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    Home»Jharkhand Top News»झारखंड में 2007 में शुरू हुई भ्रष्टाचार की गाथा
    Jharkhand Top News

    झारखंड में 2007 में शुरू हुई भ्रष्टाचार की गाथा

    दरअसल, अफसरों ने पद, पैसा और पहुंंच के लिए राज्य को खूब नचाया है | राजनेताओं पर तो कार्रवाई होती रही, लेकिन अफसर बचते रहे
    adminBy adminNovember 3, 2022Updated:November 3, 2022No Comments9 Mins Read
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    विशेष
    15 नवंबर 2000 को देश के राजनीतिक नक्शे पर 28वें राज्य के रूप में जब झारखंड का उदय हुआ, तब किसी को इस बात का इल्म नहीं था कि निश्छल और संवेदनशील संस्कृति का समाज वाला यह प्रदेश बहुत जल्द भ्रष्टाचार की नयी परिभाषा गढ़ेगा और देश में इसकी चर्चा इसकी खनिज संपदा के साथ भ्रष्टाचार के कारण भी होगी। झारखंड को राजनीति के चतुर खिलाड़ियों, सत्ता प्रतिष्ठान के चाटुकार नौकरशाहों और पैसा कमाने की अंधाधुंध होड़ में लगे लोगों ने जम कर लूटा और हर दिन यहां भ्रष्टाचार के नये किस्से सामने आने लगे। हालत यह है कि झारखंड को लूटनेवालों की पहचान अब जरा भी मुश्किल नहीं है। उनकी विलासिता, बेहिसाब दौलत और संपत्ति का अश्लील प्रदर्शन झारखंड के सवा तीन करोड़ लोगों के सीने पर सांप बन कर लोटने लगा है। भ्रष्टाचार ने झारखंड को आर्थिक चोट ही नहीं पहुंचायी है, बल्कि पूरी दुनिया में इसकी इज्जत को मिट्टी में मिला दिया है। दोष यहां सिर्फ राजनेताओं पर मढ़ा जाता रहा है। सवाल यह है कि क्या दोषी सिर्फ राजनेता हैं। सीधा सा जवाब है-नहीं। वैसे में अब इन कहानियों के ‘अदृश्य नायकों’ का पता लगाना बहुत जरूरी हो गया है। इसीलिए कहा जाता है कि झारखंड का सिस्टम अपने हिसाब से चलता रहा है। यहां के कुछ अफसर पूरी तरह बेलगाम हो गये हैं। यह कहने में तनिक भी संकोच नहीं है कि इन बेपरवाह अफसरों के कारण गाहे-बगाहे सरकार की किरकिरी होती रहती है। दरअसल, झारखंड में लूट-खसोट की यह कहानी एक या दो साल पुरानी नहीं है, बल्कि इसकी शुरूआत 2007 में ही हो गयी थी। कमजोर राजनीतिक नेतृत्व के कारण अफसर बेलगाम होते गये और अपने हिसाब से राज्य को चलाने लगे। अफसरों ने पद, पैसा और पहुंच के लिए सब कुछ किया, लेकिन किसी की गर्दन नहीं फंसी। इस कारण राज्य सरकार की किरकिरी हुई या उसके सामने नये किस्म की चुनौती आकर खड़ी हो गयी। लोकतंत्र की स्थापित अवधारणा है कि इसमें विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका स्तंभ के रूप में काम करती है और तीनों के काम तथा जिम्मेदारियां स्पष्ट रूप से विभाजित की गयी हैं। झारखंड की कार्यपालिका अपनी जिम्मेदारियों के प्रति उतनी गंभीर नहीं है, क्योंकि इन मामलों से साफ पता चलता है कि कुछ अफसरों ने अपनी जिम्मेदारी ठीक से नहीं निभायी। सरकारें आती-जाती रहती हैं, लेकिन सिस्टम तो कार्यपालिका से ही चलता है, यह बात ऐसे अफसर नहीं समझते। झारखंड में भ्रष्टाचार की इन कहानियों की पृष्ठभूमि में राज्य के भविष्य का आकलन करती आजाद सिपाही के विशेष संवाददाता राकेश सिंह की विशेष रिपोर्ट।

    संसदीय लोकतंत्र की मूलभूत अवधारणा यही है कि कोई भी शासन विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका नामक स्तंभों की मदद से चलता है। विधायिका नीतियों का निर्धारण करती है, कार्यपालिका उन नीतियों का पालन कराती है और कोई विवाद होने पर न्यायपालिका उसमें पंच की भूमिका निभाती है। बहुत से देश में मीडिया को चौथा स्तंभ कहा जाता है। अमेरिका के पहले राष्ट्रपति जॉर्ज वाशिंगटन ने 30 अप्रैल, 1789 को शपथ लेने के बाद अपने संबोधन में कहा था कि राष्ट्रपति के रूप में मैंने शपथ जरूर ली है, लेकिन अमेरिका का शासन तीन कंधों पर टिका हुआ है। कोई भी कंधा हिलने से देश हिल जायेगा। तब से लेकर आज तक यही माना जाता है कि लोकतंत्र की गाड़ी इन तीन पहियों पर ही चलती है।

    एक बार फिर झारखंड में लौटते हैं। पिछले कुछ दिनों से यहां भ्रष्टाचार के नये-नये किस्से उजागर हो रहे हैं। इनके किरदारों की पहचान भी हो रही है और हमेशा की तरह इन कहानियों पर सियासी मुलम्मा भी चढ़ाया जा रहा है। लेकिन इस हकीकत पर किसी का ध्यान नहीं जा रहा है कि इन किस्सों की शुरूआत 2019 के दिसंबर के बाद ही नहीं हुई है, बल्कि झारखंड को लूट-खसोट का अड्डा बनाने का सिलसिला 2007 में ही शुरू हो गया था। उस समय कमजोर राजनीतिक नेतृत्व ने कार्यपालिका को बेलगाम छोड़ दिया। इसका नतीजा यह हुआ कि अफसर राज्य को अपने हिसाब से चलाने लगे। मधु कोड़ा, अर्जुन मुंडा, हेमंत सोरेन और रघुवर दास में से किसी भी मुख्यमंत्री ने बेलगाम होते अफसरों को नियंत्रण में करने पर ध्यान नहीं दिया। इसका नतीजा यह हुआ कि अधिकारी राजनीतिक नेतृत्व को अंधेरे में रख कर मनमाना फैसला कराते रहे। यह विडंबना ही कही जा सकती है कि लगातार दूसरी बार राज्य में बनी पूर्ण बहुमत की सरकार तीन साल बाद ही राज्य के कुछ अधिकारियों की बेपरवाही या गैर-जिम्मेदार फैसलों के कारण संकट में घिरती नजर आ रही है। सरकार के सामने एक के बाद एक ऐसी चुनौतियां आकर खड़ी हो रही हैं, जिनके बारे में उसे कुछ पता ही नहीं है।

    शासन ऐसे नहीं चलता है, यह अधिकारियों को समझ लेना चाहिए। यदि किसी फैसले के लिए राजनीतिक नेतृत्व जिम्मेदार है, तो नौकरशाही को यह जिम्मेदारी लेनी होगी कि उस फैसले तक पहुंचने का रास्ता उसने ही दिखाया है।

    इस जिम्मेदारी से पीछे हटने के कारण ही आज हर मुद्दे के लिए सरकार की आलोचना होती है। यह रवैया ठीक नहीं है। इससे जहां लोकतांत्रिक व्यवस्था के दो स्तंभों के बीच की खाई चौड़ी होती है, वहीं समाज के विकास की प्रक्रिया को भी झटका लगता है। नौकरशाही लोकतंत्र का मजबूत फौलादी कवच है। इससे उम्मीद की जाती है कि वह विधायिका के काम को राज्यहित के अनुरूप आंके और अपने विवेक से उन पर अमल करे। लेकिन झारखंड में इसके विपरीत काम होता है। यहां के कुछ अफसर हमेशा इस बात की ताक में रहते हैं कि कैसे चीजों को विवादित बनाया जाये और कुछ उल्टा हुआ, तो पल्ला झाड़ कर निकल लिया जाये। यह दुखद स्थिति है। सरकार को ऐसे अधिकारियों को चिह्नित करना चाहिए और उनके खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए, ताकि भविष्य में इस तरह के गलत फैसलों की वजह से उसकी किरकिरी न हो सके। पुरानी कहावत है कि एक मछली पूरे तालाब को गंदा कर सकती है, तो नौकरशाही के भीतर का कोई एक अफसर भी पूरे राज्य पर असर डाल सकता है। ऐसे अफसरों के खिलाफ जितनी जल्दी एक्शन होगा, राज्य के लिए उतना ही अच्छा होगा।

    इस पूरी कहानी को मध्यप्रदेश की एक महिला आइएएस अधिकारी दीपाली रस्तोगी के उस चर्चित लेख से बखूबी समझा जा सकता है, जिसे भारतीय नौकरशाही के लिए ‘आइ ओपनर’ कहा जाता है। इस लेख में वह लिखती हैं: हम अपने बारे में, अपनी बुद्धिमत्ता के बारे में और अपने अनुभव के बारे में बहुत ऊंची राय रखते हैं और सोचते हैं कि लोग इसीलिए हमारा सम्मान करते हैं। जबकि असलियत यह है कि लोग हमारे आगे इसलिए समर्पण करते हैं, क्योंकि हमें किसी को फायदा पहुंचाने या किसी का नुकसान करने की ताकत दी गयी है। हमें वेतन और सुविधाएं इसलिए मिलती हैं कि हम अपने काम को कुशलता से करें और ‘सिस्टम’ विकसित करें। सच्चाई यह है कि हम कुप्रबंध और अराजकता फैला कर पनपते हैं, क्योंकि ऐसा करने से हम कुछ को फायदा पहुंचाने के लिए चुन सकते हैं और बाकी की उपेक्षा कर सकते हैं। हमें भारतीय गणतंत्र का ‘स्टील फ्रेम’ माना जाता है। सच्चाई यह है कि हममें दूरदृष्टि ही नहीं होती। हम अपने राजनीतिक आकाओं की इच्छा के अनुसार औचक निर्णय लेते हैं। हम पूरी प्रशासनिक व्यवस्था का अपनी जागीर की तरह अपने फायदे में या अपने चहेते लोगों के फायदे में शोषण करते हैं। हम काफी ढोंगी हैं, क्योंकि यह सब करते हुए हम यह दावा करते हैं कि हम लोगों की ‘मदद’ कर रहे हैं। दीपाली रस्तोगी के लेख के इस अंश को झारखंड की नौकरशाही से जोड़ने पर साफ पता चलता है कि उन्होंने कुछ भी गलत नहीं लिखा है।

    इस विकराल होती समस्या के पीछे राज्य के राजनीतिक नेतृत्व में भ्रष्ट अफसरों के खिलाफ कार्रवाई करने की इच्छा शक्ति का अभाव है। पिछले 22 वर्षों में झारखंड में एकाध मामलों में ही आइएएस-आइपीएस अफसरों के खिलाफ कार्रवाई इसका प्रमाण है। पूजा सिंघल के खिलाफ इडी की कार्रवाई को छोड़ दें, तो झारखंड के कई आइएएस-आइपीएस अफसरों ने अकूत संपत्ति अर्जित की है और उनका कुछ नहीं बिगड़ा है। उदाहरण के लिए राज्य के एक पूर्व मुख्य सचिव का हाउसिंग कॉलोनी की जमीन पर विशाल बहुमंजिली इमारत है। हर कोई जानता है कि पूर्व डीजीपी डीके पांडेय ने कांके के चामा में अवैध तरीके से जमीन खरीद ली और फिर उस पर आलीशान मकान बना लिया। उनकी पत्नी के नाम से हुए इस पूरे सौदे के खिलाफ कार्रवाई पर हाइकोर्ट ने रोक लगा दी है। राज्य के एक पूर्व मुख्य सचिव एके बसु को चारा घोटाले में 2017 में सजा भी सुनायी गयी थी। पूर्व मुख्य सचिव सजल चक्रवर्ती और एक दो पूर्व आइएएस-आइपीएस पर भी कार्रवाई हुई, लेकिन सच यही है कि इसमें कोई बड़ी मछली नहीं फंसी। पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा को सजा तो मिली, लेकिन पूरे झारखंड को यह पता है कि उनके कंधे पर बंदूक रख कर गोली किसने चलायी, लेकिन उसका कुछ नहीं बिगड़ी। यह सूची यहीं खत्म नहीं होती। झारखंड के एक आइएएस अफसर के पास रांची में एक सात मंजिली व्यावसायिक इमारत है, तो एक पूर्व मुख्य सचिव ने मुंबई में फिल्म स्टूडियो में करोड़ों निवेश कर रखा है।

    झारखंड के अफसरों के भ्रष्टाचार की कहानी का सबसे दुखद पहलू यह है कि पहले ये लोग अपनी संपत्ति दूसरे राज्यों में निवेश करते थे, लेकिन अब ये खुलेआम झारखंड में निवेश करने लगे हैं। इसके पीछे का कारण यह है कि अब इन अफसरों के खिलाफ कार्रवाई नहीं होती। इसलिए इनकी हिम्मत बढ़ गयी है। एक आइएएस अफसर ने कहा कि यदि पूजा सिंघल के खिलाफ 2010 में ही मनरेगा घोटाले में कार्रवाई हो गयी होती, तो आज झारखंड को शर्मसार नहीं होना पड़ता। कोई कार्रवाई तो हुई नहीं, उलटे उनके ओहदे बढ़ते गये और हर सरकार में वह आंखों की पुतली बनी रहीं। दरअसल झारखंड में भ्रष्टाचार की यह नदी ऊपर से शुरू होती है, जो नीचे तक आती है। अपने सीनियर अफसरों के कारनामों को देख कर जूनियर अफसर भी सोचते हैं कि यहां कार्रवाई नहीं होती, तो फिर संपत्ति अर्जित करने में बुराई क्या है।

    प्रख्यात हास्य कवि काका हाथरसी की एक मशहूर कविता है, ‘क्यों डरता है बेटा रिश्वत लेकर-छूट जायेगा तू भी रिश्वत देकर’। अच्छी और कमाऊ पोस्टिंग की लालच में अफसर अपने राजनीतिक आकाओं के आगे दुम हिलाते हैं और बदले में भ्रष्टाचार का लाइसेंस पाते हैं। सरकारी जांच एजेंसिया राजनेताओं की तो खूब बखिया उधेड़ती हैं, लेकिन उनकी यह जांच आखिरकार आइएएस-आइपीएस तक क्यों नहीं जाती। झारखंड को लूटनेवाले इन अफसरों के खिलाफ अब कार्रवाई का समय आ गया है। इनकी महंगी पार्टियों का शोर, जिनमें विदेशी शराब पानी की तरह बहायी जाती है और संपन्नता का अश्लील प्रदर्शन किया जाता है, अब झारखंड के जंगलों-बस्तियों में सुनी जानेवाली मांदर की थाप की गूंज में दबाने के लिए यह मुफीद वक्त है।

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