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    Home»विशेष»चतरा संसदीय क्षेत्र में इस बार ‘स्थानीय सांसद’ का ही शोर
    विशेष

    चतरा संसदीय क्षेत्र में इस बार ‘स्थानीय सांसद’ का ही शोर

    adminBy adminFebruary 25, 2024Updated:February 27, 2024No Comments8 Mins Read
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    62 साल बीतने के बावजूद ‘बाहरी आवाज’ पर निर्भर है यह क्षेत्र
    गरीबी और बेरोजगारी जैसे मुद्दों के सहारे इस बार नहीं गलेगी दाल
    कभी नक्सलियों का गढ़ रहे चतरा को अब भी है विकास की आस

    चतरा। चतरा लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र झारखंड के 14 लोकसभा निर्वाचन क्षेत्रों में से एक है। इस संसदीय क्षेत्र में चतरा, लातेहार और पलामू जिले के विधानसभा क्षेत्रों को समाहित किया गया है। 1952 में देश के लिए हुए पहले लोकसभा निर्वाचन में यह सीट अस्तित्व में नहीं थी। 1957 में यहां सांसद चुनने के लिए पहली बार मतदान हुआ। यह क्षेत्र वनीय संपदा से भरा हुआ है। यहां औषधीय पौधों, केंदू के पत्तों, बांस, साल, सागौन, और जड़ी-बूटियां पायी जाती हैं। जिले में जंगली जीवों के संरक्षण के लिए लावालौंग वाइल्ड लाइफ अभयारण्य भी बनाया गया है, जो यहां बाघों की मेजबानी करता है। चतरा संसदीय क्षेत्र का भूगोल और इतिहास चौंकाने वाला है। यह संसदीय सीट शायद देश की एकमात्र ऐसी सीट है, जहां आज तक कोई स्थानीय व्यक्ति सांसद नहीं चुना गया, यानी यहां का कोई भी सांसद इस संसदीय क्षेत्र का मतदाता नहीं रहा है। चतरा कभी पूरी दुनिया में चर्चित हुआ था, क्योंकि नक्सलियों ने इसे पहला ‘लिबरेटेड जोन’ (स्वतंत्र क्षेत्र) घोषित किया था।
    बिहार के गया से सटे होने के कारण चतरा कभी नक्सलियों का गढ़ हुआ करता था, लेकिन अब यहां आम तौर पर शांति है। गरीबी और पिछड़ेपन के अलावा पलायन जैसे मुद्दे यहां भी हैं, लेकिन इस बार चारों तरफ ‘स्थानीय सांसद’ का ही शोर सुनाई दे रहा है। इसलिए राजनीतिक दलों की चिंता बढ़ गयी है। चतरा संसदीय क्षेत्र का क्या है राजनीतिक माहौल और क्या हो सकते हैं चुनावी मुद्दे, बता रहे हैं आजाद सिपाही के विशेष संवाददाता राकेश सिंह।

    झारखंड का चतरा संसदीय क्षेत्र राज्य की आठ सामान्य सीटों में से एक है। बिहार के गया जिले से सटे चतरा को कभी नक्सलियों का गढ़ माना जाता था, लेकिन अब स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है। चतरा के अलावा लातेहार और पलामू जिलों में फैला यह संसदीय क्षेत्र अपने-आप में अनोखा है। चतरा संसदीय सीट के नाम एक ऐसा रिकॉर्ड है, जिसे शायद कोई भी इलाका अपने नाम नहीं करना चाहेगा। यह रिकॉर्ड है कि चतरा से आज तक कोई स्थानीय व्यक्ति सांसद नहीं चुना गया। 1957 में यह संसदीय क्षेत्र अस्तित्व में आया, लेकिन तब से लेकर आज तक यहां से चुना गया कोई भी सांसद यहां का वोटर नहीं रहा। वैसे तो हर चुनाव में यह मुद्दा उठता रहा है, लेकिन इस बार हर तरफ यही शोर सुनाई दे रहा है। इसलिए राजनीतिक दलों के भीतर विचार मंथन का दौर चल रहा है। हालांकि चतरा के लोगों के लिए रोजगार, शिक्षा और भूमि विवाद की समस्याएं जैसे मुद्दे भी हैं, लेकिन अधिक जोर स्थानीय सांसद को लेकर ही है।

    चतरा की भौगोलिक स्थिति
    चतरा संसदीय क्षेत्र में पूरा चतरा जिला, लातेहार जिला और पलामू जिला का कुछ हिस्सा शामिल है। चतरा जिले के दोनों विधानसभा क्षेत्र चतरा और सिमरिया के अलावा लातेहार जिले के दोनों विधानसभा क्षेत्र लातेहार और मनिका के अलावा पलामू जिले का पांकी विधानसभा क्षेत्र इस संसदीय क्षेत्र में आता है। पूरा चतरा लोकसभा क्षेत्र खनिज संपदा से भरपूर है, लेकिन आज तक इस लोकसभा क्षेत्र में एक भी उद्योग स्थापित नहीं हो सका है। इसके कारण यहां के बेरोजगार या मजदूर रोजगार की तलाश में दूसरे राज्यों में पलायन करने को मजबूर हैं।
    चतरा के प्रमुख चुनावी मुद्दे
    सबसे खास बात यह है कि चतरा लोकसभा क्षेत्र ऐसा क्षेत्र है, जहां से आज तक कोई भी स्थानीय व्यक्ति सांसद नहीं बन सका है। यानी चतरा संसदीय क्षेत्र के सांसद हमेशा किसी दूसरे क्षेत्र के रहनेवाले लोग रहे हैं। यहां सांसद बनने के बाद उनका दर्शन दुर्लभ हो जाता है और प्रतिनिधियों पर क्षेत्र से गायब रहने का आरोप लगता है। इसलिए लोग इस बार इस दाग को मिटाने के लिए आतुर दिख रहे हैं। शिक्षा के मामले में भी यह इलाका पूरी तरह पिछड़ा हुआ है। इसके अलावा भूमि सर्वेक्षण में अनियमितता और भूमि विवाद इस पूरे इलाके के मुख्य मुद्दे हैं। लेकिन इन मुद्दों पर जन प्रतिनिधियों द्वारा कोई ठोस कदम नहीं उठाया जाता है। यह हकीकत है कि चतरा संसदीय क्षेत्र का पूरा क्षेत्र खनिज संपदा से परिपूर्ण है, लेकिन यहां के खनिज संसाधनों का केवल दोहन ही हुआ है। यदि जन प्रतिनिधि गंभीर होते, तो यह क्षेत्र आज सबसे समृद्ध क्षेत्रों में से एक होता।

    इस बार हैं कई दावेदार
    चतरा के वर्तमान सांसद सुनील सिंह भाजपा के बड़े नेता हैं। वह लगातार दो बार, यानी 2014 और 2019 में यहां से चुने जा चुके हैं। सुनील सिंह पिछला चुनाव साढ़े तीन लाख से ज्यादा वोट से जीते थे, लेकिन इस बार उनका खूंटा हिल रहा है। पिछले चुनाव में भी कई हिचकोले खाने के बाद वह अंतिम समय में टिकट हासिल कर पाये थे। स्थानीय स्तर पर कार्यकर्ता और नेता इनके खिलाफ मुखर हैं। भाजपा नेताओं का एक खेमा भी इनका खेल बिगाड़ने में लगा है। चर्चा है कि वर्तमान सांसद सुनील सिंह क्षेत्र में समय नहीं दे रहे हैं। चतरा संसदीय क्षेत्र के कई इलाके में सक्रिय नहीं हैं। इस बदली हुई परिस्थिति में चतरा से भाजपा के कई दावेदार हैं। कोई खुल कर तो नहीं बोलता, लेकिन सभी की नजर इस संसदीय सीट पर है। भापा के कुछ विधायक भी अंदरखाने जुगत भिड़ा रहे हैं, लेकिन वे खुल कर कुछ नहीं बोलते। झारखंड की राजनीति में लंबे समय से स्थापित नेता गिरिनाथ सिंह के नाम की भी चर्चा हो रही है। वहीं, प्रवीण सिंह इन दिनों चतरा का दौरा कर एक नया समीकरण बनाने की कोशिश में हैं। वहीं, चंदवा से जुड़े और भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता प्रतुल शाहदेव भी इलाके में सक्रिय हैं। पिछले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस से उम्मीदवार रहे मनोज यादव दूसरे स्थान पर थे। श्री यादव फिलहाल भाजपा के साथ हैं। भाजपा में टिकट के दावेदार श्री यादव को भी गंभीरता से लेते हैं। भाजपा के प्रशिक्षण प्रमुख मनोज सिंह और डॉ अभिषेक रामादीन भी मन बना रहे हैं। हाल के दिनों में नेत्र रोग विशेषज्ञ और इलाके में प्रमुख समाजसेवी के रूप में चर्चित डॉ अभिषेक रामदीन के कई पोस्टर भी इन दिनों चतरा में देखे जा रहे हैं, वहीं स्थानीय जनप्रतिनिधि और भाजपा नेता योगेंद्र प्रताप सिंह का नाम भी तेजी से उभर रहा है। उनकी राजनीतिक पृष्ठभूमि भी रही है। दूसरी ओर राजद की ओर से सत्यानंद भोक्ता सबसे मजबूत दावेदार माने जा रहे हैं।
    भोक्ता वर्तमान में चतरा विधानसभा से चुन कर आये हैं। भोक्ता अब एसटी वर्ग में शामिल हुए हैं। ऐसे में उनको नयी जमीन तलाशने की मजबूरी है। इधर चतरा संसदीय क्षेत्र के पांच विधानसभा क्षेत्र में से तीन पर यूपीए का कब्जा है। पिछले विधानसभा चुनाव में चतरा से राजद, मनिका से कांग्रेस और लातेहार से झामुमो जीत कर आया था। वहीं पांकी और सिमरिया भाजपा के पास है। ऐसे में इस बार एनडीए और यूपीए के बीच आनेवाले लोकसभा चुनाव में मुकाबला रोमांचकारी होगा। पिछली बार की तरह मुकाबला एकतरफा शायद न हो।
    1957 से अब तक बाहरी प्रत्याशी ही जीतते रहे
    वर्ष 1957 से अब तक चतरा संसदीय क्षेत्र का सांसद बनने का सौभाग्य चतरा के स्थानीय लोगों को नहीं मिला है। कोडरमा और हजारीबाग संसदीय क्षेत्र से विभाजित होकर चतरा संसदीय क्षेत्र का निर्माण हुआ। अभी तक चतरा संसदीय क्षेत्र से जितने भी सांसद निर्वाचित हुए हैं, सभी चतरा जिले के बाहर के मतदाता रहे हैं। चतरा संसदीय क्षेत्र से 1957 में पहली बार महारानी विजया राजे सांसद बनीं। उनका संबंध पदमा (रामगढ़) के राजघराने से था। वह मूलत: हजारीबाग संसदीय क्षेत्र की मतदाता थीं। वह लगातार तीन बार चतरा से सांसद बनीं। वर्ष 1971 के चुनाव में शंकरदयाल सिंह चतरा के सांसद निर्वाचित हुए। वे अविभाजित बिहार के औरंगाबाद जिले के थे। वर्ष 1977 में सुखदेव प्रसाद वर्मा सांसद चुने गये। श्री वर्मा बिहार के जहानाबाद के रहनेवाले थे। इसके बाद 1980 में गया निवासी रंजीत सिंह चतरा के सांसद बने। वर्ष 1984 में धनबाद के योगेश्वर प्रसाद योगेश चतरा से सांसद निर्वाचित हुए। लगातार दो बार 1989 और 1991 में चतरा के लिए निर्वाचित सांसद उपेंद्रनाथ वर्मा का संबंध गया के मानपुर से था। इनके बाद धीरेंद्र अग्रवाल को वर्ष 1996 और वर्ष 1998 में लगातार दो बार चतरा के लिए सांसद बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। वह भी गया के निवासी थे। चतरा संसदीय क्षेत्र से 1999 में संसद सदस्य बनने वाले नागमणि मूलत: जहानाबाद जिले के निवासी हैं। वर्ष 2004 में एक बार फिर धीरेंद्र अग्रवाल को यह सौभाग्य प्राप्त हुआ। वर्ष 2009 के संसदीय आम चुनाव में चतरा के मतदाताओं ने इतिहास रचते हुए झारखंड विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष इंदर सिंह नामधारी को मौका दिया। श्री नामधारी ने यह चुनाव निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में लड़ा था। भाजपा ने उनका समर्थन किया था। श्री नामधारी का संबंध पलामू के डालटनगंज से है। इसके बाद 2014 में बक्सर और रांची से ताल्लुक रखने वाले सुनील कुमार सिंह ने चतरा के मार्फत लोकसभा में प्रवेश किया। 2019 में भी वह सांसद चुने गये। इस प्रकार चतरा संसदीय क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करनेवाले सांसद चतरा के मतदाता नहीं रहे। बाहरी उम्मीदवारों का दबदबा रहा और चतरा के निवासी यह बर्दाश्त करते रहे। अब इंतजार है 2024 के संसदीय चुनाव का। देखना है चतरा के मतदाता इस बार क्या गुल खिलाते हैं।
    2019 लोकसभा चुनाव का परिणाम
    नाम पार्टी प्राप्त वोट
    सुनील सिंह भाजपा 528077
    मनोज यादव कांग्रेस 150206
    सुभाष यादव राजद 83425

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