Close Menu
Azad SipahiAzad Sipahi
    Facebook X (Twitter) YouTube WhatsApp
    Tuesday, June 23
    • Jharkhand Top News
    • Azad Sipahi Digital
    • रांची
    • हाई-टेक्नो
      • विज्ञान
      • गैजेट्स
      • मोबाइल
      • ऑटोमुविट
    • राज्य
      • झारखंड
      • बिहार
      • उत्तर प्रदेश
    • रोचक पोस्ट
    • स्पेशल रिपोर्ट
    • e-Paper
    • Top Story
    • DMCA
    Facebook X (Twitter) Instagram
    Azad SipahiAzad Sipahi
    • होम
    • झारखंड
      • कोडरमा
      • खलारी
      • खूंटी
      • गढ़वा
      • गिरिडीह
      • गुमला
      • गोड्डा
      • चतरा
      • चाईबासा
      • जमशेदपुर
      • जामताड़ा
      • दुमका
      • देवघर
      • धनबाद
      • पलामू
      • पाकुर
      • बोकारो
      • रांची
      • रामगढ़
      • लातेहार
      • लोहरदगा
      • सरायकेला-खरसावाँ
      • साहिबगंज
      • सिमडेगा
      • हजारीबाग
    • विशेष
    • बिहार
    • उत्तर प्रदेश
    • देश
    • दुनिया
    • राजनीति
    • राज्य
      • मध्य प्रदेश
    • स्पोर्ट्स
      • हॉकी
      • क्रिकेट
      • टेनिस
      • फुटबॉल
      • अन्य खेल
    • YouTube
    • ई-पेपर
    Azad SipahiAzad Sipahi
    Home»विशेष»शिबू सोरेन: झारखंड की आत्मा और अनवरत संघर्ष का महाकाव्य
    विशेष

    शिबू सोरेन: झारखंड की आत्मा और अनवरत संघर्ष का महाकाव्य

    shivam kumarBy shivam kumarJune 23, 2026No Comments18 Mins Read
    Facebook Twitter WhatsApp Telegram Pinterest LinkedIn Tumblr Email
    Share
    Facebook Twitter WhatsApp Telegram LinkedIn Pinterest Email

    विशेष
    महाजनी प्रथा के खिलाफ विद्रोह से लेकर अलग राज्य के निर्माण तक का सफर
    शांत सियासत का शलाका पुरुष: झारखंड की सबसे बुलंद आवाज थे शिबू सोरेन
    शोषितों के मसीहा, आदिवासियों की आवाज और झारखंड आंदोलन के महानायक की कहानी

    नमस्कार। आजाद सिपाही विशेष में आपका स्वागत है। मैं हूं राकेश सिंह।
    शिबू सोरेन महज एक नाम नहीं, बल्कि झारखंड के उन जंगलों, पहाड़ों और पगडंडियों से उठने वाली वह ताकतवर आवाज हैं, जिसने सदियों से दबे-कुचले, शोषित और वंचित समाज को उसकी खोयी हुई पहचान लौटायी। शिबू सोरेन का जीवन किसी महाकाव्य से कम नहीं है, जहां एक व्यक्तिगत त्रासदी ने उस चिंगारी को जन्म दिया, जो आगे चलकर लाखों लोगों की आशा, उनके स्वाभिमान और उनके सपनों के साकार होने का प्रतीक बन गयी। आजाद भारत के इतिहास में शिबू सोरेन संभवत: एकमात्र ऐसी शख्सियत हैं, जिन्होंने पूरे चार दशकों तक अलग झारखंड राज्य के आंदोलन का अविचल नेतृत्व किया। महाजनी और सूदखोरी की बेड़ियों में जकड़े आदिवासियों को सिर्फ आजाद ही नहीं कराया, बल्कि उन्हें शिक्षा, स्वास्थ्य और अधिकारों के प्रति जागरूक कर एक सूत्र में पिरोया। उनका सम्मान किसी एक राजनेता का सम्मान नहीं, बल्कि भारत की उस जनजातीय आत्मा का सम्मान है, जो हमेशा उपेक्षा का दंश झेलती रही। आज के आक्रामक राजनीतिक दौर में गुरुजी अकेले ऐसे जन नेता रहे हैं, जिनकी शांत, संयत और शालीन कार्यशैली ने उन्हें सत्ता के प्रपंचों से हमेशा दूर रखा। अपने राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ भी कभी एक कड़वा शब्द न बोलने वाले इस युगपुरुष ने आजीवन निस्पृह भाव से अपनी माटी की सेवा की। रांची स्थित अपने आवास पर एक निश्छल और आत्मीय मुस्कान के साथ बैठे गुरुजी का अक्स आज भी झारखंड के कण-कण में जिंदा है। इस विशेष आलेख में पढ़िए, उस महान जन नेता की गाथा, जिसे झारखंड का हर व्यक्ति सिर्फ इसलिए पूजता था और है क्योंकि उसे यकीन था कि ‘गुरुजी हैं, तो हर दुख-दर्द का अंत है।’ आज गुरुजी हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके पुत्र हेमंत सोरेन उसी सादगी के साथ उनकी विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं। प्रस्तुत है आजाद सिपाही के संपादक राकेश सिंह की कलम से झारखंड के माटी के लाल और युगपुरुष ‘गुरुजी’ के जीवन पर एक विशेष आलेख।

    पद्म भूषण सम्मान
    झारखंड राज्य के गठन में अग्रणी भूमिका निभानेवाले दिशोम गुरु शिबू सोरेन को आज 23 जून को मरणोपरांत पद्म भूषण सम्मान मिलेगा।
    यह देश का तीसरा सर्वोच्च नागरिक सम्मान है। यह सम्मान प्राप्त करना न केवल दिशोम गुरु के परिवार और झारखंड मुक्ति मोर्चा बल्कि पूरे झारखंड के लिए गौरव का क्षण होगा। दिशोम गुरु को यह मरणोपरांत सम्मान लोक कल्याण और आदिवासी समाज के सशक्तीकरण के लिए उनके आजीवन संघर्ष और योगदान को देखते हुए प्रदान किया जायेगा। इसी वर्ष गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर केंद्र सरकार ने उन्हें यह सम्मान देने की घोषणा की थी। हालांकि उन्हें भारत रत्न सम्मान देने की मांग उठ रही थी।

    शुरूआती जीवन त्रासदी और गहरे सामाजिक-आर्थिक संघर्षों से भरा रहा
    शिवलाल से शिबू: एक संघर्ष की दास्तान
    रांची से लगभग 70 किलोमीटर दूर, रामगढ़ जिले के गोला इलाके से एक पतली-सी सड़क पहाड़ों के सीने पर नागिन की तरह बल खाती हुई आगे बढ़ती है। यह सड़क जहां जाकर ठहरती है, उसी जगह बसा है नेमरा गांव। पास ही एक छोटा-सा रेलवे स्टेशन है, जिसका नाम बरलंगा है।
    विशालकाय चंदू पहाड़ की छांव में बसे इस गांव की प्राकृतिक सुंदरता तो अद्भुत थी, लेकिन उस दौर में इसके चारों ओर महाजनों और सूदखोरों की अजगर जैसी पकड़ कसती जा रही थी। ये वो लोग थे, जो सीधे-सादे आदिवासियों को अपने कर्ज के जाल में फंसाकर उनका शोषण करते थे।
    इसी नेमरा गांव में एक संथाल आदिवासी दंपति रहते थे। सोबरन मांझी और सोनामुनी मांझी। सोबरन पेशे से एक शिक्षक थे और विचारों से पक्के गांधीवादी। इसी परिवार के आंगन में 11 जनवरी, 1944 को एक बच्चे की किलकारी गुंजी। माता-पिता ने बड़े प्यार से उसका नाम रखा शिवलाल। यही शिवलाल आगे चलकर ‘शिबू सोरेन’ के नाम से जाने गये।

    शिवलाल के ‘शिबू सोरेन’ बनने की संघर्षपूर्ण यात्रा का जन्म
    शिवलाल का बचपन इन्हीं पहाड़ों और पगडंडियों के बीच बीता। उनकी शुरूआती पढ़ाई नेमरा के सरकारी स्कूल और फिर गोला हाइस्कूल में हुई। उस वक्त अविभाजित बिहार के आदिवासी इलाकों में महाजनों का गहरा आतंक था। गरीब आदिवासी पीढ़ियों तक सूदखोरी के चक्रव्यूह से बाहर नहीं निकल पाते थे। शिवलाल के पिता, सोबरन मांझी, इस अन्याय को बर्दाश्त नहीं कर सके। एक शिक्षक होने के नाते उन्होंने समाज को जगाने का बीड़ा उठाया और सूदखोरी तथा शराबखोरी जैसी कुप्रथाओं के खिलाफ खुलकर बगावत कर दी। लेकिन, सच्चाई की यह बुलंद आवाज शोषक महाजनों को चुभने लगी थी। समय अपनी चाल चल रहा था और शिवलाल अभी महज 13 साल के ही थे, जब एक खौफनाक दिन ने उनकी पूरी दुनिया बदल दी। तारीख थी 27 नवंबर, 1957। सोबरन मांझी गोला प्रखंड मुख्यालय से लगभग 16 किलोमीटर दूर लुकैयाटांड़ के घने जंगलों से गुजर रहे थे। उसी सुनसान जंगल में साहूकारों के भेजे गये हत्यारों ने उन्हें घेर लिया और उनकी निर्मम हत्या कर दी। एक झटके में 13 साल के शिवलाल के सिर से पिता का साया उठ गया। इस घटना ने उस किशोर के मन पर बहुत गहरा आघात किया। पिता की शहादत और परिवार के सामने खड़े गहरे सामाजिक-आर्थिक संकट ने उस 13 साल के लड़के को वक्त से पहले बड़ा कर दिया। इसी भयंकर त्रासदी और महाजनों के प्रति उपजे आक्रोश ने शिवलाल के भीतर वह आग पैदा की, जिसने आगे चलकर उन्हें शोषितों की आवाज और अन्याय के खिलाफ लड़ने वाला उनका रहनुमा बनाया। और यहीं से एक आम लड़के शिवलाल के ‘शिबू सोरेन’ बनने की संघर्षपूर्ण यात्रा का जन्म हुआ।

    शिबू सोरेन के जीवन में कहानियां ही कहानियां थीं। किसी की समझ में नहीं आता था कि वह कहां से शुरू करे और कहां खत्म करे। उनके जीवन का हर दिन नयी कहानी लिखता था। जिस तरह से चट्टानें हजारों साल का इतिहास अपने सीने में संजोये रखती हैं, उसी तरह दिशोम गुरु का जीवन किस्सों-कहानियों और असंख्य दुखों से रंगा हुआ था। वह संघर्ष और आंदोलन की जीती-जागती मिसाल थे।
    चादर में बच्चे को
    पीठ पर लटकाये
    धान रोपती पहाड़ी स्त्री
    रोप रही है अपना पहाड़ सा दुख
    सुख की एक लहलहाती फसल के लिए
    प्रसिद्ध कवियित्री निर्मला पुतुल की ये पंक्तियां झारखंड की चर्चा होते ही जेहन को ऐसे कुतरने लगती हैं, जैसे भूख से व्याकुल चुहिया किसी सड़ते चमरौधे जूते को कुतरने लगती है। कविता की बांह पकड़े सैकड़ों संघर्ष याद आने लगते हैं, जो अपनी माटी, पहाड़, पेड़, पानी और जिंदगी की हिफाजत में लड़े गये। हजारों कविताएं बादल बन कर आकाश को ढंक लेती हैं। याद आने लगते हैं सिदो-कान्हू, तिलका मांझी, बिरसा और तानाजी भगत और याद आने लगती हैं सिनगी दई। अपनी धरती की हिफाजत के लिए आदिवासियों की अनगिनत शहादतों से मस्तिष्क में उजास फैलने लगता है।

    13 साल की उम्र में खत्म हुआ बचपन: एक योद्धा का उदय
    पिता का साया सिर से उठते ही 13 साल के शिवलाल का बचपन जैसे अचानक कहीं खो गया। जिस उम्र में बच्चों के हाथों में किताबें और खेलने के लिए बेफिक्री होती है, उस उम्र में इस किशोर के कंधों पर पूरे परिवार की जिम्मेदारी का बोझ आ गिरा। पिता की निर्मम हत्या और घर की गहराती आर्थिक तंगी ने उन्हें स्कूल की दहलीज से दूर कर दिया। हालात ऐसे बने कि वह दसवीं कक्षा से आगे की पढ़ाई नहीं कर पाये। लेकिन, उस 13 साल के लड़के ने अपने हालातों के आगे घुटने नहीं टेके। उसने आंसुओं को अपनी ताकत बनाया और एक कड़ा प्रण लिया। अपने पिता के अधूरे काम को पूरा करने का और गरीबों की आवाज बनने का। परिवार की जीविका चलाने के लिए उस लड़के ने जिंदगी के सबसे कड़े इम्तिहान दिये। उसने खेतों में पसीना बहाकर किसानी की और जब उससे भी गुजारा नहीं हुआ, तो रेलवे लाइन निर्माण परियोजना में एक दिहाड़ी मजदूर के रूप में हाड़-तोड़ मेहनत की। लेकिन मजदूर की उस कुदाल और फावड़े की चोट में महाजनों के खिलाफ एक गहरा विद्रोह पल रहा था। जैसे-जैसे शिवलाल बड़े हो रहे थे, उनकी सोच भी आकार ले रही थी। उन्होंने धीरे-धीरे गोला और उसके आस-पास के इलाकों में महाजनों के शोषण के खिलाफ युवाओं को जगाना और उन्हें एकजुट करना शुरू कर दिया। समय बीता और महज 18 वर्ष की आयु में, साल 1962 में, उस युवा ने एक ऐतिहासिक कदम उठाया। उन्होंने ‘संथाल नवयुवक संघ’ की स्थापना की। इसका एकमात्र उद्देश्य आदिवासी युवाओं की रगों में सामाजिक परिवर्तन की आग भरना और उन्हें एक मंच पर लाना था। यह तो बस एक शुरूआत थी। इस संघर्ष को और धार देने के लिए उन्होंने आगे चलकर ‘सोनोत संथाल समाज’ (शुद्ध संथाल समाज) की नींव रखी। इस संगठन के माध्यम से उन्होंने बिखरे हुए आदिवासियों को एक धागे में पिरोया और उनके अधिकारों की रक्षा के लिए एक अचूक रणनीति तैयार की। ये शुरूआती कदम महज किसी युवा का जोश नहीं थे, बल्कि यह उनके जीवन की उस दिशा का स्पष्ट संकेत थे, जिसे उन्होंने हमेशा के लिए चुन लिया था। उनका लक्ष्य अब पूरी तरह से साफ था। सदियों से चले आ रहे आदिवासियों के शोषण को जड़ से उखाड़ फेंकना और एक ऐसी मजबूत सामाजिक चेतना का निर्माण करना, जिसे कोई सूदखोर या सत्ता कभी तोड़ न सके।

    आदिवासियों को आर्थिक और सामाजिक गुलामी से बाहर निकालने का प्रयास
    महाजनी प्रथा को खत्म करने के लिए शिबू सोरेन ने धनकटनी आंदोलन चलाया। उन्होंने आदिवासियों को जागरूक किया कि धान लगाने वाला ही धान काटेगा और इस पर महाजनों का कोई अधिकार नहीं। शिबू सोरेन का सबसे महत्वपूर्ण योगदान आदिवासियों के जल, जंगल, जमीन पर उनके अधिकारों की लड़ाई थी। 1960 और 1970 के दशक में झारखंड में महाजनी और सूदखोरी प्रथा अपने चरम पर थी, जिससे आदिवासियों की जमीन धोखे से हड़पी जा रही थी। यह आंदोलन एक अद्वितीय रणनीति पर आधारित था, जिसमें महिलाएं हसिया लेकर जमींदारों के खेतों से फसलें काटती थीं, जबकि पुरुष तीर-कमान के साथ उनकी सुरक्षा करते थे। यह सिर्फ एक विरोध प्रदर्शन नहीं था, बल्कि आदिवासी पहचान, आत्म-सम्मान और भूमि पर उनके अधिकार की पुनर्स्थापना थी। इस आंदोलन ने आदिवासियों को शोषण के खिलाफ लड़ने का साहस दिया और उनकी सामूहिक शक्ति का प्रदर्शन किया। यह संघर्ष विनोबा भावे के भूदान आंदोलन और जयप्रकाश नारायण के संपूर्ण क्रांति आंदोलन जैसे अन्य भारत रत्न प्राप्तकर्ताओं के सामाजिक सुधार आंदोलनों के समान है। यह शिबू सोरेन के संघर्ष को एक व्यापक राष्ट्रीय संदर्भ प्रदान करता है, जहां उनका योगदान केवल क्षेत्रीय राजनीति तक सीमित नहीं था, बल्कि स्वतंत्रता के बाद भारत में सामाजिक न्याय की सबसे मजबूत लड़ाइयों में से एक था। उन्होंने आदिवासियों को आर्थिक और सामाजिक गुलामी से बाहर निकालने का प्रयास किया और एक ऐसी ग्रामीण-आधारित अर्थव्यवस्था का मॉडल समझाया जो लोगों को आत्मनिर्भर बना सके।

    नशा बंद
    शिबू सोरेन ने 1969-70 में नशाबंदी, साहूकारी और जमीन बेदखली के खिलाफ जनांदोलन शुरू किया, जिसने उन्हें आदिवासी समाज का नायक बना दिया। 70 से 80 के दशक में धनकटनी आंदोलन बहुत बड़ा हो गया। उन्होंने झारखंड के किसानों, कामगारों और काश्तकारों को एकजुट किया और आदिवासियों को शोषण से मुक्त करवाने में अहम भूमिका निभायी। यही वजह है कि शिबू सोरेन को झारखंड के लोगों ने दिशोम गुरु की उपाधि दी। दिशोम का मतलब देश को दिशा देने वाला होता है और यहां देश का मतलब आदिवासी क्षेत्र से है।

    रात्रि पाठशाला की शुरूआत
    1970 से 1975 के बीच शिबू सोरेन रात्रि पाठशाला चलाते थे, ताकि दिन भर अपना काम निपटाने के बाद आदिवासी लोग पढ़ पायें। शिबू सोरेन का मानना था कि शादी और त्योहारों पर खर्च कम करना चाहिए और पैसा बचाकर उसे शिक्षा पर लगाना चाहिए। उन्होंने आदिवासियों के उत्थान के लिए सामूहिक खेती, पशुपालन, रात्रि पाठशाला पर जोर दिया। शिबू सोरेन को पता था कि उनका समाज शिक्षा की रौशनी से ही आगे बढ़ सकता है। उनका समाज पढ़ेगा, तभी अन्याय के खिलाफ लड़ेगा। उन्होंने गरीब छात्रों को लालटेन तक बांटे, ताकि वे रात में पढ़ सकें। जीवन का बड़ा हिस्सा उन्होंने जंगलों, पहाड़ों और गांवों में लोगों को एकजुट करने में बिताया। आदिवासी समाज में व्याप्त बुराइयों को दूर करने के लिए सामाजिक आंदोलन को धार दी।

    पोखरिया आश्रम की खामोशी आज भी बुलाती है
    पहाड़ पर गुमसुम बैठे
    पहाड़ी आदमी के चेहरे पर दिख रहा है
    पहाड़ का भूगोल
    उसके भीतर चुप्पी साधे बैठा है
    पहाड़ का इतिहास
    अगर कभी आपका चंदू या कभी टुंडी जाना हुआ, तो निर्मला पुतुल की ये पंक्तियां जरूर आपके साथ हो लेंगी। आप जब टुंडी जायेंगे, तो हो सकता है कि राजमहल की पहाड़ियों पर बैठा आदिवासी आपको इस कविता का नायक लगने लगे, क्योंकि यही वह जमीन है, जहां से झारखंड मुक्ति मोर्चा की शुरूआत हुई और शिबू सोरेन जन नायक के रूप में उभरे। इतना ही नहीं, इसी मिट्टी ने उन्हें दिशोम गुरु बनाया। 1972 के पहले यह पूरा क्षेत्र महाजनों के चंगुल में कराह रहा था। आदिवासियों और खेतिहर कुर्मियों-कोयरियों की हालत खराब थी। भूख और रोग की फसल पूरे क्षेत्र में लहलहा रही थी। इन परिस्थितियों के बीच झारखंड मुक्ति मोर्चा का गठन हुआ था। दिशोम गुरु पार्टी के महासचिव बनाये गये थे।

    झारखंड मुक्ति मोर्चा की स्थापना
    गोला, पेटरवार, जैनामोड़, बोकारो में आंदोलन को मजबूत करने के बाद विनोद बिहारी महतो से मुलाकात हुई। फिर धनबाद गये। वहां कुछ दिनों तक विनोद बाबू के घर पर ही रहे थे। साल 1973 में सोरेन ने गोल्फ ग्राउंड, धनबाद में एक जनसभा के दौरान बंगाली मार्क्सवादी ट्रेड यूनियनिस्ट एके रॉय और कुर्मी-महतो नेता बिनोद बिहारी महतो के साथ मिलकर झारखंड मुक्ति मोर्चा की स्थापना की। यह संगठन आदिवासियों की लड़ाई का प्रतीक बना। संघर्ष करते हुए बात भारत में एक नये राज्य की मांग तक पहुंच गयी। राह आसान नहीं थी। अविभाजित बिहार में दक्षिण के क्षेत्र में 26 जिलों को मिलाकर एक सांस्कृतिक इकाई के रूप में शिबू सोरेन ने झारखंड राज्य की कल्पना की थी। 80 के दशक में शिबू सोरेन की रैलियों में जनसैलाब उमड़ता था। उन्हें सुनने के लिए लोग 50-60 किलोमीटर दूर पैदल चल कर आते थे।

    मृत पिता की सौगंध खाकर कहता हूं कि शोषणमुक्त झारखंड के लिए अनवरत संघर्ष करता रहूंगा
    झामुमो की स्थापना के मौके पर अपने संबोधन में गुरुजी ने कहा था, मुझे झारखंड मुक्ति मोर्चा का महासचिव बनाया गया है। पता नहीं मैं इस योग्य हूं भी या नहीं। लेकिन मैं अपने मृत पिता की सौगंध खाकर कहता हूं कि शोषणमुक्त झारखंड के लिए अनवरत संघर्ष करता रहूंगा। हम लोग दुनिया के सताये हुए लोग हैं। अपने अस्तित्व के लिए हमें लगातार संघर्ष करते रहना पड़ा है। हमें बार-बार अपने घरों से, जंगल से और जमीन से उजाड़ा जाता है। हमारे साथ जानवरों जैसा बर्ताव किया जाता है। हमारी बहू-बेटियों की इज्जत से खिलवाड़ किया जाता है। दिकुओं के शोषण, उत्पीड़न से परेशान होकर हमारे लोगों को घर-बार छोड़कर परदेस में मजूरी करने जाना पड़ता है। हरियाणा-पंजाब के ईंट के भट्ठों में, असम के चाय के बागानों में, पश्चिम बंगाल के खलिहानों में मांझी, संथाली औरतें, मरद मजूरी करने जाते हैं। वहां भी उनके साथ बंधुआ मजदूरों जैसा व्यवहार किया जाता है। यह बात नहीं कि हमारे घर, गांव में जीवन यापन करने के साधन नहीं, लेकिन उन पर बाहर वालों का कब्जा है। झारखंड की धरती का, यहां की खदानों का दोहन कर, उनकी लूट-खसोट कर नये शहर बन रहे हैं। जगमग आवासीय कॉलोनियां बन रही हैं और हम सब गरीबी-भुखमरी के अंधकार में धंसे हुए हैं। लेकिन अब यह सब नहीं चलेगा। हम इस अंधेरगर्दी के खिलाफ संघर्ष करेंगे।

    पहली बार संसद में गूंजी आदिवासियों की आवाज
    शिबू सोरेन जब जेएमएम के पहले सांसद बने, तो आदिवासियों की आवाज संसद तक सुनाई देने लगी। पहली बार सांसद बनने के बाद जब उन्होंने संसद में भाषण दिया, तो वह शराब के खिलाफ बोले। शिबू सोरेन का मानना था कि आदिवासियों का विकास तब तक नहीं होगा, जब तक वे इससे दूर नहीं होंगे।

    शिबू सोरेन को सुनाने के लिए लोग दो-तीन बजे रात तक इकट्ठा रहते
    1980 के जून महीने में हुए बिहार विधानसभा के चुनाव में खास कर संथाल परगना की 18 सीटों में से आठ सीटों पर झामुमो ने जीत का परचम लहराया था। इस जीत ने क्षेत्र की जनता के करीब चार दशक से शिथिल पड़े झारखंड अलग राज्य की मांग पर मुहर लगा दी। इसी समय झारखंड के गांधी कहे जाने वाले शिबू सोरेन के नेतृत्व में अलग झारखंड राज्य के आंदोलन ने जोर पकड़ लिया। कंपकंपाती ठंडी रात में भी भारी तादाद में इस क्षेत्र के लोग शिबू सोरेन की एक झलक पाने और उनके भाषण को सुनने के लिए रात भर सभा स्थल पर जमे रहते थे। देश में शायद ही ऐसा कोई नेता हो, जिनके भाषण को सुनने के लिए लोग दो-तीन बजे रात तक इकट्ठा रहते हों। उनकी राजनीति में प्रविष्टि किसी पारंपरिक राजनीतिक महत्वाकांक्षा से प्रेरित नहीं थीं, बल्कि एक व्यक्तिगत अन्याय के खिलाफ उपजे आक्रोश और अपने समुदाय के लिए न्याय की गहन प्रतिबद्धता का परिणाम थी। यह कारक उन्हें उन नेताओं की श्रेणी में रखता, जिनका उदय व्यक्तिगत बलिदान और सार्वजनिक सेवा के एक गहरे नैतिक भाव से हुआ था। इस प्रकार उनका संघर्ष केवल सत्ता प्राप्ति का नहीं था, बल्कि अपने समाज के उत्थान और उसके लिए सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने का था।

    भूमिगत भी रहे
    1970 के दशक में शिबू सोरेन ने कई रातें गिरिडीह, पारसनाथ और धनबाद के जंगल और पहाड़ों में गुजारी। यह वह दौर था, जब एक ओर आंदोलन से परेशान महाजन और शराब कारोबारी, शिबू सोरेन के खिलाफ किसी भी हद को पार कर सकते थे। वहीं विभिन्न आंदोलनों के कारण भी पुलिस उनकी तलाश में रहती। जंगल और पहाड़ों में समय गुजराने वाले शिबू सोरेन हर रात तीन बार जगह बदलते थे। वे इतने घने और गुप्त स्थानों पर रहते थे, जहां उस वक्त पुलिस को भी जाने में भी डर लगता था। पुलिस से बचने के लिए शिबू सोरेन ने पारसनाथ की पहाड़ियों के बीच पलमा गांव को अपना केंद्र बनाया। फिर टुंडी के पास पोखरिया में आश्रम बनाया। उन्होंने टुंडी के आसपास महाजनों के कब्जे से संतालों की जमीन को मुक्त कराया। सामाजिक और आर्थिक सुधार के साथ-साथ, शिबू सोरेन ने आदिवासियों के बीच त्वरित न्याय की अदालतें स्थापित कीं। ये अदालतें शोषित आदिवासियों को जमींदारों और सूदखोरों के खिलाफ त्वरित न्याय प्रदान करती थीं, जो उस समय की कानूनी प्रक्रिया में संभव नहीं था। टुंडी और उसके आसपास शिबू सोरेन की समानांतर सरकार चलती। उनकी अपनी न्याय व्यवस्था थी, कोर्ट लगाते थे और फैसला भी सुनाया जाता।

    आपातकाल में जेल
    1975 में आपातकाल के दौरान शिबू सोरेन को समर्पण के लिए तैयार किया गया। उन्हें धनबाद जेल में रखा गया था। झगड़ू पंडित उनके साथ थे। वह डीसी-एसपी से बहस कर जबरन जेल गये थे, पुलिस उन्हें जेल ले जाने को तैयार नहीं थी। पिपरासोल निवासी झगड़ू पंडित ने ही शिबू सोरेन की राजनीतिक जमीन संथाल में तैयार की थी। दोनों साथ ही काम करते थे और शिबू को अपने घर पर ही रखते थे। किसानों के हक और सूदखोरों के खिलाफ लड़ाई लड़ी। गुरुजी का कद जब धीरे-धीरे बढ़ने लगा, तो सबसे ज्यादा खुशी झगड़ू पंडित को ही हुई थी। बोकारो की एक सभा में गुरुजी से पहली बार भेंट हुई, तभी निमंत्रण देकर पंडित ने कहा था कि गुरुजी संथाल आइए, संथाल को आपके नेतृत्व का इंतजार है। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के निर्देश पर बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ जगन्नाथ मिश्र ने शिबू सोरेन की रिहाई का रास्ता साफ किया था।

    झारखंड अलग राज्य आंदोलन को धार
    झारखंड राज्य आंदोलन के सशक्त नेता के रूप में शिबू सोरेन ने दशकों तक इस लड़ाई का नेतृत्व किया। इस आंदोलन के प्रति उनकी अटूट प्रतिबद्धता का एक बड़ा प्रमाण वह था, जब उन्होंने अलग राज्य के विरोध के कारण लालू प्रसाद यादव के साथ अपने राजनीतिक संबंध तोड़ लिये। यह निर्णय उनके लिए राजनीतिक रूप से जोखिम भरा था, लेकिन उन्होंने आदिवासियों की आकांक्षाओं को सर्वोपरि रखा। अलग राज्य के गठन से पहले झारखंड क्षेत्रीय स्वायत्त परिषद (जैक) का गठन एक बहुत बड़ी उपलब्धि थी, जिसके लिए शिबू सोरेन ने अथक प्रयास किया। यह परिषद झारखंड के लोगों को उनकी प्रशासनिक व्यवस्था में अधिकार और भागीदारी देने वाली पहली संस्था थी। यह परिषद सीधे तौर पर राज्य गठन के मार्ग को प्रशस्त करने वाली एक महत्वपूर्ण कड़ी थी। झारखंड राज्य का गठन सिर्फ एक भौगोलिक विभाजन नहीं था, बल्कि यह दशकों से चल रहे आदिवासी पहचान, संस्कृति और स्वायत्तता के संघर्ष की परिणति थी।

    शिबू सोरेन किसी पद के मोहताज नहीं थे, वह खुद में सुशोभित थे
    शिबू सोरेन का राजनीतिक सफर लंबा और उतार-चढ़ाव भरा रहा। उन्होंने अपने जीवनकाल में विभिन्न महत्वपूर्ण पदों पर कार्य किया, लेकिन उनकी सबसे बड़ी ताकत जनता के बीच उनकी लोकप्रियता और स्वीकृति रही। उनके राजनीतिक करियर की एक दिलचस्प विशेषता यह है कि वे तीन बार मुख्यमंत्री बने, लेकिन उनका कोई भी कार्यकाल पूरा नहीं हो सका। कुछ लोग इसे उनकी राजनीतिक अस्थिरता के रूप में देख सकते हैं, लेकिन यह उनके जन-नेता के रूप में उनकी छवि को और मजबूत करता है। यह दर्शाता है कि उनकी असली ताकत राजनीतिक पद में नहीं, बल्कि जनता के बीच थी, जिसने उन्हें बार-बार संसद तक पहुंचाया। वे एक पारंपरिक राजनेता से अधिक एक आंदोलनकारी और प्रतीक थे, जिनकी उपस्थिति ही झारखंड की राजनीति को आकार देने के लिए पर्याप्त थी। उनके छोटे-छोटे कार्यकाल भी झारखंड की राजनीतिक चेतना और उसके भविष्य को आकार देने में निर्णायक थे।

    Share. Facebook Twitter WhatsApp Telegram Pinterest LinkedIn Tumblr Email
    Previous Articleप्रधानमंत्री ने डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी को बलिदान दिवस पर दी श्रद्धांजलि
    Next Article दिशोम गुरु शिबू सोरेन को मिला पद्म भूषण, पत्नी रूपी सोरेन ने ग्रहण किया सम्मान
    shivam kumar

      Related Posts

      भारत के राजनीतिक इतिहास के सबसे मजबूत स्तंभ बने प्रधानमंत्री मोदी

      June 11, 2026

      ‘युवराज कल्चर’ ही खा गया ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस को

      June 5, 2026

      भाजपा के लिए बड़ी चुनौती होगी टीएमटी के नेटवर्क को तोड़ना, हलके में लेने की गलती ना करे भाजपा

      May 8, 2026
      Add A Comment
      Leave A Reply Cancel Reply

      Recent Posts
      • दिशोम गुरु शिबू सोरेन को मिला पद्म भूषण, पत्नी रूपी सोरेन ने ग्रहण किया सम्मान
      • शिबू सोरेन: झारखंड की आत्मा और अनवरत संघर्ष का महाकाव्य
      • प्रधानमंत्री ने डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी को बलिदान दिवस पर दी श्रद्धांजलि
      • डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के बलिदान दिवस पर भाजपा ने किया उन्हें नमन
      • गूगल प्ले स्टोर पर टेलीग्राम बहाल
      Read ePaper

      City Edition

      Follow up on twitter
      Tweets by azad_sipahi
      Facebook X (Twitter) Pinterest Vimeo WhatsApp TikTok Instagram

      Palamu Division

      • Garhwa
      • Palamu
      • Latehar

      Kolhan Division

      • West Singhbhum
      • East Singhbhum
      • Seraikela Kharsawan

      North Chotanagpur Division

      • Chatra
      • Hazaribag
      • Giridih
      • Koderma
      • Dhanbad
      • Bokaro
      • Ramgarh

      South Chotanagpur Division

      • Ranchi
      • Lohardaga
      • Gumla
      • Simdega
      • Khunti

      Santhal Pargana Division

      • Deoghar
      • Jamtara
      • Dumka
      • Godda
      • Pakur
      • Sahebganj

      Subscribe to Updates

      Get the latest creative news from FooBar about art, design and business.

      © 2026 AzadSipahi. Designed by Launching Press.
      • Privacy Policy
      • Terms
      • Accessibility

      Type above and press Enter to search. Press Esc to cancel.

      Go to mobile version