विशेष
झारखंड के ‘बिहार’ की राजनीतिक परिस्थितियां पूरी तरह अलग हैं
किसी भी दल या प्रत्याशी के लिए आसान नहीं है इस बार का चुनाव
विकास और पिछड़ेपन के साथ राजनीतिक मुद्दों का भी होगी परीक्षा
नमस्कार। आजाद सिपाही विशेष में आपका स्वागत है। मैं हूं राकेश सिंह।
झारखंड में राजनीतिक रूप से सबसे जागरूक और संवेदनशील, लेकिन विकास के मामले में सबसे पिछड़े इलाकों में शुमार पलामू अलग राजनीतिक सुर-ताल के साथ चलता है। झारखंड का ‘बिहार’ कहा जानेवाला पलामू अपनी राजनीतिक चेतना और संवेदनशीलता के कारण अलग पहचान रखता है। इसलिए यहां की राजनीति हमेशा दलों के साथ नेताओं की भी अग्निपरीक्षा लेती है। यही कारण है कि यहां की मिट्टी में पैदा होकर कई लोग देश और प्रदेश स्तर के नेता बने और झारखंड की दशा-दिशा को भी पलामू की धरती से ताकत मिली। लेकिन अब स्थिति बदल रही है। पलामू के लोग अब अपनी पीड़ा को खुल कर बताते हैं और लोकतांत्रिक व्यवस्था के सबसे मजबूत हथियार, यानी वोट से इसे समय-समय पर व्यक्त भी करते हैं। पलामू के लोगों की राजनीतिक जागरूकता का ही प्रमाण है कि यहां कभी किसी एक दल का वर्चस्व कायम नहीं हुआ। चाहे लोकसभा का चुनाव हो या विधानसभा का, पलामू में न तो मुद्दों की कमी होती है और न प्रत्याशियों की। इसलिए पलामू को झारखंड की राजनीति का केंद्रबिंदु भी माना जाता है। इन परिस्थितियों में इस बार का विधानसभा चुनाव भी यहां बेहद रोचक होनेवाला है, क्योंकि पलामू के लोग हर राजनीतिक दल को उसके कामकाज और प्रदर्शन की कसौटी पर कसने के लिए तैयार हैं। जिले की पांच सीटों पर पहले चरण में 13 नवंबर को वोट डाले जायेंगे। इसलिए यहां प्रचार अ•िायान के लिए बहुत कम समय बचा है। ऐसे में यह जानना दिलचस्प है कि पलामू जिले की पांच सीटों पर मुकाबले की क्या तस्वीर है और इन सीटों पर कौन से मुद्दे हावी रह सकते हैं। इस बार क्या है इन सीटों का माहौल और क्या हैं इन सीटों के चुनावी मुद्दे, बता रहे हैं आजाद सिपाही के विशेष संवाददाता राकेश सिंह।
करीब 20 लाख की आबादी और तीन जिलों, मेदिनीनगर, गढ़वा तथा लातेहार को मिला कर बनाये गये पलामू प्रमंडल को झारखंड का ‘बिहार’ भी कहा जाता है। यह इलाका विकास के पैमाने पर पिछड़ा जरूर है, लेकिन यहां की हवाओं में राजनीति की खुश्बू को हर पल महसूस किया जा सकता है। पलामू की प्रति व्यक्ति आय झारखंड के औसत के मुकाबले करीब नौ हजार रुपये कम है। झारखंड की प्रति व्यक्ति आय जहां 63 हजार 754 रुपये प्रति वर्ष है, वहीं पलामू में यह 54 हजार 883 रुपये है। अपनी गोद में 970 किस्म की वनस्पतियों को समेटनेवाली पलामू की धरती आज भी विकास के लिए तरस रही है। पिछड़ेपन का कलंक चस्पां होने के बावजूद पलामू झारखंड की राजनीति के सबसे संवेदनशील इलाके के रूप में चर्चित है। पलामू में विधानसभा चुनाव के मुकाबले की तस्वीर साफ हो गयी है। इस प्रमंडल के तीन जिलों, मेदिनीनगर, गढ़वा और लातेहार में कुल नौ विधानसभा सीटें हैं, जिनमें से अधिकांश पर पुराने प्रतिद्वंद्वियों के बीच ही मुकाबला होना है।
राजनीतिक रूप से सबसे जागरूक है पलामू जिला
पिछड़ेपन का धब्बा अपने माथे पर लिये पलामू जिला राजनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील और जागरूक है। यहां के लोगों की राजनीतिक चेतना का प्रमाण यही है कि पलामू आज तक किसी राजनीतिक दल या विचारधारा का गढ़ नहीं बना है। यहां से चुने जानेवाले लोग हमेशा काम की कसौटी पर कसे जाते रहे हैं और यह सिलसिला लोकसभा चुनाव से लेकर पंचायत स्तर तक के चुनाव में जारी रहता है। इसलिए पलामू को कोई भी दल या प्रत्याशी हलके में लेने की भूल नहीं करता है।
क्या है पलामू का राजनीतिक परिदृश्य
पलामू की राजनीति में धुरंधर माने जानेवाले नेताओं के राजनीतिक रिश्ते बनते-बिगड़ते रहे हैं। पलामू हमेशा से राजनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील और जागरूक रहा है। झारखंड अलग राज्य बनने के बाद से पलामू के राजनीतिक मैदान का स्वरूप पूरी तरह से बदल गया है। कोयल और बटाने नदी में बहुत पानी बह चुका है। पुराने स्थापित नेताओं की सक्रियता कम हुई है, तो नये चेहरों ने उस खालीपन को भरा है। पूरे देश की तरह यहां की राजनीति में भी आक्रामकता का बोलबाला बढ़ा है। झारखंड में सत्ता की राजनीति में जबदस्त दखल रखने वाले पलामू जिले में विधानसभा की पांच सीटें हैं। इनमें डालटनगंज, विश्रामपुर, छतरपुर, भवनाथपुर और पांकी शामिल हैं। इन सभी सीटों पर फिलहाल भाजपा का कब्जा है।
क्या है विधानसभा चुनाव का परिदृश्य
पलामू जिले की पांच विधानसभा सीटों को लेकर चुनावी समीकरण की तस्वीर अब साफ हो गयी है। इस तस्वीर से एक बात साफ हो गयी है कि अधिकांश सीटों पर इस बार भी हालांकि मुकाबला पुराने प्रतिद्वंद्वियों के बीच ही है, लेकिन कोई भी मुकाबला किसी भी दल या प्रत्याशी के लिए आसान नहीं है। हर सीट पर वोटों की छीना-झपटी को लेकर दलों और उम्मीदवारों के बीच झकझूमर शुरू है। हर विधानासभा क्षेत्र में जनसंपर्क शुरू हो गया है। जिले की सभी पांच सीटों पर भाजपा के प्रत्याशी मैदान में हैं, जबकि सत्तारूढ़ इंडी गठबंधन के दो घटक दलों, कांग्रेस और राजद में दो सीटों, विश्रामपुर और छतरपुर में दोस्ताना संघर्ष की स्थिति है। सत्तारूढ़ गठबंधन में कांग्रेस ने डाल्टनगंज, पांकी और विश्रामपुर सीट पर प्रत्याशी उतारा है, जबकि राजद ने हुसैनाबाद और छतरपुर के साथ विश्रामपुर में प्रत्याशी दिया है।
डाल्टनगंज: एक बार फिर चौरसिया बनाम त्रिपाठी
पलामू के प्रमंडलीय मुख्यालय डाल्टनगंज का विधानसभा क्षेत्र शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में फैला है। यहां 2019 की तरह भाजपा के आलोक चौरसिया और कांग्रेस के केएन त्रिपाठी एक बार फिर आमने-सामने हैं। झारखंड की राजनीति के दिग्गज इंदर सिंह नामधारी के पुत्र दिलीप नामधारी तीसरा कोण बनाने की कोशिश में मैदान में उतरे हैं। यहां का सामाजिक समीकरण ऐसा है कि हर वर्ग हर दल या प्रत्याशी को भरोसा दिलाता है। यहां ब्राह्मण, राजपूत और कायस्थ के अलावा ओबीसी में वैश्य और बरई निर्णायक हैं। पिछली बार आलोक ने 21 हजार 517 वोटों के अंतर से त्रिपाठी को हराया था। वोट शेयर के मामले में त्रिपाठी को चौरसिया से करीब 10% वोट कम मिले थे। भाजपा ने इस बार भी ओबीसी और सामान्य वोटरों की गोलबंदी की है। कांग्रेस को अपने आधार वोटरों पर भरोसा है।
छतरपुर में पुष्पा देवी के पास इतिहास बनाने का मौका
छतरपुर का चुनावी इतिहास बताता है कि यहां से कोई दोबारा नहीं जीतता। इस बार भाजपा प्रत्याशी पुष्पा देवी के लिए यह चुनौती है और अवसर भी। यहां राजद और कांग्रेस के बीच दोस्ताना संघर्ष हो रहा है, इसलिए भाजपा के लिए रास्ता आसान दिख रहा है। पिछली बार पुष्पा ने राजद के विजय कुमार को 26772 से हराया था। उनका वोट शेयर 22.93% था। इस बार भी पुष्पा के सामने राजद के विजय कुमार ही हैं। पिछली बार आजसू के राधाकृष्ण किशोर को 16 हजार वोट मिले थे। इस बार वह कांग्रेस प्रत्याशी हैं। वे यहां से पांच बार विधायक रहे हैं। इस विधानसभा क्षेत्र में भुइयां और अनुसूचित जाति के मतदाता निर्णायक संख्या में हैं। वैसे यादव, ब्राह्मण और भूमिहार भी यहां अच्छी संख्या में हैं।
विश्रामपुर में भाजपा के पास हैट्रिक लगाने का मौका
चंद्रवंशी और यादव बहुल विश्रामपुर में इस बार भाजपा के रामचंद्र चंद्रवंशी के पास हैट्रिक लगाने का मौका है। इस बार के चुनावी मैदान में वह सबसे उम्रदराज प्रत्याशी हैं। पिछली बार चंद्रवंशी ने 8513 वोटों से बसपा के राजेश मेहता को हराया था। उनका वोट शेयर 21.59% था। पिछली बार निर्दलीय लड़े नरेश सिंह इस बार राजद के उम्मीदवार हैं। वह पिछली बार तीसरे स्थान पर रहे थे। इस बार उन्हें सीधी टक्कर में माना ज रहा है। कांग्रेस ने भी इस बार सुधीर चंद्रवंशी के रूप में अपना उम्मीदवार उतारा है।
पांकी में शशिभूषण मेहता के सामने लाल सूरज
कभी नक्सलवाद के लिए पूरे देश में चर्चित पांकी का सामाजिक समीकरण आज भी बहुतों को समझ में नहीं आता है। यहां अगड़े-पिछड़े के संघर्ष से प्रभावित सैकड़ों परिवारों ने अपना घर छोड़ दिया था। पर अब स्थिति वैसी नहीं है। जातीय संघर्ष वाले इस क्षेत्र में पहली बार 2019 में भाजपा जीती। उससे पहले यह क्षेत्र कांग्रेस के विदेश सिंह के प्रभाव वाला माना जाता था। 2019 में भाजपा के शशिभूषण मेहता ने 37 हजार 190 वोटों के अंतर से कांग्रेस के देवेंद्र सिंह उर्फ बिट्टू सिंह को हराया था। इस बार बिट्टू की जगह लाल सूरज को कांग्रेस ने टिकट दिया है। बिट्टू इस बार निर्दलीय हैं। शशिभूषण ने अपने कार्यकाल में पांकी को कई सौगात दी है। इसलिए कहा जा रहा है कि उनकी राह बहुत मुश्किल नहीं है।
हुसैनाबाद में पाला बदलनेवाले कमलेश सिंह की परीक्षा
हुसैनाबाद बहुकोणीय संघर्ष वाला क्षेत्र है। भाजपा यहां 1990 के बाद नहीं जीती है। 2005 में 34 वोटों से कमलेश सिंह जीते थे। पिछली बार भी वे 9849 वोट के अंतर से जीते थे। उनके निकटतम प्रतिद्वंद्वी राजद के संजय सिंह यादव थे। पिछली बार एनसीपी के उम्मीदवार रहे कमलेश सिंह इस बार भाजपा के प्रत्याशी हैं। राजद के संजय और बसपा से शिवपूजन मेहता भी मैदान में हैं। पिछली बार भाजपा के समर्थन से चुनाव मैदान में उतरे विनोद सिंह इस बार निर्दलीय लड़ रहे हैं। भाजपा के ही कर्नल संजय सिंह भी बागी बन कर चुनाव मैदान में हैं। हुसैनाबाद में राजपूत और यादव मतदाता निर्णायक संख्या में हैं।
सब कुछ देख-सुन रही है जनता
चुनावी मैदान में उतर कर विधानसभा के भीतर प्रवेश पाने की कोशिश में लगे इन प्रत्याशियों और उनके दलों को पलामू की जनता बड़े गौर से देख-सुन रही है। पूरे जिले में यह चर्चा आम है कि इस बार भी वोट का आधार नाम नहीं, काम को ही बनाया जायेगा। ऐसे में सभी सीटिंग विधायकों को उनके काम की कसौटी पर कसा जायेगा। इन सभी के सामने अपनी उपलब्धियां गिनाने की चुनौती है। दूसरी तरफ उन्हें चुनौती देनेवालों के सामने अपनी बात को साबित करने का चैलेंज है।