विशेष
वोटर्स उत्साहित, बराबर का मुकाबला होना तय
न सत्ता पक्ष हो सकता है निश्चिंत और न विपक्ष कर सकता है रिलैक्स
चुनाव जीतने के लिए दोनों पक्षों की तरफ से झोंकनी होगी पूरी ताकत
नमस्कार। आजाद सिपाही विशेष में आपका स्वागत है। मैं हूं राकेश सिंह।
झारखंड में विधानसभा चुनाव की गहमा-गहमी चरम पर है। चुनाव की घोषणा किसी भी दिन हो सकती है। इस गहमा-गहमी के बीच सत्तारूढ़ इंडी गठबंधन और विपक्षी एनडीए के बीच चुनावी मुकाबले की जमीन तैयार की जा रही है। सत्ता पक्ष की तरफ से कमान झामुमो के पास है, तो विपक्ष की तरफ से भाजपा ने मोर्चा संभाल रखा है। दोनों तरफ से एक-दूसरे को पटखनी देने के लिए जमीन टटोली जा रही है, दांव-पेंच को आजमाया जा रहा है और मुकाबले में उतरनेवाले योद्धाओं की तलाश जोर-शोर से की जा रही है। कहां कौन लड़ेगा और किस दल से लड़ेगा, इसका हिसाब बैठाया जा रहा है, तो कहां किस जाति का कितना वोट है और किस जाति का वोटर किसके पक्ष में वोट करेगा, इसके पीछे के समीकरणों को साधने के लिए तरह-तरह के उपाय किये जा रहे हैं। योजनाओं और वादों की प्रतिस्पर्धा के बीच वोटर्स अपना तराजू भी लिये बैठे हैं। फिलहाल यह तराजू किसी को आश्वस्त करता नहीं दिख रहा। वहीं झारखंड विधानसभा चुनाव के मैदान में उतरनेवाले दोनों गठबंधनों की तरफ से हर तरह के घोड़े दौड़ाये जा रहे हैं। इस शोरगुल में झारखंड की आम जनता भी उत्साहित नजर आ रही है। इस उत्साह के कारण राजनीतिक दल अलग ही पसोपेश में हैं। यह उत्साह सत्ता पक्ष के लिए ज्यादा है या जनता बदलाव के मूड में है, कोई भी फिलहाल आकलन करने की स्थिति में नहीं है। इस कारण चुनावी हवा किस दिशा में बह रही है, राजनीतिक दलों को इसका तनिक भी अंदाजा नहीं लग पा रहा है। दोनों पक्षों को अपने-अपने हथियारों की ताकत पर भरोसा तो है, लेकिन परिणाम को लेकर निश्चिंत होने की स्थिति अब तक नहीं बनी है। न तो सत्ता पक्ष अपने पक्ष में माहौल बनने का दावा कर सकता है और न ही विपक्ष ने अपने पक्ष में माहौल बनाने में कामयाबी हासिल की है। जहां तक चुनावी मुद्दों की बात है, तो दोनों ही पक्षों ने इसे तय कर लिया है, लेकिन उन मुद्दों को वोट में कैसे बदला जाये, इसी रणनीति पर विचार विमर्श भी चल रहा है। कोई मंईयां सम्मान की बात कर रहा है, तो कोई गोगो दीदी की। हर अस्त्र का काट पक्ष-विपक्ष के पास होने का दावा भी है। फिलहाल झारखंड विधानसभा का चुनाव अब तक पूरी तरह ‘ओपेन’ दिखाई दे रहा है। क्या है झारखंड का चुनावी परिदृश्य और क्या है दोनों पक्षों की स्थिति, बता रहे हैं आजाद सिपाही के विशेष संवाददाता राकेश सिंह।
चुनावी भ्रमण के दौरान आजाद सिपाही की टीम ने झारखंड के मतदाताओं का मन टटोला। एक तरफ जहां ज्यादातर वोटर्स उत्साहित दिखे तो दूसरी तरफ बहुतों ने चुप्पी साधी हुई है। लेकिन उनकी चुप्पी भी बड़ा संकेत दे रही है, जिसे समझना उतना मुश्किल भी नहीं है। झारखंड के मतदाता बड़े जागरूक हैं, खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में। उनमें राजनीतिक समझ ज्यादा है। भले उनका जीवन अभाव में बीत रहा हो, लेकिन राजनीतिक परिपक्वता के कारण वे बड़े ही उत्साहित हैं। उन्हें पता होता है कि कौन उनका इस्तेमाल कर रहा है और कौन उनके भले के बारे में सोच रहा है। इसलिए वे भी राजनीतिक दलों के हिसाब से ही सोचते हैं। उनकी अलग ही राजनीति चलती है, जो दलों को परेशान भी करती है। ग्रामीणों में भी दो तबका है। एक जो साफ-साफ बात करता है और दूसरा अपना मुंह खोलता तो नहीं है लेकिन अपनी मंशा स्पष्ट कर देता है। इस बार के विधानसभा चुनाव में शहरी मतदाताओं के मुकाबले ग्रामीण मतदाता अपनी ज्यादा चिंता कर रहा है। क्योंकि वह उम्मीद कर रहा है कि कौन उसे क्या परोसने वाला है। और कौन ज्यादा विश्वसनीय है। संथाल से लेकर कोल्हान भ्रमण के दौरान कुछ इलाकों को छोड़ दिया जाये तो कहा नहीं जा सकता कि बाजी किसके हाथ में जायेगी। फिलहाल सत्ता पक्ष और विपक्ष ने अभी अपनी पूरी गोटियां सेट नहीं की हैं। अभी तो महामुकाबला शुरू हुआ है। शाह-मात के इस खेल में अभी तो दोनों ओर से कई दांव-पेंच आजमाने बाकी हैं। अभी बहुत कुछ देखने ओर सुनने को मिलने वाला है। अभी तो असली कार्यक्रम शुरू कहां हुआ है। अभी तो आवागमन का सिलसिला असली स्वरूप लेने वाला है। इस लिए यह विधानसभा चुनाव बड़ा ही रोचक बनता जा रहा है। इस चुनाव से केवल झारखंड की सत्ता का द्वार ही नहीं खुलेगा, बल्कि इस बार पार्टियों और गठबंधनों के वास्तविक आकार का लिटमस टेस्ट भी करेगा। यह चुनाव 24 साल के गबरू जवान झारखंड की राजनीतिक दशा और दिशा भी तय करेगा। लेकिन इस चुनाव की सबसे विचित्र स्थिति यह है कि अब तक इसकी दिशा का पता नहीं चल पा रहा है। यह पहली बार है, जब चुनाव से ठीक पहले झारखंड का सियासी माहौल आम लोगों की नजर में पूरी तरह ठंडा और स्थिर है। लोगों को न इस बात की चिंता है कि किसकी सरकार है और न इस बात का फिक्र है कि आगे क्या होगा।
दोनों पक्षों ने सामने रख दिये हैं मुद्दे
विधानसभा चुनाव के लिए दोनों पक्षों ने अपने-अपने मुद्दे जनता के सामने रख दिये हैं। सत्ताधारी गठबंधन की तरफ से मुख्य भूमिका में झामुमो है, तो विपक्ष की कमान भाजपा ने संभाल रखी है। सत्ताधारी गठबंधन के दूसरे सहयोगी दल, कांग्रेस, राजद और वामदल महज दर्शक बने हुए हैं, तो विपक्षी गठबंधन के सहयोगी दल, आजसू, जदयू और अन्य भी फिलहाल चीयर लीडर की भूमिका में दिखाई दे रहे हैं। दोनों ही पक्षों ने यात्राओं के माध्यम से अपने-अपने मुद्दों को सामने रख दिया है। सत्ता पक्ष के पास मंईयां सम्मान योजना के साथ दूसरी कल्याणकारी योजनाएं हैं, तो विपक्ष की तरफ से भाजपा ने ह्यपंच प्रणह्ण नामक अपना संकल्प पत्र जारी कर चुनावी वायदों का पिटारा खोल दिया है। मंईयां सम्मान योजना की काट में विपक्ष ने गोगो दीदी योजना के तहत 2100 रुपये प्रतिमाह मिलने का फार्म भी भरवाना शुरू कर दिया है। इसे लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष आमने-सामने भी आ गये हैं। एक तरफ जहां झामुमो का कहना है कि फार्म भरवा कर विपक्ष आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन कर रहा है, तो भाजपा का कहना है कि सत्ता पक्ष दरअसल डर गया है। उसे पता ही नहीं है कि अभी तक राज्य में आचार संहिता लागू नहीं हुई है। इसलिए उसके उल्लंघन का सवाल कहां है। यही नहीं, भाजपा ने सत्ता पक्ष से यह सवाल भी किया है कि पिछले लोकसभा चुनाव में जब राजीव गांधी और कांग्रेस खटाखट फार्म भरवा रहे थे, तब उन्हें आचार संहिता उल्लंघन का ध्यान नहीं आया।
क्या है झारखंड के चुनावी मुद्दों की स्थिति
झारखंड में मुद्दों की कोई कमी नहीं है। नीतिगत और राजनीतिक मुद्दों को छोड़ भी दें, तो महंगाई, बेरोजगारी, विकास, भ्रष्टाचार, कानून-व्यवस्था और बिजली-पानी-सड़क से जुड़े मुद्दों को चुनावों में उठाया जा सकता है, उठाया भी जाता है, लेकिन इन मुद्दों को लेकर न राजनीतिक दल गंभीर हैं और न संभावित उम्मीदवार। झारखंड के चुनावों में पहाड़ों के गायब होने के कारण बदलता मौसम, मानव तस्करी, पलायन, विस्थापन, शिक्षा और नशाखोरी जैसे मुद्दे राजनीतिक दलों की सूची से बाहर ही रहे हैं। इन मुद्दों पर न तो कोई बात करता है और न कोई बात करना चाहता है।
मुद्दों की रोशनी में क्या है चुनावी हवा
अब इन चुनावी मुद्दों की रोशनी में यह सवाल महत्वपूर्ण हो जाता है कि आखिर झारखंड की चुनावी हवा का रुख किस तरफ है। इस सवाल का उत्तर फिलहाल तो यही है कि झारखंड की चुनावी हवा अभी स्थिर है, यानी पूरा परिदृश्य पूरी तरह ह्यओपेनह्ण है। कोई भी जीत सकता है और कोई भी हार सकता है। लोगों की चुप्पी और राजनीतिक दलों की रणनीतियों से साफ जाहिर हो रहा है कि झारखंड में चुनाव के प्रति न सत्ता पक्ष निश्चिंत हो सकता है और न विपक्ष। सत्ता पक्ष अपनी योजनाओं और पांच साल की उपलब्धियों के सहारे वोट पाने की उम्मीद लगाये बैठा है, लेकिन उसकी उम्मीदें कितनी पूरी होंगी, इसे लेकर वह खुद निश्चिंत नहीं है। दूसरी तरफ विपक्ष को अब तक सत्ता पक्ष की नाकामियों को उजागर कर सत्ता विरोधी लहर पैदा करने में कामयाबी नहीं मिली है, क्योंकि उसके पास ऐसी कोई ठोस कार्य योजना नहीं है। हां विपक्ष इस प्रयास में है कि ऐसा कोई मुद्दा वह लपक ले, जिससे सत्ता पक्ष को असहज स्थिति में ला दे। इन तमाम परिस्थितियों में यदि यह कहा जाये कि झारखंड का राजनीतिक माहौल अभी बेहद उलझा और अस्पष्ट है, तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।