दोनों दलों ने यह साबित किया है कि वे झारखंडी माटी और मानुष को अपनी ओर आकर्षित करने की क्षमता रखते हैं
ताकत होगी तो दिखेगी जरूर। और झारखंड विधानसभा चुनाव ने यह साबित कर दिया है कि राज्य की राजनीति में झाविमो और आजसू डोमिनेटिंग पोजिशन हासिल करने में सफल रहे हैं। झाविमो ने जहां राज्य की सभी 81 सीटों पर उम्मीदवार देकर अपनी ताकत दिखायी है वहीं आजसू ने दबाव को दरकिनार कर तथा 52 सीटों पर उम्मीदवार उतार कर अपनी ताकत दिखा दी है।
झारखंड में 65 प्लस सीटों का लक्ष्य लेकर चल रही भाजपा आजसू को दस से बारह सीटों पर सलटाना चाहती थी, पर आजसू ने भाजपा की दबाव की राजनीति को दरकिनार करते हुए न सिर्फ अपनी बातें मजबूती से रखीं, बल्कि गठबंधन से अलग होकर यह बता दिया कि वह दबाव की नहीं, सहयोग की भाषा पर विश्वास रखती है और सहयोग की भाषा से इतर वह अकेले अपनी चुनावी नैया खेने का दमखम भी रखती है। पार्टी का यह स्टैंड सफल रहा और गुरुवार को एक टीवी चैनल के कार्यक्रम में जब अमित शाह ने यह बयान दिया कि सुदेश के साथ चुनाव के बाद भी गठबंधन बना रहेगा तो यह एक तरह से आजसू की बढ़ती ताकत का ही प्रतिफल था।
इसलिए देना पड़ा अमित शाह को आजसू को साथ लेने का बयान
नेताओं के हर बयान का एक अर्थ होता है। और भाजपा के राष्टÑीय अध्यक्ष अमित शाह के बयान का तो हर शब्द अर्थपूर्ण होता है। गुरुवार को जब उन्होंने यह साफ किया कि पार्टी का चुनाव के बाद भी आजसू के साथ तालमेल बना रहेगा, तो वह भाजपा का झारखंड में भविष्य देखकर बोल रहे थे। दरअसल, वर्ष 2014 के विधानसभा चुनावों में भाजपा मोदी लहर के बावजूद अपने दम पर केवल 37 सीटें जीतने में सफल रही थी। इस चुनाव परिणाम के बाद उसे झारखंड में सरकार बनाने के लिए आजसू के सहयोग की जरूरत पड़ी। हालांकि भाजपा ने झाविमो के पहले छह विधायक तोड़कर मिलाये और बाद में लातेहार विधायक प्रकाश राम को पार्टी मेें शामिल कराया और उसे प्रत्याशी भी बनाया है। आसन्न विधानसभा चुनाव में एड़ी-चोटी एक करने के बाद भी भाजपा को 65 प्लस का लक्ष्य हासिल करना मुश्किल लग रहा है। यदि पार्टी 2019 में भी मजबूत सरकार बनाना चाहती है तो, उसे सरकार बनाने के लिए आजसू का सहयोग लेना होगा। पार्टी के पास दूसरा विकल्प झाविमो सुप्रीमो बाबूलाल मरांडी को साथ लाने का है। झाविमो को अपने पाले में करने के लिए गुरुवार को अमित शाह ने बाबूलाल मरांडी से बंद कमरे में बातचीत की। जाहिर है कि यह बातचीत राजनीतिक ही थी। वहीं, गढ़वा और चतरा में चुनावी सभा में अपेक्षा के अनुरूप भीड़ न पाकर भी अमित शाह यह समझ गये कि भाजपा के लिए झारखंड की कई सीटों पर चुनौती कड़ी है और विपक्षी दलों से निपटने का उसका युद्ध इतना आसान नहीं है, जितना वह समझ रही है।
इसलिए अमित शाह ने आजसू के साथ चुनाव के बाद भी गठबंधन का विकल्प खुला रखा है और झाविमो सुप्रीमो बाबूलाल मरांडी को साधने का प्रयास भी तेज कर दिया है। इधर, आजसू के केंद्रीय प्रवक्ता डॉ देवशरण भगत ने पार्टी का रुख साफ करते हुए कहा है कि इस बार आजसू याचना नहीं, निर्णय करेगी। अब तक हर बार दिल्ली बोलती रही है और गांव सुनता रहा है, पर इस बार पंच बोलेगा और दिल्ली सुनेगी। आजसू पार्टी झारखंडियों के मान-सम्मान और स्वाभिमान के लिए जनता के बीच में है और इस बार हम तय करेंगे कि किसका सहयोग लेंगे। जाहिर है इस दफा आजसू डिमांडिंग नहीं, कमांडिंग पोजिशन में है और बिना ताकतवर हुए आजसू ऐसी भाषा नहीं बोल सकती। वहीं यह भी सच्चाई है कि भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व को आजसू की ताकत का अंदाजा है। इसलिए पार्टी के राष्टÑीय अध्यक्ष अमित शाह को आजसू के साथ चुनाव के बाद भी गठबंधन बरकरार रहेगा का बयान देना पड़ा।
ताकतवर नेता के रूप में उभरे हैं बाबूलाल मरांडी
आसन्न विधानसभा चुनाव में झाविमो सुप्रीमो बाबूलाल मरांडी झारखंड के कद्दावर नेता के रूप में उभरे हैं। पार्टी ने सभी 81 सीटों पर उम्मीदवार उतारकर अपनी ताकत दिखायी है। पहले प्रभात तारा मैदान में आयोजित जनसमागम में चालीस हजार की भीड़ जुटाकर और बाद में सोशल मीडिया के जरिये खुद को झारखंडी जनता का चहेता बनाकर बाबूलाल मरांडी ने यह साबित कर दिया है कि उनका और उनकी पार्टी का दमखम न सिर्फ बरकरार है, बल्कि अपनी पार्टी और अपनी नेतृत्व क्षमता के साथ वे अपने कई उम्मीदवारों को जीत दिलाने में भी सफल होंगे। दरअसल, झारखंड के पहले मुख्यमंत्री के रूप में बाबूलाल मरांडी का 28 महीने का कार्यकाल जनता की नजरों में अब भी उल्लेखनीय है और वह विस्मृत नहीं हो पाया है। साफ-सुथरी छवि और झारखंड की माटी के साथ जुड़ाव भी बाबूलाल मरांडी को एक प्रभावशाली नेता बनाता है। इसके अलावा जन सरोकार की राजनीति भी बाबूलाल को लोकप्रिय नेता की छवि देती है।
पहले से फील्डिंग कर रही भाजपा
झारखंड की राजनीति के जानकारों का कहना है कि महाराष्टÑ के नतीजे आने के बाद भाजपा पूरी तरह सतर्क है।
हालांकि पार्टी आत्मविश्वास से लबरेज है लेकिन वह जानती है कि उसे चुनाव के बाद सहयोगियों की जरूरत पड़ सकती है और आजसू तथा झाविमो उसके लिए बेहतर विकल्प हो सकते हैं। इसलिए भाजपा चुनाव से पहले ही मजबूत गठबंधन के लिए पहले से फील्डिंग कर रही है। फिर चाहे अमित शाह का बाबूलाल मरांडी से मुलाकात हो या फिर उनका यह बयान कि सुदेश के साथ चुनाव के बाद भी गठबंधन बना रहेगा, सब इसी का संकेत देते हैं। असल में भाजपा ने अपने जिन विधायकों का टिकट काटा है और उससे जो असंतोष पार्टी के भीतर उभरा है उससे पार्टी को यह महसूस हो रहा है कि उसका 65 पार सीटों का लक्ष्य आसान नहीं है। वहीं राज्य में आजसू और झाविमो दोनों ने अपने को मजबूत करके दिखा दिया है। ऐसे में भाजपा दोनों दलों को साधकर रखना चाहती है, ताकि चुनाव के बाद नतीजे चाहे जो आयें, उसे सरकार बनाने में दिक्कत न हो। दरअसल, आज भी भाजपा आदिवासियों और कुर्मियों में अपनी मजबूत पैठ नहीं बना पायी है, वहीं आजसू ने इन दोनों जातियों को अपनी ओर आकर्षित किया है। इसी तरह बाबूलाल मरांडी झारखंड में आदिवासियों के सर्वमान्य नेता के साथ जनसमान्य के बीच भी एक कुशल और प्रभावशाली नेतृत्वकर्ता के तौर पर स्थापित हो चुके हैं। यही कारण है कि भाजपा इन दोनों को साधने में जुटी हुई है। अभी की स्थिति से यह साफ है कि आजसू और झाविमो मजबूत होकर उभरे हैं।