चंदवा घटना के बाद रणनीति बदलने में जुटा प्रशासन
झारखंड में विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच शुक्रवार को नक्सलियों ने बड़ा धमाका कर पुलिस प्रशासन के सामने बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है। एक दारोगा और तीन जवानों की हत्या कर नक्सलियों ने साफ कर दिया है कि उनका दम-खम अभी बाकी है। इसके साथ ही इस घटना ने यह भी साबित किया है कि झारखंड के कम से कम 13 जिलों में चुनाव कराना पुलिस के लिए बड़ी चुनौती होगी। ये जिले नक्सली प्रभाव की दृष्टि से अति संवेदनशील माने जाते हैं। इनमें खूंटी, गुमला, लातेहार, सिमडेगा, पश्चिमी सिंहभूम, रांची, दुमका, गिरिडीह, पलामू, गढ़वा, चतरा, लोहरदगा और बोकारो शामिल हैं। वैसे तो राज्य के 24 में से 22 जिलों को नक्सल प्रभावित माना गया है, लेकिन इन जिलों में नक्सली गतिविधियां अक्सर होती हैं। इसके बाद नक्सली गतिविधियों के लिहाज से सरायकेला, पूर्वी सिंहभूम, हजारीबाग, धनबाद और गोड्डा को संवेदनशील श्रेणी में रखा गया है। वहीं जामताड़ा, पाकुड़, रामगढ़, कोडरमा को कम संवेदनशील जिलों की श्रेणी में रखा गया है। देवघर और साहेबगंज जिला में माओवादी गतिविधियां नहीं हुई हैं।

कहां किस संगठन का प्रभाव
झारखंड में कई नक्सली संगठन सक्रिय हैं और उनका प्रभाव अलग-अलग जिलों में है। इनमें भाकपा माओवादी सबसे खतरनाक और बड़ा संगठन है। इसका प्रभाव दुमका, चतरा, लातेहार, पलामू, गढ़वा, गुमला, सिमडेगा, बोकारो, गिरिडीह, पश्चिमी सिंहभूम, पूर्वी सिंहभूम, हजारीबाग और रामगढ़ में है। नक्सलियों का दूसरा सबसे बड़ा संगठन पीएलएफआइ है, जो कम से कम आधा दर्जन जिलों में सक्रिय है। इसके बाद टीपीसी, जेजेएमपी और टीएसपीसी जैसे संगठन हैं, जो यदा-कदा अपनी मौजूदगी दर्ज कराते रहते हैं।

क्या है प्रशासन की रणनीति
चुनाव के पहले से इन इलाकों में बड़े पैमाने पर केंद्रीय सुरक्षाबलों की तैनाती का फैसला तो कर लिया गया है, लेकिन चंदवा की घटना ने पुलिस प्रशासन को अपनी रणनीति पर दोबारा विचार करने के लिए मजबूर कर दिया है। भाकपा माओवादी और दूसरे उग्रवादी समूहों के निशाने पर चुनावकर्मी और सुरक्षाबल होते हैं। नक्सली गतिविधियों को देखते हुऐ राज्य पुलिस ने विशेष ट्रेनिंग की शुरुआत कर दी है। चुनाव के मद्देनजर नक्सल प्रभावित जिलों को ए, बी और सी श्रेणी में बांटा गया है।

नक्सल प्रभावित जिलों की तैयारी
इस बार सुरक्षित मतदान के लिए प्रशासन ने व्यापक तैयारी कर रखी है। सुरक्षा बलों के बीच संवाद स्थापित करने के लिए कम्युनिकेशन ग्रिड स्थापित किया गया है। झारखंड में माओवादी दूसरे राज्यों से आकर चुनाव को प्रभावित न करें, इसके लिए समन्यव समिति की लगातार बैठकें भी हो रही हैं। इसके बावजूद चंदवा में नक्सलियों ने अपनी मौजूदगी दर्ज करायी है, इससे चिंता बढ़ गयी है।

नक्सल विरोधी अभियान

पुलिस प्रशासन ने विधानसभा चुनाव से पहले अति संवेदनशील जिलों में नक्सल विरोधी अभियान चलाने का फैसला किया है। इसमें केंद्रीय अर्द्धसैनिक बलों की मदद भी ली जा रही है। नक्सलियों के बारे में सूचनाएं एकत्र करने की भी रणनीति बनायी गयी है। इसके तहत सूचना देने वाले आम लोगों को पुरस्कृत किया जायेगा। जिलों के एसपी को पड़ोसी राज्यों की पुलिस के साथ समन्वय स्थापित कर अभियान चलाने का निर्देश है। इसके अलावा झारखंड पुलिस शांतिपूर्ण चुनाव कराने के लिए पड़ोसी राज्यों के संसाधनों का भी इस्तेमाल करेगी। चंदवा की घटना के बाद चुनाव आयोग ने अप्रत्याशित कदम उठाया है। उसने मणिपुर के पूर्व डीजीपी एमके दास को झारखंड चुनाव के लिए विशेष पुलिस पर्यवेक्षक नियुक्त किया है। चंदवा की घटना ने चुनाव आयोग द्वारा पांच चरणों में चुनाव कराने के फैसले पर सवाल उठानेवालों का मुंह बंद कर दिया है।

नक्सलियों ने दिया दुस्साहस का परिचय
चंदवा की घटना ने एक बार फिर साबित किया है कि झारखंड की पुलिस नक्सलियों के खिलाफ कार्रवाई के लिए पूरी तरह तैयार नहीं है। कुछ ग्रामीण थाने आकर गांव पर नक्सलियों के हमले की सूचना देते हैं, तो पुलिस की टीम बिना कुछ सोचे-समझे वहां रवाना हो जाती है। पुलिस टीम को न तो अतिरिक्त सुरक्षा बलों की जरूरत महसूस हुई और न ही उसने कोई सावधानी बरती। होमगार्ड के महज चार जवानों को साथ लेकर पुरानी पड़ चुकी राइफल लेकर अत्याधुनिक हथियारों से लैस नक्सलियों से मुकाबला करने की यही सोच पुलिस के लिए भारी पड़ गयी। थाने से केवल दो किलोमीटर दूर नक्सलियों ने हमला कर पुलिस के चार कर्मियों की हत्या कर दी। डीआइजी ने इस घटना को सुरक्षा में चूक माना है।

2014 में चुनाव के आखिरी चरण में हुई थी हिंसा
साल 2014 में झारखंड में चुनाव के आखिरी चरण में मतदान के दौरान दुमका के शिकारीपाड़ा में माओवादियों ने मतदान कराकर लौट रहे पुलिसकर्मियों को निशाना बनाया था। मतदान करा कर लौट रही गाड़ी को माओवादियों ने बारूदी सुरंग का विस्फोट कर उड़ा दिया था। इस घटना में पांच सुरक्षाकर्मी समेत आठ मतदानकर्मी मारे गये थे। घटना के बाद दुमका के तत्कालीन एसपी को निलंबित भी कर दिया गया था। इससे पहले तीन चरणों के चुनाव शांतिपूर्ण तरीके से हुए थे।
चंदवा की घटना ने साफ कर दिया है कि पुलिस प्रशासन को अभी लंबा सफर तय करना है। नक्सल प्रभावित इलाकों में चुनाव के मद्देनजर अतिरिक्त सतर्कता बरतने की जरूरत है। चंदवा की घटना ने राज्य के लोगों को एक बार फिर नक्सलियों के खौफ में घिरने के लिए मजबूर किया है। इसलिए पुलिस प्रशासन को तत्काल कुछ ऐसा करना होगा, जिससे लोगों का भरोसा कायम रह सके। इसके लिए दोतरफा रणनीति बनाये जाने की जरूरत है, जिसमें एक तरफ नक्सलियों के खिलाफ आक्रामक कार्रवाई करना और दूसरी तरफ लोगों को, खास कर ग्रामीण इलाके में एक ऐसा तंत्र विकसित करना होगा, जिसकी मदद से नक्सली गतिविधियों की सूचना आसानी से मिल सके।

Share.

Comments are closed.

Exit mobile version