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    Home»विशेष»तेजस्वी के सारथी बनने से सियासत गर्म
    विशेष

    तेजस्वी के सारथी बनने से सियासत गर्म

    shivam kumarBy shivam kumarAugust 19, 2025Updated:August 23, 2025No Comments8 Mins Read
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    विशेष
    पिछली बार भी राहुल की गाड़ी की स्टीयरिंग तेजस्वी के हाथ थी
    इसके पीछे राजद की सोची-समझी रणनीति और कांग्रेस की मजबूरी
    नमस्कार। आजाद सिपाही विशेष में आपका स्वागत है। मैं हूं राकेश सिंह।
    बिहार में आसन्न विधानसभा चुनाव को लेकर अब सियासत खुल कर सामने है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी द्वारा चुनाव आयोग पर लगाये गये आरोपों के बाद उन्होंने बिहार में ‘वोट अधिकार यात्रा’ शुरू की है। यह यात्रा बिहार में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआइआर) में कथित गड़बड़ियों के खिलाफ शुरू की गयी है, जो अगले 16 दिनों में 25 जिलों से होकर गुजरेगी। इस यात्रा के दौरान राहुल गांधी के साथ तेजस्वी यादव भी होंगे, जिसे लेकर कई तरह की चर्चा हो रही है। सबसे बड़ा सवाल यह किया जा रहा है कि आखिर तेजस्वी यादव बार-बार राहुल गांधी की सारथी की भूमिका में क्यों रहते हैं। इसके पीछे की क्या रणनीति है। पिछली बार जब राहुल गांधी ने ‘भारत जोड़ो न्याय यात्रा’ के क्रम में बिहार की यात्रा की थी, तब भी तेजस्वी ही उनके सारथी बने थे। इस बार भी यही स्थिति है। ऐसे में यह जानना दिलचस्प है कि आखिर तेजस्वी यादव ऐसा क्यों कर रहे हैं। बिहार में सबसे बड़ी पार्टी का नेता होने के बावजूद तेजस्वी नेतृत्व की भूमिका क्यों नहीं निभा रहे। इस सवाल का जवाब इतना आसान नहीं है, क्योंकि इसके पीछे कांग्रेस की मजबूरी और राजद की रणनीति है। वास्तव में तेजस्वी यादव अपने खिलाफ उठनेवाली हर उस आवाज को अभी से ही खत्म करने की रणनीति पर काम कर रहे हैं, जिसकी उन्हें आशंका है। दूसरी तरफ कांग्रेस को भी बिहार में अपना पैर जमाने के लिए एक मजबूत सहयोगी की जरूरत है, जो राजद पूरा कर रहा है। तो यह सब कुछ दोनों की जरूरतों के अनुरूप हो रहा है। तेजस्वी के राहुल के सारथी बनने के पीछे की क्या है सियासत और क्या हो सकता है इसका असर, बता रहे हैं आजाद सिपाही के विशेष संवाददाता राकेश सिंह।

    राहुल गांधी की ‘वोट अधिकार यात्रा’ का सोमवार दूसरा दिन था। सासाराम से 17 अगस्त को यात्रा शुरू हुई। राहुल की यात्रा ने बिहार की राजनीति में एक नया मोड़ ला दिया है। इस यात्रा के दौरान राष्ट्रीय जनता दल के नेता तेजस्वी यादव का राहुल गांधी की कार ड्राइव करते हुए नजर आना और पहले उनकी ‘भारत जोड़ो न्याय यात्रा’ के दौरान भी ऐसा ही दृश्य देखा जाना कई सवाल खड़े करता है। बिहार की सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद आरजेडी का कांग्रेस के प्रति यह रवैया क्या दर्शाता है? क्या यह केवल एक महागठबंधन की एकजुटता का प्रतीकात्मक इशारा है या फिर इसके पीछे गहरे राजनीतिक निहितार्थ हैं? खासकर आगामी 2025 बिहार विधानसभा चुनावों के लिए सीट बंटवारे को लेकर?

    वोट अधिकार यात्रा और आरजेडी
    कांग्रेस की ओर से जैसा बताया गया है कि राहुल गांधी की वोट अधिकार यात्रा, जो 16 दिनों में 1,300 किलोमीटर की दूरी तय करते हुए बिहार के लगभग 25 जिलों से गुजरेगी, का उद्देश्य लोकतंत्र और संविधान की रक्षा के लिए जनता को जागरूक करना है। इस यात्रा में तेजस्वी यादव की सक्रिय भागीदारी और उनका राहुल गांधी की कार ड्राइव करना एक मजबूत गठबंधन की छवि पेश करता है। यह दृश्य प्रतीकात्मक रूप से यह संदेश देता है कि आरजेडी और कांग्रेस एक साझा मिशन के लिए एकजुट हैं। तेजस्वी का यह कदम न केवल उनकी व्यक्तिगत नजदीकी को दर्शाता है, बल्कि यह भी संकेत देता है कि आरजेडी बिहार में अपनी मजबूत स्थिति के बावजूद कांग्रेस के साथ अपने गठबंधन को मजबूत करने के लिए अतिरिक्त प्रयास कर रहा है।
    लोकसभा चुनाव से पहले भारत जोड़ो न्याय यात्रा के दौरान तेजस्वी का राहुल की कार ड्राइव करना भी चर्चा में रहा था। यह बार-बार दोहराया गया प्रतीकात्मक कदम केवल व्यक्तिगत संबंधों तक सीमित नहीं हो सकता है, बल्कि यह बिहार की जटिल राजनीतिक गतिशीलता में इंडी अलायंस की रणनीति को भी दर्शाता है। बिहार में आरजेडी 2020 के विधानसभा चुनावों में 75 सीटें जीत कर सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी, जबकि कांग्रेस ने 70 सीटों पर चुनाव लड़कर केवल 19 सीटें जीती थीं। फिर भी तेजस्वी का यह व्यवहार यह सवाल उठता है कि क्या आरजेडी कांग्रेस के सामने नतमस्तक हो रही है या यह एक सोची-समझी रणनीति है?

    आरजेडी और कांग्रेस का गठबंधन
    आरजेडी और कांग्रेस का गठबंधन बिहार में दशकों पुराना है। तेजस्वी यादव ने स्वयं इसे बसे पुराना गठबंधन करार दिया है, जिसमें दोनों पार्टियां हर स्थिति में एक-दूसरे के साथ रही हैं। हालांकि यह गठबंधन हमेशा सहज नहीं रहा। 2024 के लोकसभा चुनावों में सीट-बंटवारे को लेकर दोनों दलों के बीच तनाव देखा गया था। आरजेडी ने 26 सीटों पर, कांग्रेस ने नौ सीटों पर और वाम दलों ने पांच सीटों पर चुनाव लड़ा था। इस दौरान, औरंगाबाद और पूर्णिया जैसी सीटों पर आरजेडी के एकतरफा फैसलों से कांग्रेस में नाराजगी थी। लोकसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद कांग्रेस और आरजेडी की तल्खी और बढ़ गयी थी। ममता बनर्जी ने जब राहुल गांधी की जगह इंडिया ब्लॉक का नेतृत्व खुद संभालने की बात कही, तो आरजेडी प्रमुख लालू प्रसाद यादव ने उनका समर्थन किया था। इतना ही नहीं, तेजस्वी यादव ने तो इसका अस्तित्व सिर्फ लोकसभा चुनाव तक ही बता दिया था।

    दोस्ती के पीछे सीट बंटवारा
    वर्ष 2025 के विधानसभा चुनावों के लिए भी सीट-बंटवारा एक बड़ा मुद्दा बना हुआ है। आरजेडी, जो 2020 में 144 सीटों पर लड़ी थी, इस बार भी कम से कम 135-140 सीटों पर लड़ने की इच्छुक है। वहीं कांग्रेस, जो पिछली बार 70 सीटों पर लड़ी थी, इस बार अपने पत्ते नहीं खोल रही है। कांग्रेस का तर्क है कि उसे पिछली बार कई ‘मृत सीटें’ (वैसी सीटें, जो न तो कांग्रेस और न ही आरजेडी ने दशकों में जीती थीं) दी गयी थीं। इसी कारण उसका प्रदर्शन कमजोर रहा। उदाहरण के लिए, पश्चिमी और पूर्वी चंपारण की नौ सीटों में से सात और पटना जिले की चार में से तीन सीटें एनडीए का गढ़ थीं। इतना ही नहीं, कांग्रेस ने अभी तक तेजस्वी को सीएम फेस घोषित करने की हरी झंडी भी नहीं दी है, जबकि 2020 के चुनाव में कांग्रेस ने तेजस्वी को सहर्ष सीएम फेस घोषित किया था।

    आरजेडी को है अड़ंगे का डर
    आरजेडी की स्थिति बिहार में मजबूत है, लेकिन वह यह भी जानता है कि कांग्रेस के बिना महागठबंधन की एकता कमजोर पड़ सकती है। हरियाणा और दिल्ली में आम आदमी पार्टी से अलग होकर कांग्रेस के लड़ने का नतीजा आरजेडी देख चुका है। वैसे तेजस्वी यादव ने बार-बार कहा है कि गठबंधन में कोई तनाव नहीं है और दोनों पार्टियां एक-दूसरे को समझती हैं। फिर भी कांग्रेस की ओर से ‘विनेबल’ सीटों की मांग और ‘मृत सीटों’ के मुद्दे ने आरजेडी पर दबाव बढ़ाया है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता तारिक अनवर ने साफ कहा है कि सीटें प्रभाव और जीतने की संभावना के आधार पर दी जानी चाहिए। वहीं, आरजेडी का तर्क है कि कठिन सीटों पर भी जीत संभव है, जैसा कि उसने 2024 में बक्सर लोकसभा सीट पर एनडीए के गढ़ को तोड़कर दिखाया।

    साथ छूटने का भय
    आरजेडी को इस बात का भी डर है कि यदि कांग्रेस को कम सीटें दी गयी या उसकी मांग पूरी नहीं हुई, तो वह गठबंधन से बाहर निकल सकती है या फिर स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ने की धमकी दे सकती है। निर्दलीय सांसद पप्पू यादव, जो हाल ही में कांग्रेस में शामिल हुए हैं, ने दावा किया है कि यदि कांग्रेस अकेले लड़े, तो वह 40 सीटें जीत सकती है। हालांकि यह दावा अतिशयोक्तिपूर्ण हो सकता है, लेकिन यह आरजेडी के लिए एक चेतावनी है। इसके अलावा महागठबंधन में अन्य छोटे दल, जैसे विकासशील इंसान पार्टी (वीआइपी) और वाम दल भी अधिक सीटों की मांग कर रहे हैं। वीआइपी के नेता मुकेश साहनी ने 60 सीटों और उपमुख्यमंत्री पद की मांग की है, जो गठबंधन की एकता को और जटिल बनाता है।

    कहीं आरजेडी की रणनीति तो नहीं
    तेजस्वी यादव का राहुल गांधी की कार ड्राइव करना और उनकी यात्रा में सक्रिय भागीदारी आरजेडी की रणनीति का हिस्सा हो सकता है। आरजेडी यह संदेश देना चाहता है कि वह गठबंधन के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध है और कांग्रेस को महत्व देता है। यह कदम विशेष रूप से तब महत्वपूर्ण हो जाता है, जब सीट-बंटवारे की बातचीत में तनाव की खबरें सामने आ रही हैं। आरजेडी जानता है कि बिहार में एनडीए के खिलाफ एक मजबूत विपक्षी गठबंधन के लिए कांग्रेस का साथ जरूरी है, खासकर उन क्षेत्रों में, जहां कांग्रेस का प्रभाव है, जैसे किशनगंज या कुछ शहरी सीटें। आरजेडी की रणनीति में सामाजिक समीकरण भी महत्वपूर्ण हैं। पार्टी अपने परंपरागत यादव और मुस्लिम वोट बैंक के साथ-साथ अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) और दलित समुदायों को भी जोड़ना चाहती है। कांग्रेस की उपस्थिति गठबंधन को एक व्यापक सामाजिक आधार देती है, जो आरजेडी के लिए फायदेमंद है। तेजस्वी का यह प्रतीकात्मक कदम यह भी दिखाता है कि वह व्यक्तिगत रूप से राहुल गांधी के साथ अपने संबंधों को मजबूत रखना चाहते हैं, जो भविष्य में राष्ट्रीय स्तर पर इंडिया की रणनीति के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है।

    सीट-बंटवारे की चुनौतियां
    2025 के विधानसभा चुनावों के लिए महागठबंधन में सीट बंटवारा एक जटिल प्रक्रिया है। आरजेडी की कोशिश है कि वह 2020 की तरह 140-144 सीटों पर लड़े, लेकिन कांग्रेस और अन्य सहयोगी दलों की मांगों ने इसे मुश्किल बना दिया है। वाम दल, विशेष रूप से भाकपा-माले, जो 2020 में 19 में से 12 सीटें जीतने में सफल रही थी, इस बार 40-45 सीटों की मांग कर रही है। इसके अलावा, नये सहयोगी जैसे पशुपति कुमार पारस की राष्ट्रीय लोक जनशक्ति पार्टी और झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) भी 5-12 सीटों की मांग कर रहे हैं।

     

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