने रिश्तेदारों के जरिये भी अपनी मौजूदगी दर्ज कराने के लिए कमर कसी है। यह सभी दलों में हो रहा है। चाहे भाजपा हो या जदयू, कांग्रेस हो या राजद, सभी पार्टियों में पुत्र-पुत्रियों को टिकट मिला है। कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष मदन मोहन झा ने अपने पुत्र माधव झा को, तो सदानंद सिंह ने अपने पुत्र शुभानंद मुकेश को टिकट दिलाया है। राजद नेता शिवानंद तिवारी के पुत्र राहुल तिवारी, कांति सिंह के पुत्र ऋषि सिंह और पूर्व सांसद जयप्रकाश यादव की पुत्री दिव्य प्रकाश को भी राजद ने टिकट दिया है।
इतनी बड़ी संख्या में युवा नेताओं के चुनाव मैदान में उतरने से ही साफ हो जाता है कि बिहार का यह चुनाव दो पीढ़ियों के बीच विरासत के हस्तांतरण का गवाह जरूर बनेगा। लेकिन भारतीय मतदाताओं ने वंशवाद की इस परंपरा को बहुत अधिक पसंद नहीं किया है। इसके बावजूद यदि राजनीतिक दल बिहार में इसे जारी रखे हुए हैं, तो कुछ तो बात जरूर होगी।

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