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    Home»विशेष»पापा चले गांव, गोइठा पर लिट्टी बनवायी, पतलो की मड़ई में डाल ली चौकी
    विशेष

    पापा चले गांव, गोइठा पर लिट्टी बनवायी, पतलो की मड़ई में डाल ली चौकी

    shivam kumarBy shivam kumarAugust 29, 2025No Comments17 Mins Read
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    महादेव मंदिर का निर्माण करा बड़े खुश थे पापा, कहते यहीं रहूंगा
    चौथा कीमो कंप्लीट हुआ, तो पापा उत्साहित होकर बोले-बला टली
    जब पापा का चौथा कीमो कंप्लीट हुआ, पापा बहुत उत्साहित थे कि चलो बला टली। उसी दौरान उत्तरप्रदेश के प्रयागराज में कुंभ मेला का आयोजन जोरों पर था। लाखों लोग कुंभ में आस्था की डुबकी लगाने पहुंच रहे थे। पापा की भी इच्छा हुई कि वह भी इसका हिस्सा बनें और कुंभ मेला में आस्था की डुबकी लगा कर आयें। लेकिन पापा का इम्यून सिस्टम बहुत वीक हो चुका था। इनफेक्शन का खतरा था। भीड़ में आने-जाने की मनाही थी। तो तय हुआ कि पापा घर पर ही रहें। उसके बाद मैं निकल पड़ा कुंभ में डुबकी लगाने। वहां से मैंने त्रिवेणी संगम का जल ले लिया। घर पर लाया और पापा ने उससे स्नान किया। लेकिन पापा ने मुझसे कहा कि मुझे एक बार गांव घुमा दो। महाशिवरात्रि में मैं गांव जाना चाहता हूं। हर साल की तरह मंदिर में पूजा भी करनी है और भंडारा का भी आयोजन करवाना है। मैंने कहा ठीक है। चूंकि कीमो का सेशन तो कंप्लीट हो चुका था, लेकिन डॉक्टर ने कहा था कि पेम मेंटेनेंस सेशन चलेगा। इसमें इम्यूनोथेरपी चलती है। तय हुआ कि इम्यूनोथेरपी और पेटसिटी स्कैन कराने के बाद हम लोग गांव चलेंगे। हमलोग फिर मेदांता अस्पताल गये और पेट सिटी की तारीख पहले से ही बुक थी। पेट सिटी हुआ और उसके बाद, पापा का पांचवां सेशन इम्यूनोथेरपी के रूप में हुआ। इम्यूनोथेरपी कराने से पहले एक यूनिट फिर ब्लड चढ़ाया गया। इस बार डोनर की जरूरत नहीं पड़ी। डॉक्टर ने आॅर्डर दे दिया था। पापा की हीमोग्लोबिन घटने वाली प्रॉब्लम अभी भी सॉल्व नहीं हुई थी। मैंने पूछा कि डॉक्टर इम्यूनोथेरपी से तो ब्लड लॉस नहीं होगा न। डॉक्टर ने कहा कि इसमें ब्लड लॉस उतना नहीं होता। खैर पेट सिटी स्कैन की रिपोर्ट आयी, तो पता चला कि पापा का कैंसर अब दब चुका है, यानी साइज में गिरावट आ गयी थी। पापा की कंडीशन पहले से बेहतर थी। लेकिन रिपोर्ट में जो कुछ लिखा था, उसे मैं समझ रहा था। एक लाइन जो लिखी थी, उस पर मेरी नजर गयी कि कैंसर सेल भले घट गये थे, लेकिन उसकी प्रवृति में कोई सुधार नहीं था। लेकिन यह बात मैंने पापा को नहीं बतायी। अब क्या बोलता। बहुत दिनों के बाद पापा बहुत खुश थे कि अब कैंसर लगभग खत्म हो चुका है। पापा की खुशी देख मैं भी खुश था। मैं डॉक्टर से अकेले में मिला, तो पूछा पेम मेंटेनेंस कब तक तक चलेगा। डॉक्टर ने कहा कि अभी चलेगा। मैंने पूछा अब कीमो तो नहीं देना पड़ेगा न। उन्होंने कहा जरूरत पड़ी तो लाइट कीमो देंगे। खैर हम लोग रांची के लिए रवाना हो गये।

    पापा खेलगांव में मॉर्निंग वाक करने लगे
    रांची आने के बाद तय हुआ कि पापा को गांव लेकर चलना है। गांव जाने में अभी कुछ दिन शेष थे। पापा ने कहा था कि मेरा वॉक करने का कुछ प्रबंध करो। मैं खेलगांव में वॉक करना चाहता हूं। वहां नेचर भी है, भीड़-भाड़ नहीं रहती। वहां ठीक से वॉक कर पाउंगा। मैंने तुरंत वरिष्ठ पत्रकार सुशील सिंह मंटू भैया को फोन किया कि भैया पापा खेलगांव में वॉक करना चाहते हैं। आप वहां बोल देते। मंटू भैया ने देर न करते हुए तुरंत लाइनअप किया और पापा ने अपना वॉक का सिलसिला फिर से शुरू किया। शुरूआत आधे घंटे वॉक से की पापा ने। अब पापा रोज वॉक करने खेलगांव जाते, साथ में ड्राइवर और चाचा जी भी जाते। कभी-कभी मैं भी ज्वाइन कर लेता। कमजोरी तो थी पापा को। लेकिन पापा अब पहले से पॉजिटिव थे और कांफिडेंट भी। इन दिनों मैं भी अब अपने शो पर काम करने लगा। अखबार पर फोकस करने लगा। पापा आॅफिस में भी बैठते। कई लोग पापा से मिलने पहुंचते। एक दिन ‘प्रभात खबर’ के संपादक विजय पाठक अंकल भी आॅफिस आये। उन्होंने पापा से मुलाकात की। उनकी बेटी की शादी थी, सो कार्ड देने पहुंचे थे। विजय अंकल से पापा ने अपने डाइट और ट्रीटमेंट की बातें शेयर की। हां, पापा ने यह नहीं बताया कि वह कैंसर से लड़ रहे हैं। काफी देर तक पापा और विजय अंकल की बैठकी हुई। जब विजय अंकल गये, तो बोले बेटा शादी में जरूर जाना है। मैंने कहा हां पापा। लेकिन बीच-बीच में जब भी पापा को फीवर आता, उन्हें तोड़ देता। पापा शादी अटेंड नहीं कर सके। मेरा छोटा भाई राहुल शादी में गया। हां, रिसेप्शन रांची में हुआ था, तो हम दोनों भाई पहुंचे थे। लेकिन पापा फीवर के कारण नहीं पहुंच सके थे। विजय अंकल ने पूछा भी कि पापा कहां हैं। उनसे मैं क्या कहता कि पापा अभी किस दौर से गुजर रहे हैं। विजय अंकल मायूस तो हुए होंगे, लेकिन हम भी मजबूर थे। खैर पापा ने अपने मॉर्निंग वॉक का सिलसिला बंद नहीं किया। उन्होंने अब तय कर लिया था कि वह फिर से पुराने वाले रूटीन में आयेंगे। ऊपर से गांव जाने का उत्साह अलग।

    गांव की जमीन पर पैर रखते लंबी सांस ली
    महाशिवरात्रि नजदीक थी। अब गांव जाने की बारी थी। तय हुआ गाड़ी से ही चलेंगे। ट्रेन में भी इनफेक्शन का खतरा हो सकता है। चूंकि ट्रेन के टॉयलेट से भी इनफेक्शन होने का खतरा था। वैसे भी ट्रेन वाराणसी तक की थी और उसके बाद गाड़ी से चार घंटे का रास्ता तय करना पड़ता।
    हमने टाटा की सफारी गाड़ी की पिछली सीट को पूरा लेटा कर बेड नुमा शेप दे दिया। गद्दा और तकिया लगाया गया। पापा और मम्मी दोनों आराम से अब लेट या पैर फैला कर जा सकते थे। हमारा गांव उत्तरप्रदेश के गाजीपुर जिले में पड़ता है, नाम है पातेपुर। निकलने से पहले अब पापा अपने पुराने फॉर्म में। जल्दी करोगे। लेट क्यों कर रहे हो। जो तैयार नहीं है, उसे छोड़ दो। चलो। सभी तुरंत बैठे और गांव के लिए यात्रा शुरू हुई। हम सभी गांव के लिए सुबह करीब आठ बजे रवाना हुए। आठ घंटे की जर्नी भी थी। आराम से रुक-रुक कर गये। पापा आराम से सोते-सोते। खैर गांव पहुंचते-पहुंचते शाम हो गयी। छह या सात बज गये। गांव की जमीन पर पापा ने जैसे ही पैर रखा, मानों उनको सुकून मिल गया हो। उन्होंने लंबी सांस ली। गांव के आसपास लोग पहले से ही पापा का इंतजार कर रहे थे। दुआर पर गोइंठे का धुआं। लाल चाय और पापा की बैठकी। मानों थकान का कोई नामो-निशान नहीं था। भूख-प्यास सब साइड, ऊर्जा हाई। खैर पापा ने उस दिन देर से ही खाया। गांव के खाने में अलग स्वाद ही होता है।

    मैंने और पापा ने ताड़ी पी ली
    एक लम्हा का जिक्र करने का मेरा मन यहां कर रहा है। बात कैंसर डिटेक्ट होने से साल भर पहले की है। मैं और पापा गांव गये हुए थे। पापा ने कहा बेटा गैस हो रहा है। वहीं गांव के शरीफ भैया बैठे हुए थे, उन्होंने सुन लिया। बोले ताड़ी पीने से पेट साफ हो जायेगा। मैंने भी कहा पापा चलिए ताड़ी पीते हैं। कोलकाता में जब पापा नौकरी किया करते थे, तब जहां हम रहते, वहां ताड़ी का पेड़ हुआ करता था। ताड़ी वाला पेड़ से जब भी ताड़ी उतारने आया करता, हम कटोरी लेकर पहुंच जाते। चार-पांच साल उम्र रही होगी मेरी। ताजा-ताजा फेन वाली ताड़ी हमारी कटोरी में डाल दी जाती। मैं पी जाता। बहुत याद नहीं, लेकिन मेमोरी में है। खैर शरीफ भैया ने सुबह-सुबह वाली ताड़ी का प्रबंध किया। मैं और पापा ने एक-एक ग्लास पी ली। मैंने कहा पापा स्प्राइट जैसा लग रहा है। हमने दो-दो ग्लास पी। पापा बोले और चढ़ तो नहीं जायेगी न। मैंने कहा पापा घर पर ही हैं हमलोग जो होगा देखेंगे। वैसे मैंने शरीफ भैया से पहले पूछ लिया गया था कि नशा तो नहीं होगा न। शरीफ भैया ने कहा कि ताजा है नशा नहीं होता। मेरे और पापा की बांडिंग अलग थी। खैर ताड़ी का कोई नशा नहीं हुआ और पेट भी हो गया ठंडा।

    गांव में पापा घर-दुआर भूल कर मंदिर पर रहते और वहीं लिट्टी बनवाते, बैठकी लगती
    पापा ने पातेपुर गांव में बुढ़वा महादेव मंदिर का निर्माण करवाया था। आज वह मंदिर पूरे क्षेत्र में प्रसिद्ध है। शिवरात्रि में बस एक-दो दिन ही शेष रह गया था। इसी बीच मैंने तय किया कि पापा की आॅटो बायोग्राफी शूट की जाये। पापा का मूड भी अच्छा था। मुझे किसी कोने में महसूस हो रहा था कि यही समय है। मैंने देर नहीं किया। जब तक हम गांव में थे, मैंने पापा की पूरी जीवनी को कैमरे में कैद कर लिया। पापा बहुत देर तक बैठ नहीं पाते थे। लेकिन जब भी समय मिलता, हम शूट कर लेते। वैसे पापा की जीवनी कोई महाकाव्य से कम नहीं है। उनकी तो हर दिन एक कहानी ही है। लेकिन जितना मैं कर पाया, उतना कैप्चर कर लिया। चूंकि पापा बहुत दिनों से अपनी जीवनी लिखना चाहते थे। काम में व्यस्तता के कारण, यह मुमकिन नहीं हो पाया। ऊपर से बीमार हो गये। लेकिन मेरे मन के किसी कोने में आया कि पापा की बायोग्राफी शूट करनी जरूरी है। खैर गांव में पापा ने खूब एंजॉय किया। पापा ने वहां बुढ़वा महादेव मंदिर का निर्माण भी करवाया है। पापा वहीं मंदिर पर लिट्टी बनवाते और खाते। क्या घर, क्या दुआर। सब मंदिर पर। पापा ने वहां दो कमरा भी बनवाया था और दो बाथरूम भी। उनका कहना था कि अब तुम लोग अखबार संभालो, मैं ज्यादातर यहीं रहूंगा। मंदिर पर उनके कई पुराने-नये साथी जुटते। गांव की एक परंपरा है कि जब बैठकी लगती, तो नये-पुराने सब एक ही तराजू में हो लेते। पापा उनसे पूछते कोई समस्या नहीं है न। कोई कहता कि बेटी की शादी करानी है, उसकी चिंता रहती है। पापा बोलते पैसे-वैसे घटेंगे तो मांग लेना। फिर वह मेरी तरफ देखते बोलते बेटा देख लेना, इन्हें दिक्कत नहीं होनी चाहिए। मैं और छोटा भाई फिर देख लेते। पापा ने गांव में कई शादियां करवायी हैं। कइयों की मदद की। नौकरी से लेकर इलाज तक में पापा उनकी मदद करते। इसलिए पापा जब भी गांव जाते, उनसे लोग मदद मांगने पहुंच जाते। पापा अपनी क्षमता से बढ़कर उनकी मदद भी करते। मैं और भाई एक-दूसरे को देखते और मुस्कुराते।

    महाशिवरात्रि के दिन पापा सुबह-सुबह नहा कर हो गये तैयार
    महाशिवरात्रि का दिन, मंदिर पर महिलाओं की भीड़। गांव की लगभग सभी महिलाओं का जुटान। पुरुष भी काफी संख्या में आते। पापा ने हमें निर्देश दे रखा था कि जो भी पूजा के लिए आयेगा, उन्हें फल देना है। सुबह-सुबह फल बांटे जा रहे थे। थोड़ी भीड़ कम हुई तो करीब 10 बजे पापा और मम्मी पूजा के लिए मंदिर पहुंचे। करीब दो घंटे पापा और मम्मी ने पूजा की। पापा की एनर्जी हाइ थी। पूजा के बाद पापा मंदिर के बाहर बैठ गये और गांव के लोगों के साथ बातें करने लगे। मैं उन्हें मास्क देने के लिए गया, पापा बोले बेटा यहां भी मास्क। हटाओ न। मैं मुस्कुराता चला गया। मम्मी बोली पापा अब कुछ खायेंगे न। मैंने कहा प्रसाद खा लिये हैं और तुमको लगता है कि पापा यहां से हिलेंगे भी। फिर भी मैंने पूछा पापा खाना ले आऊं। पापा ने कहा नहीं मुन्ना के यहां मेरे लिए खाना बन रहा है। मैं वही खाऊंगा। मुन्ना प्रजापति पत्रकार सियाराम भैया के भाई हैं। उनके घर में पापा के लिए चावल-दाल, साग और हरी सब्जी की भुजिया बन रही थी। दही तो गांव में ऐसा जमता मानो मलाई। बिलकुल लाल छाली वाली। पापा ने बड़े चाव से खाया। मैंने भी वही खाया। पापा देर तक मंदिर के पास बैठे। पास में ही अपना बगीचा है। वहां मैंने पत्तों की मड़ई बनवायी थी। उसमें दो चौकी रखी थी। पापा वहीं लेट जाते, कोई उनके पैरों को दबाता, तो इधर-उधर की बातें करता। मैंने पापा के साथियों को कह दिया था कि तू लोग पापा के छुहिय जा, तो हाथ-वाथ धो के। अइसही मत छू लिय जा। अभी पापा के इनफेक्शन से बचायेके बा। फिर शाम को भंडारा का आयोजन हुआ। पूरा गांव भंडारा में उमड़ पड़ा। पापा ने गांव में बहुत अच्छा समय बिताया। अब बारी थी रांची जाने की। पापा का मन नहीं था। लेकिन इम्यूनोथेरपी की तारीख आने वाली थी और पापा की हीमोग्लोबिन की समस्या तो थी ही। सो हमें अब गांव से निकलना था। मन तो मेरा भी नहीं था गांव से निकलने का। खैर हम लोग अब रांची के लिए निकले। निलकते वक्त पापा ने गांव वालों से कहा था कि जल्दी आइम। लेकिन गांव वालों, पापा और मुझे क्या पता था कि पापा का गांव का यह आखिरी ट्रिप होगा।

    पापा की पीठ के एक प्वाइंट पर दर्द शुरू हुआ
    जब हम रांची आये, तो कुछ दिन के बाद पापा की पीठ के एक प्वाइंट पर दर्द शुरू हुआ। पापा ने कहा कि बेटा पीठ के ऊपरी हिस्से में स्पाइन के बगल में टस-टस कर रहा है। मैंने कहा हो सकता है पापा मसल पुल हुआ हो। चूंकि कीमो के बाद पापा का वजन काफी कम हो गया था और पापा की पीठ को मैं जब छूता तो संगठित मसल जैसा फील नहीं होता। मैंने और पापा ने डॉक्टर से वीडियो कांफ्रेंसिंग पर बात की। उन्होंने कहा कि मसल पुल हो सकता है, तो उन्होंने वोवरेन क्रीम लिखा। वह लगाने से पापा को आराम भी हुआ। लेकिन हर दो-तीन दिन में दर्द होता। इस दर्द से पापा को इरिटेशन होता। इम्यूनोथेरपी की तारीख भी आ गयी। दिल्ली निकलने से पहले मैंने इस बार दो दिन पहले ही सीबीसी करा ली। मुझे लग रहा था कि शायद पापा की हीमोग्लोबिन कुछ कम है। चूंकि पापा को अब देख कर मैं समझ जाता कि पापा के शरीर में कितना खून है। रिपोर्ट आयी तो पता चला कि हीमोग्लोबिन 7.5 है। आयरन भी कम था। मैंने डॉक्टर को मैसेज कर बताया। उन्होंने कहा कि एक यूनिट पीआरबीसी ट्रांस्फ्यूजन करा लेना चाहिए और आयरन भी। हमने डॉक्टर देबुका अंकल के यहां ब्लड और आयरन चढ़वाया। फिर हम दिल्ली के लिए रवाना हो गये। हम डॉक्टर के सामने बैठे। पापा ने बताया कि पीठ में रह-रह कर दर्द होता है। डॉक्टर ने उस प्वाइंट को टच किया। उन्होंने कहा कि सर मुझे तो कुछ वैसा नहीं लग रहा है। मसल पेन है। उन्होंने एक पेन किलर लिख दिया और वोवरेन क्रीम। उससे पापा को राहत भी मिली। इस बार डॉक्टर ने पापा को इम्यूनोथेरपी के साथ लाइट कीमो का इंजेक्शन और बोन मजबूत करने के लिए भी इंजेक्शन लिखा। पेम मेंटेनेंस में इसका जिक्र था। इसके बाद हम लोग रांची आ गये।

    पापा की कमजोरी बढ़ने लगी

    मां को जब मैंने बताया कि पापा को कैंसर है
    रांची आने के बाद पापा अपने काम में व्यस्त हो गये। लेकिन तीन-चार दिनों के बाद पापा की पीठ में दर्द और बढ़ गया। पेनकिलर अब पापा लगभग दो-तीन दिन बीच कर खाने लगे। इस बार बीच-बीच में पापा के फीवर आने की फ्रीक्वेंसी भी बढ़ गयी थी। पापा अब खड़े होते तो उनकी हफनी बढ़ जाती, फिर 30-40 सेकंड के बाद नॉर्मल होते तो चलते। पापा अब छत पर नहीं चढ़ पाते। पापा कहते इस बार ज्यादा ही वीकनेस है। मैं समझ गया था कि पापा को अब लाइट कीमो भी बर्दाश्त नहीं हो रहा। मैंने तय किया कि इस बार डॉक्टर को बोलूंगा, देना है तो सिर्फ इम्यूनोथेरपी दीजिये, अब कीमो बंद कीजिये। शरीर रहेगा तब न कोई इलाज होगा। शरीर में बचा क्या था पापा का। पतले से हो गये थे। वजन भी लगातार घट रहा था। वह तो भला हो कि हमने जो डाइट प्लान बनाया हुआ था, उससे पापा के वजन को हम मेंटेन कर पाते। पापा को नॉर्मल होने में करीब 10 दिन लग गये। इसी बीच एक यूनिट ब्लड भी चढ़ाया गया। पापा का हीमोग्लोबिन फिर से कम हो गया था। इस दौरान पापा ज्यादा बेड पर ही रहे। लेकिन 10 दिनों के बाद फिर से उन्होंने ऊर्जा भरी। अब मैंने फैसला लिया कि पापा को काम में फिर से व्यस्त करना होगा। सो अब सुबह-शाम की मीटिंग पापा के फ्लोर पर ही होती। मीटिंग के कारण पापा के दो घंटे निकल जाते। उस दौरान वह बीमारी के बारे में नहीं सोचते। बीच-बीच में मेरा तीन साल का बेटा रुद्रव उन्हें एंटरटेन करता। मैंने रांची में रहने वाले अपने रिश्तेदारों को कह दिया था कि सभी लोग आते रहें और पापा के पास बैठा करें। इस बीच मेरे मन में आया कि मम्मी को अब मेंटली रेडी करने की बारी आ चुकी है, क्योंकि मम्मी मुझसे कई बार सवाल पूछती कि पापा को कौन सा इनफेक्शन है। मैं हमेशा टाल देता। लेकिन एक दिन मैंने मम्मी को पास बिठा बोला कि मम्मी, पापा बिलकुल ठीक हैं। पापा को कैंसर हुआ था, लेकिन अब कैंसर ठीक हो गया है। मम्मी शॉक्ड हो गयीं। मां का चेहरा ब्लैंक हो गया। मैंने उन्हें तुरंत गले लगाया और उन्हें तुरंत नॉर्मल किया। मैंने कहा कि रिपोर्ट्स सब नॉर्मल है। तुम टेंशन मत लो और पापा के साथ मजबूती से खड़ी रहो। मां मेरी मेंटली बहुत मजबूत हैं। उन्हें समझ में आ गया था कि अभी मजबूती से खड़े रहना का वक्त है। वह मुझे देख खूब रोयीं। मुझे भी रोना आ गया। लेकिन मैंने कहा कि मां रो मत। सब ठीक हो जायेगा।

    आखिरी होली, मुरझाया सा चेहरा
    होली आयी। घर के मंदिर में चढ़ाने के लिए थोड़ा बहुत पुआ-पकवान बना। मेरी पत्नी जूही ने दही बड़ा बना दिया था। बस ज्यादा कुछ नहीं बना था। पापा को पुआ पसंद है। उस दिन उन्होंने एक टुकड़ा पुआ भी खाया। पापा शांत थे। पीठ का दर्द गया नहीं था। पेन किलर पर थे। शाम को परिवार वाले आये। पापा भी कुर्ता-पायजामा पहन कर हॉल में बैठ गये। सभी ने पापा के पैरों पर अबीर डाली। हम सबने मिलकर थोड़ी बहुत अबीर खेली। खाना-पीना हुआ। अब सभी पापा के साथ फोटो खिंचवाना चाह रहे थे। सब एक-एक कर पापा के साथ तस्वीर ले रहे थे। लेकिन पापा के मुख पर कोई भी एक्सप्रेशन नहीं था। उनके मन में बहुत कुछ चल रहा था। पापा उदास थे। होली आयी और चली भी गयी। फिर 21 दिनों वाला सिलसिला चालू रहा। एक दिन पहले हमने ब्लड टेस्ट करवाया। इस बार रिपोर्ट टाइम पर नहीं मिल पायी। जब हम गुरुग्राम पहुंचे, तब रिपोर्ट आयी। पापा की ब्लड रिपोर्ट देख मैं दंग रह गया था। पापा की हीमोग्लोबिन 6.1 थी। मैंने सोचा अभी कुछ दिन पहले ही ब्लड चढ़वाया था। सोचने वाली बात थी कि पापा इतने कम हीमोग्लोबिन में पैदल कैसे चल रहे हैं। क्या जीवटता है। मैं डर गया। सुबह होते ही हम मेदांता अस्पताल गये। डॉक्टर को रिपोर्ट दिखायी। उन्होंने कहा ब्लड चढ़ाना पड़ेगा। मैंने कहा आपने कीमो दे दिया था। पापा कीमो अब बर्दाश्त नहीं कर पायेंगे। आप सिर्फ इम्यूनोथेरपी दीजिये। कीमो बंद कीजिये। फिर डॉक्टर ने कहा कि इतने कम हीमोग्लोबिन में इम्यूनोथेरपी नहीं करेंगे। इस बार सिर्फ ब्लड चढ़ा लेते हैं। लेकिन पापा ने डॉक्टर को फिर से टोका कि मेरी पीठ का दर्द अभी तक ठीक नहीं हुआ है। डॉक्टर ने पापा के मसल को दबा कर फिर से देखा। डॉक्टर ने कहा कि सर खाना खूब खाइये। मुझे कैंसर से रिलेटेड समस्या नहीं दिख रही। कमजोरी से दर्द हो रहा है। पापा को ब्लड चढ़ाया गया। ब्लड चढ़ाने से पहले फिर से पापा का ब्लड टेस्ट हुआ। यह रिपोर्ट देख मैं हिल गया। पापा का हीमोग्लोबिन 5.5 हो गया था। खैर ब्लड चढ़ाने के बाद पापा को डिस्चार्ज किया गया। पापा को अच्छा लग रहा था। हमने डॉक्टर को कहा कि अब 10 दिनों के बाद का समय दीजिये। अभी बॉडी रेडी नहीं है। डॉक्टर ने कहा कि ठीक है। हम उस दिन मॉल भी गये। पापा के लिए शॉपिंग भी की। तीन-चार सेट पापा के लिए कपड़े लिये। मॉल में खाना भी खाया। फिर अगले दिन रांची के लिए निकल गये।

    आगे पढ़िये: पापा ने मुझसे रोते हुए कहा था कि इतना पैसा लग रहा है, क्या छोड़ कर जाऊंगा तुम लोगों के लिए। कैंसर ऐसा फैला की रेडिएशन की नौबत आ गयी।

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