गुजरात विधानसभा चुनाव के दूसरे चरण के प्रचार में अब पाकिस्तान भी बड़ा मुद्दा बन गया है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सवाल कर रहे हैं कि कांग्र्रेसी नेता मणिशंकर अय्यर के घर पर आयोजित एक पार्टी में पाकिस्तान के पूर्व विदेश मंत्री खुर्शीद कसुरी और पाकिस्तानी उच्चायुक्त की पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी के साथ गुप्त बैठक क्यों हुई? फिर पाकिस्तान के किसी अफसर ने ऐसा बयान क्यों दिया कि गुजरात का अगला मुख्यमंत्री अहमद पटेल को बनाया जाए? हालांकि पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और कांग्र्रेस प्रवक्ता आनंद शर्मा ने मोदी के आरोप को निराधार कह दिया है और कहा है कि प्रधानमंत्री मोदी प्रचार की लक्ष्मण रेखा को बिना विचारे लांघ रहे हैं, उन्हें ऐसे आरोप के लिए राष्ट्र से माफी मांगनी चाहिए।
डॉ. सिंह का आरोप है कि प्रधानमंत्री राजनीतिक लाभ लेने के लिए झुठ का सहारा ले रहे हैं। यह बात सही है कि हाल ही में कांग्र्रेसी नेता अय्यर के घर पर एक निजी दावत हुई थी, जिसमें पाक के नेताओं व उच्चायुक्त ने हिस्सा लिया था उनके साथ डॉ. मनमोहन सिंह, हामिद अंसारी, पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल दीपक कपूर और पत्रकार भी पार्टी में मौजूद थे और साथ-साथ बैठे थे। डॉ. मनमोहन सिंह दस साल देश के प्रधानमंत्री रहे हैं और ऐसी हस्ती के बीच पाकिस्तान का कोई भी राजनयिक किसी भी तरह की साजिश की हिम्मत नहीं जुटा सकता। फिर जनरल कपूर भी सेना के उच्चस्थ पद पर रहे हैं तो उनसे भी किसी तरह की सांठ-गांठ की उम्मीद नहीं की जा सकती। प्रधानमंत्री मोदी को चुनावी राजनीति में किसी दावत पार्टी की बैठक को पाकिस्तान की दखल अंदाजी बताकर मामला नहीं उठाना चाहिए था। यह ठीक है कि चुनाव है और भाजपा अपनी जीत सुनिश्चित करना चाहती है, लेकिन वोटों के ध्रुवीकरण के लिए इस तरह के निराधार मुद्दों को उठाने से तो भाजपा की कमजोरी ही साबित होती है। फिर प्रधानमंत्री मोदी से एक यह सवाल किया जा सकता है कि क्या उनकी नजर में पाकिस्तान इतना प्रबल देश हो गया है, जो भारत के किसी चुनाव की दिशा बदल सकता है? क्या भाजपा के नेता भारतीय मतदाताओं को इतना अपरिपक्व मानते हैं? क्या यह भारतीय लोकतंत्र का मजाक उड़ाना जैसा नहीं है? जहां तक मुस्लिम वोटों का सवाल है तो भाजपा को उनका नजरिया अच्छी तरह पता है। यदि अय्यर के भोज में कोई गुप्त बैठक थी और भाजपा को हराने के लिए थी, तो यह मोदी को कैसे पता चला?
यदि ऐसी बैठक का पहले पता चल गया था तो ऐसे लोगों के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं की गई? यदि गुजरात चुनाव जीतने के लिए पाकिस्तान और कांग्र्रेस पार्टी के बीच किसी गठजोड़ का आरोप लगाया गया है तो ऐसा विवाद भी पैदा करना उचित नहीं माना जा सकता। क्योंकि यह आरोप काफी गंभीर और संवेदनशील भी हैं। सरकार को अच्छी तरह पता है कि भारत और पाकिस्तान ही नहीं, दूसरे देशों के राजनयिकों के बीच ऐसी बैठकें आम हैं। मणिशंकर अय्यर भी राजनयिक रहे हैं और उनके यहां पहले भी बैठकें और मेल-मुलाकात होती रही हैं। फिर भारत और पाकिस्तान के कई गैर-राजनीतिक संगठन दोनों देशों के रिश्तों को सहज बनाने के लिए विचार गोष्ठियों का आयोजन करते रहे हैं। फिर पाकिस्तान के एक पूर्व फौजी अफसर की इतनी राजनीतिक हैसियत भी नहीं है कि वह तय करे कि गुजरात में मुख्यमंत्री कौन बनेगा? ऐसी हैसियत सिर्फ और सिर्फ गुजरात के मतदाताओं की है। यह खेदजनक है कि भारतीय राजनीति में चुनावों के दौरान एक-दूसरे पर आधारहीन आरोप लगाए जाते हैं, प्रचार में बदजुबानी का भी इस्तेमाल किया जाता है। दरअसल, हमारे देश के लगभग सभी राजनीतिक दल विचारधारा और राजनीतिक सिद्धांतों को भुलाए जा रहे हैं। एक-दूसरे पर बेबुनियाद आरोप लगाने का प्रचलन लगातार बढ़ता जा रहा है। आज प्रधानमंत्री मोदी देश की राजनीति में एक नायक की तरह उभरे हैं और भारतीय जनता को उनसे काफी अपेक्षाएं हैं। ऐसे राष्ट्रीय नायक को चुनाव प्रचार में बेबुनियाद मुद्दों को उछालने बचना चाहिए और भारतीय मतदाताओं पर भरोसा करना चाहिए।