भारतीय समाज दर्शन के पितामह आर्य चाणक्य ने “साम, दाम, दंड, भेद” इन चार प्रमुख बिंदुओं को राजनीति का आधार बताया था। चाणक्य के सिद्धांत में अंतिम बिंदु रहे “भेद” में अफवाह और भ्रम के मायाजाल का प्रयोग किया जाता है। भारत में बीते कुछ वर्षों से चल रहे आंदोलन इसी “भेद” की नीति पर आधारित हैं। इसी के तहत बीते 10 दिनों से देश में किसानों के नाम पर आंदोलन खड़ा किया गया। इस आंदोलन के जरिए केंद्र सरकार के खिलाफ भ्रम फैलाकर देश व समाज में असंतोष पैदा किया जा रहा है।

 वस्तुतः देशविरोधी शक्तियां, जो प्रजातांत्रिक तरीकों से सरकार को अस्थिर करने में असफल रही हैं, वह अलग-अलग मुद्दों और तरीकों से सरकार को अस्थिर करने का ष़ड्यंत्र रच रही हैं, सरकार को दबाव में लाने का प्रयास कर रही हैं। कुछ माह पहले हाथरस में हुआ कांड इस बात का जीता जागता उदाहरण है। हाथरस में जबलपुर की एक महिला पीड़ित परिवार में भाभी बनकर रह रही थी। ज्योहिं उसकी पोल खुली, वह पूरा मामला फुस्स हो गया। ठीक उसी तरह किसानों को आगे करके चलाये जा रहे इस आंदोलन के जरिए असामाजिक शक्तियां अपना जाल बिछाकर राजनीति कर रही हैं। किसान आंदोलन में हुई सभी सरकार विरोधी दलों और संगठनों की भागीदारी और इस आंदोलन के दौरान उठाए जा रहे मुद्दे इस बात की ओर स्पष्ट इशारा करते हैं कि देश में गहरे षडयंत्र रचे जा रहे हैं। किसान आंदोलन के दौरान पिछले कई दिनों में रह-रहकर खलिस्तान के समर्थन में नारेबाजी हो रही है। विदेशों में बैठे खालिस्तान समर्थक वहां भी इसी तरह का विरोध प्रदर्शन कर इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रचारित करना चाहते हैं। वहीं सीएए, एनआरसी और कश्मीर से हटाए गए अनुच्छेद 370 के खिलाफ भी लोगों को भडकाया जा रहा है। कुल मिलाकर भारत विरोधी शक्तियां और पथभ्रष्ट राजनीतिक दल किसान आंदोलन के नाम पर लामबंद हुए हैं।

बीते कई सालों से किसान पुराने कृषि कानूनों से परेशान हो रहा है। देश के कई राज्यों में किसानों ने बड़ी संख्या में आत्महत्या भी की। नतीजतन सभी पार्टियां कृषि कानून में संशोधन चाहती थीं। यहां तक कि कांग्रेस ने 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान जारी किए गए अपने घोषणा पत्र में एपीएमसी एक्ट हटाने का जिक्र किया था। वहीं तत्कालीन कृषि मंत्री रहे शरद पवार ने भी राज्यों को चिठ्ठी लिखकर कृषि कानून में बदलाव का समर्थन करने का आवाहन किया था। वर्तमान केन्द्र सरकार ने किसान और सभी राजनीतिक दलों की इच्छा को कानून का रूप देकर उसे अमली जामा पहनाया । किन्तु बिचौलियों और दलालों का नेटवर्क ध्वस्त करने वाला कानून पास होते ही देश विरोधी ताकतें और विरोधी राजनीतिक दलों ने इन कानून का विरोध करना प्रारंभ कर दिया।

सच बात तो यह है कि इन लोगों का किसानों से कोई सरोकार नहीं है। यह लोग किसान आंदोलन के जरिए सरकार के खिलाफ असंतोष फैलाकर देश में अराजकता का माहौल पैदा कर रहे हैं। भारत में अराजकता, असंतोष और अस्थिरता पैदा कर सत्ता हथियाने का यह षड्यंत्र है। दूसरी तरफ वैश्वक जगत में बड़ी आर्थिक ताकत बनकर उभर रहे भारत के खिलाफ कुछ अन्तरराष्ट्रीय शक्तियां भी लामबंद हैं। वे भी भारत की विकास की रफ्तार रोकने के लिए इस तरह के आंदोलनों को हवा देकर हमें अस्थिर करना चाहती हैं। हमारे देश के नागरिकों, विशेषकर किसान भाईयों को इस षडयंत्र को पहचान कर ऐसे लोगों से सावधान रहने की जरूरत है।

यह भी देखा जा रहा है कि जिन लोगों का खेती-किसानी से कोई लेना-देना नहीं है, ऐसे लोग भी सोशल मीड़िया में मौजूदा सरकार और उसके मुखिया नरेन्द्र मोदी के खिलाफ जहर उगल रहे हैं। यदि किसान संगठनों की ओर से की गई मांगों पर और उस पर सरकार के रुख को देखें तो यह स्पष्ट होता है कि किसानों को ढाल बनाकर देशविरोधी शक्तियां तेजी से सक्रिय व एकजुट हो गई हैं। किसान आंदोलन के शोरगुल में कश्मीर और खलिस्तानी आतंकियों का हथियारों के साथ दिल्ली पर धावा बोलना महज एक संयोग तो नहीं हो सकता। एक तरफ जहां देश का किसान अपने पसीने से खेत सींच रहा है उस वक्त किसानों के नाम पर अराजकता फैलाने वाले चेहरों को पहचान कर बेनकाब करने का वक्त आ गया है।

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