बिहार विधानसभा चुनाव के दूसरे चरण से ठीक पहले आरक्षण का जिन्न प्रकट हो गया है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने जनसंख्या के हिसाब से आरक्षण देने की वकालत कर जिस राजनीतिक ब्रह्मास्त्र का इस्तेमाल किया है, वह उन्हें चुनावी लाभ तो दिला सकता है, लेकिन इसके दूरगामी परिणाम बेहद खतरनाक हो सकते हैं। भारत में, खास कर हिंदी पट्टी के राज्यों में आरक्षण एक ऐसा राजनीतिक मुद्दा है, जिसकी लहरों पर सवार होकर कई लोग सियासी ऊंचाई तय करने में सफल हो गये या आज भी सफल हो रहे हैं। जनसंख्या के हिसाब से आरक्षण का मुद्दा मंडल आयोग की सिफारिशों में हालांकि नहीं शामिल था, लेकिन विभिन्न राजनीतिक दल इसे अपने लाभ के लिए उठाते रहे हैं। मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने की कीमत तत्कालीन प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह को कितनी चुकानी पड़ी थी, यह किसी से छिपी नहीं है। इसके बाद बिहार विधानसभा के पिछले चुनाव से पहले संघ प्रमुख ने इस मुद्दे पर जो स्टैंड लिया था, वह भाजपा की पराजय का एक कारण बताया गया था। अब नीतीश कुमार ने इस बेहद संवेदनशील मुद्दे को उठा कर चुनावी बिसात पर नयी, लेकिन बड़ी चाल चल दी है, जिसका असर आनेवाले दिनों में देखने को मिल सकता है। इस मुद्दे को लेकर देश में एक नयी बहस शुरू होगी और जाहिर है, इससे विवाद भी पैदा होंगे। चुनावी सफलता के लिए विवादित विषयों का सहारा लेना गलत नहीं है, लेकिन राजनेताओं को इसके संभावित परिणामों पर भी विचार करना चाहिए। नीतीश द्वारा उठाये गये इस मुद्दे के संभावित परिणामों का आकलन करती आजाद सिपाही ब्यूरो की खास रिपोर्ट।
बिहार में चल रहे विधानसभा चुनावों का पहला चरण पूरा हो चुका है और दूसरे चरण के लिए मतदान तीन दिन बाद तीन नवंबर को होना है। पहले चरण के मतदान के संकतों के आधार पर दावे-प्रतिदावे किये जा रहे हैं, लेकिन इसी बीच सत्ता में वापसी के लिए जूझ रहे नीतीश कुमार ने आरक्षण जैसे संवेदनशील मुद्दे को उठा कर एक बड़ा सियासी दांव खेला है। नीतीश ने चंपारण के बगहा में चुनावी सभा के दौरान जनसंख्या के आधार पर आरक्षण की वकालत कर इस चुनावी गहमागहमी में एक नया मुद्दा उठा दिया है, जिसे उनका मास्टर स्ट्रोक कहा जा सकता है। नीतीश अच्छी तरह जानते हैं कि 1980 के बाद की राजनीति में आरक्षण का मुद्दा बिहार में कितना संवेदनशील हो गया है।
जनसंख्या के आधार पर आरक्षण का मुद्दा सबसे पहले 1977 में उठा था, जब मोरारजी देसाई के नेतृत्व में जनता पार्टी की सरकार दिल्ली में सत्तासीन हुई थी। देवीलाल और चौधरी चरण सिंह ने इसकी वकालत करते हुए देश में जनसंख्या के हिसाब से आरक्षण की वकालत की थी। बाद में 1990 में जब विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार ने मंडल आयोग की सिफारिशों के आधार पर देश में आरक्षण की नयी व्यवस्था लागू की, तब इस मुद्दे को एक तरह से भुला दिया गया। लेकिन अब नीतीश ने एक बार फिर इसे छेड़ कर नये विवाद को जन्म दे दिया है।
नीतीश को इस मुद्दे को उठाने से पहले सोचना चाहिए था कि 130 करोड़ की आबादी वाले देश में, जहां ‘कोस-कोस पर पानी बदले, पांच कोस पर बोली’ की परंपरा है, जहां जातीय जनगणना की रिपोर्ट केवल राजनीतिक मकसद साधने के लिए सार्वजनिक नहीं की जाती, वहां जनसंख्या के आधार पर आरक्षण का प्रावधान हकीकत की धरातल पर उतारना कठिन ही नहीं, बल्कि लगभग असंभव है। इतना ही नहीं, आरक्षण की इस नयी प्रणाली से सामाजिक तौर पर देश कितना कमजोर हो जायेगा, इसकी कल्पना भी उनके जैसे राजनेता को जरूर करनी चाहिए। यदि देश में जनसंख्या के हिसाब से आरक्षण का प्रावधान लागू कर दिया गया, तो वैसी जातियां, जिनकी जनसंख्या काफी कम है, नुकसान उठाने के लिए अभिशप्त हो जायेंगी, जबकि राजनीति में जातीयता का जहर कुछ अधिक ही घुल जायेगा। इसलिए मंडल आयोग की सिफारिशों में जनसंख्या के आधार पर आरक्षण की सिफारिश नहीं की गयी थी, बल्कि एक सीधा-सपाट फार्मूला सुझाया गया था, ताकि आरक्षण के उद्देश्यों को हासिल किया जा सके। उसके बाद से कई बार जातीय जनगणना की रिपोर्ट सार्वजनिक करने की मांग उठायी गयी, लेकिन अलग-अलग उद्देश्यों के लिए इस मांग पर विचार नहीं किया गया। धीरे-धीरे जातीय जनगणना की रिपोर्ट सार्वजनिक करने की मांग ठंडी पड़ गयी। लेकिन अब नीतीश कुमार ने इस मुद्दे को उठा कर चुनावी माहौल को गरम कर दिया है।
माना जा सकता है कि चुनावी माहौल में विवादित मुद्दों को उठाने का लाभ मिलता है, लेकिन इसके कारण बाद में जो परेशानी झेलनी पड़ती है, वह समाज के लिए काफी महंगी साबित होती है। नीतीश कुमार जैसे गंभीर राजनेता को पता है कि आरक्षण के मुद्दे की संवेदनशीलता कितनी है और इसका चुनावी लाभ कितना उठाया जा सकता है। बिहार में 2015 के विधानसभा चुनावों से पहले संघ प्रमुख मोहन भागवत ने आरक्षण के प्रावधानों की समीक्षा की बात कह कर बड़ा विवाद पैदा किया था, जिसकी कीमत भाजपा को पराजय से चुकानी पड़ी थी। इस बार नीतीश कुमार ने राजद और लोजपा के जातीय समीकरणों को ध्वस्त करने के लिए यह मुद्दा उठाया है, जिसका दूसरे और तीसरे चरण के चुनावों पर असर पड़ना स्वाभाविक है। नीतीश कुमार का यह बयान ऐसे समय आया है, जब उत्तर बिहार और मध्य बिहार के इलाके में मतदान अभी बाकी है और इन दोनों क्षेत्रों में आरक्षण के लिए सबसे बड़ी लामबंदी देखने को मिलती रही है।
नीतीश के इस ब्रह्मास्त्र चलाने के बाद अब विपक्ष की ओर से इसकी काट की खोज की जाने लगी है। तेजस्वी यादव और चिराग पासवान के लिए इसकी काट खोजना आसान नहीं होगा। ऐसे में यह कहा जा सकता है कि नीतीश कुमार भाजपा के साथ होते हुए भी पिछड़ों के वोट बैंक में सेंध लगाने के लिए तैयार हो चुके हैं। इसके साथ ही मुस्लिमों की बड़ी आबादी, जो जनसंख्या के आधार पर आरक्षण की मांग करती रही है, भी उनके साथ जा सकती है। इसका चुनावी लाभ निश्चित रूप से नीतीश को मिलेगा, लेकिन उसके लिए 10 नवंबर तक इंतजार करना होगा।