एलान : एक बार फिर देश-दुनिया को चौंकाया प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 19 नवंबर को एक बार फिर देश-दुनिया को चौंकने पर मजबूर कर दिया। गुरु नानक देवजी के प्रकाश पर्व और कार्तिक पूर्णिमा के पवित्र दिन की तैयारी में जुटे भारत के 130 करोड़ लोगों ने जब सुबह नौ बजे पीएम मोदी का तीन कृषि कानूनों को वापस लेने का एलान सुना, बहुत से लोगों को सहसा विश्वास नहीं हुआ। लेकिन अपनी सुपरिचित शैली में एक बार फिर लोगों को चौंकाते हुए पीएम ने बड़ा निर्णय लिया और कृषि कानूनों की वापसी की घोषणा कर दी। इसके साथ ही पिछले 355 दिनों से चल रहा किसान आंदोलन भी खत्म होने का रास्ता साफ हो गया है, लेकिन संयुक्त किसान मोर्चा के रवैये के बाद इस पर असमंजस बरकरार है। किसान नेता अब न्यूनतम समर्थन मूल्य पर सरकार को झुकाने की तैयारी कर रहे हैं। पीएम मोदी की घोषणा को किसी की जीत या हार के रूप में देखने का सिलसिला भी स्वाभाविक तौर पर शुरू हो गया है, लेकिन राजनीतिक दृष्टि से उनका यह कदम भाजपा के रास्ते को कुछ और आसान बनाने में बड़ी भूमिका अदा करेगा। पीएम मोदी ने इतना बड़ा फैसला कर एक बार फिर साबित कर दिया है कि वह देशहित के आगे झुक सकते हैं। और उनका यही एक गुण उन्हें देश ही नहीं, दुनिया का सबसे सम्मानित और लोकप्रिय जननेता बनाता है। पीएम मोदी के फैसले के पीछे की रणनीति और इसके राजनीतिक असर का आकलन करती आजाद सिपाही के विशेष संवाददाता राकेश सिंह की खास रिपोर्ट।
अपनी चौंकानेवाली कार्यशैली को दोहराते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुपर्व और कार्तिक पूर्णिमा के मौके पर एक और मास्टर स्ट्रोक लगाया। सुबह नौ बजे देशवासियों को संबोधित करते हुए उन्होंने तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने का एलान कर दिया। यह घोषणा करते समय पीएम मोदी के चेहरे के भाव और भाषा ने साफ कर दिया कि उनके लिए देशहित सबसे ऊपर है। संसद में प्रचंड बहुमत होने के बावजूद उन्होंने पिछले 355 दिनों से आंदोलन कर रहे किसानों के साथ देशवासियों से क्षमा याचना की, जो दिखाता है कि देश की भावनाओं के लिए पीएम मोदी के मन में कितनी इज्जत है। वह चाहते तो कानूनों को वापस नहीं भी ले सकते थे, लेकिन उन्होंने किसानों के साथ देश की भावनाओं को समझा। ‘मैं देश नहीं झुकने दूंगा’ के अपने नारे को पीएम मोदी ने सच साबित कर दिया। पीएम मोदी ने कहा कि हमारी तपस्या में कोई कमी रह गयी। सरकार किसानों, गांवों, गरीबों के हित में पूर्ण समर्थन भाव से, नेक नियत से ये कानून लेकर आयी थी। लेकिन इतनी पवित्र बात और पूर्ण रूप से किसानों के हित की बात हम कुछ किसानों को समझा नहीं पाये।
जाहिर है पीएम मोदी के एलान के बाद से यूपी और पंजाब के चुनावों की चर्चा तेज हो गयी है। सियासत के गलियारों में कहा जाने लगा है कि प्रधानमंत्री का यह फैसला चुनावों में बड़ा प्रभाव डालेगा। प्रधानमंत्री मोदी के इस फैसले से पंजाब और उत्तर प्रदेश चुनाव के पूरे समीकरण बदल गये हैं। अभी तक कृषि कानून के विरोध के नाम पर भाजपा के खिलाफ विपक्षी दलों को बड़ा मौका मिल गया था, लेकिन अब उनके लिए उसे चुनावी मुद्दा बनाना मुश्किल हो सकता है।
पीएम मोदी के इस एक मास्टर स्ट्रोक से किसान और भाजपा, दोनों फायदे में रहेंगे। यह सच है कि किसानों का मुद्दा अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बन गया था। हाल के उपचुनावों के परिणाम से संघ भी चिंतित हो गया था। भाजपा को चिंता इस बात की थी कि पश्चिमी यूपी की 110 सीटों पर किसान वोटर चुनावों में अहम भूमिका निभाते रहे हैं। 2012 के चुनाव में भाजपा को इनमें से 38 सीटें मिली थीं, जो 2017 में बढ़कर 88 हो गयी थीं। इसके अलावा पंजाब में कांग्रेस और आप की लगातार कम होती लोकप्रियता ने भी भाजपा को कृषि कानूनों पर ठोस कदम उठाने के लिए प्रोत्साहित किया। पंजाब के पूर्व सीएम कैप्टन अमरिंदर सिंह ने कहा था कि यदि भाजपा कृषि कानूनों पर अपने कदम पीछे लेती है, तो वह पार्टी के साथ जा सकते हैं। पंजाब की 117 सीटों पर किसानों की बड़ी भूमिका है। पिछले चुनावों में यहां कांग्रेस ने अमरिंदर के नेतृत्व में 77 सीटें जीती थीं, जबकि भाजपा को सिर्फ तीन सीटों से संतोष करना पड़ा था। यहां अमरिंदर साथ आते हैं, तो भाजपा को बड़ी सफलता मिल सकती है।
इन कानूनों के वापस लिये जाने के फैसले का सबसे बड़ा असर यह होगा कि यूपी और पंजाब में पिछले एक साल के दौरान हुई अप्रिय घटनाओं का दोष भाजपा के माथे से मिट जायेगा। पार्टी पूरे देश में अपनी लोकप्रियता में आसानी से इजाफा कर सकेगी। इतना ही नहीं, कृषि कानूनों के कारण एनडीए में पैदा हुई दरार को भी पाटा जा सकेगा। भाजपा के भीतर भी इन कानूनों का विरोध हो रहा था, जो अब स्वत: खत्म हो जायेगा।
सितंबर 2020 में तीनों कृषि कानून लागू होने और कृषि आंदोलन के बाद सबसे पहले नवंबर में बिहार में विधानसभा चुनाव हुए थे, जिसमें जदयू के साथ भाजपा की सत्ता में वापसी हुई। ऐसा पहली बार हुआ कि भाजपा जदयू से ज्यादा सीटें जीत कर आयी। इसके बाद अहम चुनाव मई 2021 में पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, असम, केरल और पुडुचेरी में हुए। इन चुनावों में भाजपा पश्चिम बंगाल में सरकार बनाने का सपना पूरा नहीं कर पायी। इसी तरह केरल और तमिलनाडु में पार्टी का उम्मीदों के अनुसार प्रदर्शन नहीं रहा, हालांकि असम में पार्टी ने सत्ता में वापसी की। उसे पुडुचेरी में सरकार बनाने का मौका मिला। फिर इस साल 30 अक्टूबर को 29 विधानसभा सीटों और तीन लोकसभा सीटों पर चुनाव हुए। इसमें भाजपा को अपेक्षित सफलता नहीं मिली। भाजपा को केवल सात सीटें मिलीं, जबकि उसके सहयोगियों को आठ सीटें मिलीं।
पीएम मोदी के एलान के बाद विपक्षी खेमे में गहरी निराशा है। कांग्रेस, सपा और बसपा के अलावा आप तथा अन्य पार्टियों को इस बात की चिंता सताने लगी है कि जिन कानूनों को वे अपने लिए मददगार मान रहे थे, वही अब उनके खिलाफ हो गये हैं। किसानों का विरोध खत्म होने के साथ ही भाजपा के प्रति लोगों का झुकाव बढ़ने लगेगा। इतना ही नहीं, भाजपा पीएम मोदी की पवित्र भावनाओं और उनकी बातों को भुनाने की पूरी कोशिश करेगी। विपक्ष को उम्मीद थी कि किसान आंदोलन से उपजे असंतोष की वजह से उसको बड़ा फायदा मिलेगा। पीएम मोदी ने इस संभावना को खत्म कर दिया है।
कुल मिला कर पीएम मोदी ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि आज के दौर में वह देश ही नहीं, दुनिया के सबसे लोकप्रिय जननेता क्यों हैं। आखिर क्यों दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र उनके पीछे खड़ा है। अपने देशहित को सबसे ऊपर रखनेवाला नेता भी तो आखिर भारत को आजादी के अमृत वर्ष में ही देखने को मिला है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कृषि कानून को वापस लेने के ऐलान के साथ पूरी भाजपा खड़ी हैं। भाजपा का कहना है कि इसे जीत-हार के नजरिये से नहीं देखा जाना चाहिए। जिसके भले के लिए कानून बना था, वही अगर उससे सहमत नहीं है, तो उसे लागू करने का क्या फायदा। भाजपा यह भी कह रही है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किसानों की खातिर झुकना मंजूर किया, लेकिन एक कांग्रेस थी, जिसने अपनी इच्छा को जबरदस्ती थोपने के लिए देश में इमरजेंसी लगा दी थी। भाजपा कह रही है कि प्रधानमंत्री मोदी ने यह देश की जनता से वायदा किया था कि हम देश नहीं झुकने देंगे। और उन्होंने उसी वादे के अनुरूप तीनों कृषि कानून वापस लेने की घोषणा की है।