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    Home»Top Story»नये खिलाड़ियों के सामने है डबल चैलेंज
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    नये खिलाड़ियों के सामने है डबल चैलेंज

    azad sipahi deskBy azad sipahi deskDecember 5, 2019No Comments5 Mins Read
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    भाजपा ने तीन और झामुमो-आजसू-कांग्रेस ने एक-एक नये खिलाड़ी को उतारा है मैदान में

    लोकसभा चुनाव से ठीक पहले इसी साल छह अप्रैल को जब भाजपा ने झारखंड की सबसे प्रतिष्ठित रांची सीट से संजय सेठ को अपना उम्मीदवार घोषित किया था, तो राजनीतिक हलकों में खुसफुसाहट होने लगी। अपनी सीटिंग सीट से एक अनुभवहीन प्रत्याशी को उतारने के भाजपा के फैसले पर अंगुली उठने लगी। लेकिन 23 मई को रिजल्ट आने के साथ ही तमाम अंगुलियां शांत हो गयीं। कोई भी चुनाव नहीं लड़नेवाले संजय सेठ ने कई चुनावों में किस्मत आजमा चुके अपने दिग्गज प्रतिद्वंद्वी सुबोधकांत सहाय को पौने तीन लाख से अधिक मतों के अंतर से हरा दिया। हालांकि बाद में भाजपा नेताओं ने स्वीकार किया था कि संजय सेठ पर पार्टी ने बड़ा दांव खेला था और उन्होंने इसे सही साबित कर दिया। भाजपा ने झारखंड विधानसभा चुनाव में भी ऐसा ही दांव खेला है। यही दांव झामुमो, कांग्रेस और आजसू ने भी खेला है। विधानसभा चुनाव के दूसरे चरण में जिन 20 सीटों पर चुनाव हो रहे हैं, उनमें से भाजपा ने कुल चार विधायकों के टिकट काटे हैं। इनमें से तीन पर उसने ऐसे उम्मीदवारों को उतारा है, जिन्हें चुनाव लड़ने का कोई अनुभव नहीं है। ये हैं घाटशिला से लखन मार्डी, जमशेदपुर पश्चिमी से देवेंद्र सिंह और सिमडेगा से सदानंद बेसरा। लखन मार्डी को लक्ष्मण टुडू के स्थान पर उम्मीदवार बनाया गया है, जिन्होंने पिछला चुनाव छह हजार से अधिक मतों के अंतर से जीता था। लखन मार्डी का मुकाबला इस बार राजनीति के पुराने खिलाड़ी और आजसू के प्रदीप बलमुचू के साथ है। लखन मार्डी के पास चुनाव लड़ने का कोई अनुभव नहीं है। इस नाते उनपर दोहरी जिम्मेवारी है।
    इसी तरह जमशेदपुर पश्चिमी सीट से भाजपा ने देवेंद्र सिंह को उम्मीदवार बनाया है। उन्हें सरयू राय के स्थान पर टिकट दिया गया है। सरयू राय इस बार जमशेदपुर पश्चिमी से निर्दलीय चुनाव लड़ रहे हैं। पिछली बार उन्होंने जमशेदपुर पश्चिमी सीट कांग्रेस के बन्ना गुप्ता को करीब 11 हजार मतों के अंतर से हरा कर जीती थी। इस बार बन्ना गुप्ता एक बार फिर मैदान में हैं। वह इस सीट का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। देवेंद्र सिंह के सामने जहां बन्ना गुप्ता को पटखनी देने की चुनौती है, वहीं यह साबित करने का चैलेंज भी है कि सरयू राय के बागी बनने का कोई असर भाजपा पर नहीं पड़ा है।
    भाजपा ने सिमडेगा की सीटिंग विधायक विमला प्रधान को भी इस बार टिकट नहीं दिया है। पिछला चुनाव उन्होंने तीन हजार से अधिक मतों के अंतर से जीता था और मंत्री भी बनीं। इस बार पार्टी ने उनके स्थान पर श्रद्धानंद बेसरा को चुनाव मैदान में उतारा है, जिनका यह पहला चुनाव है। सदानंद बेसरा के सामने झारखंड पार्टी की आइरीन एक्का हैं, जो एनोस एक्का की पुत्री हैं। उनके अलावा दूसरे प्रत्याशी भी हैं, जिनसे पार पाना सदानंद बेसरा के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण होगा।
    अब बात झामुमो की। पार्टी ने तोरपा सीट से अपने सीटिंग विधायक पौलुस सुरीन को इस बार टिकट नहीं दिया है। पिछली बार पौलुस महज 43 वोट के अंतर से जीत सके थे। इस बार उनके स्थान पर झामुमो ने सुदीप गुड़िया को उतारा है, जिनके पास चुनाव लड़ने का कोई अनुभव नहीं है। सुदीप के सामने जहां तोरपा सीट बचाने की जिम्मेवारी है, वहीं वोट का अंतर बढ़ाने के साथ निर्दलीय के रूप में चुनाव मैदान में उतरे पौलुस सुरीन को पछाड़ने की भी चुनौती है।
    इसी तरह आजसू ने तमाड़ में भी बड़ा दांव खेला है। पिछला चुनाव 16 हजार से अधिक मतों के अंतर से जीतनेवाले उसके विधायक विकास मुंडा इस बार झामुमो के खेमे से चुनाव लड़ रहे हैं। आजसू ने राम दुर्लभ सिंह मुंडा को यहां से अपना उम्मीदवार बनाया है। उनके सामने जहां विकास मुंडा की चुनौती है, वहीं भाजपा की रीता देवी मुंडा के अलावा पिछली बार दूसरे नंबर पर रहे राजा पीटर और इलाके में आतंक मचानेवाले पूर्व नक्सली कमांडर कुंदन पाहन भी हैं। इन चार दमदार प्रतिद्वंद्वियों के बीच राम दुर्लभ सिंह मुंडा खुद को कैसे स्थापित करते हुए आजसू के लिए सीट बचाते हैं, यह देखना बेहद दिलचस्प होगा।
    जहां तक कांग्रेस का सवाल है, तो उसने जगन्नाथपुर से इस बार सोनाराम सिंकू को अपना उम्मीदवार बनाया है। पिछली बार यहां से जयभारत समानता पार्टी की गीता कोड़ा 24 हजार से अधिक मतों के अंतर से जीती थीं। लोकसभा चुनाव से पहले वह कांग्रेस में शामिल हो गयीं और उनकी पार्टी का विलय भी हो गया। इसके बाद गीता कोड़ा लोकसभा के चुनाव में भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष लक्ष्मण गिलुआ को हरा कर सांसद बन गयीं। जगन्नाथपुर में सोनाराम सिंकू को प्रत्याशी बना कर कांग्रेस ने बड़ा दांव खेला है। उन्हें जहां गीता कोड़ा की विरासत को बरकरार रखते हुए जीत हासिल करना होगा, वहीं भाजपा के सुधीर सुंडी, आजसू के मंगल सिंह सुरेन और झाविमो के दिग्गज मंगल सिंह बोबोंगा के बीच खुद को स्थापित भी करना है।
    इसमें कोई शक नहीं कि ये नये खिलाड़ी मुकाबले को बेहद रोमांचक बना रहे हैं। अनुभव की कमी का असर इनकी तैयारियों पर नहीं दिख रहा है। कहा जा सकता है कि इन नये खिलाड़ियों ने अपने चुनाव प्रबंधन में नये तरीकों का इस्तेमाल भी किया है, जिसके कारण इन सीटों का चुनाव दिलचस्प हो गया है। परिणाम को 23 दिसंबर को ही पता चलेगा।

    Double challenge is in front of new players
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