नेपाल में बुधवार को अचानक आई भीषण बाढ़ ने बड़े पैमाने पर तबाही मचाई। सैकड़ों लोगों की मौत की खबर है, जबकि सैकड़ों लोग अब भी लापता बताए जा रहे हैं। शुरुआती तौर पर इस आपदा को भारी बारिश या भूकंप से जोड़कर देखा जा रहा था, लेकिन वैज्ञानिकों के प्रारंभिक विश्लेषण में एक अलग वजह सामने आई है।
तीन मिनट में हुई घटनाओं की पूरी कड़ी
- सुबह करीब 8:37 बजे तिब्बती क्षेत्र में 4.4 तीव्रता के भूकंप जैसा सिस्मिक सिग्नल दर्ज हुआ।
- इसके कुछ ही समय बाद नेपाल-तिब्बत सीमा के पास एक विशाल आइस एवलांच यानी बर्फ का भूस्खलन हुआ।
- सैटेलाइट तस्वीरों के शुरुआती विश्लेषण के मुताबिक करीब 2,000 फीट चौड़ा बर्फ का हिस्सा लगभग 17,000 फीट की ऊंचाई से टूटकर नीचे गिरा।
- बर्फ के इस विशाल हिस्से के घाटी में गिरने से भारी मात्रा में बर्फ, पानी और मलबा जमा हुआ।
- इसके बाद पानी ने एक अस्थायी झील का रूप लिया और दबाव बढ़ने पर यह झील टूट गई।
- झील टूटते ही पानी, बर्फ और मलबे का तेज सैलाब नीचे की ओर बह निकला और भोटे कोशी नदी की दिशा में बढ़ गया।
4,000 फीट नीचे गिरा ग्लेशियर का हिस्सा
कनाडा की यूनिवर्सिटी ऑफ कैलगरी के भूवैज्ञानिक डैनियल शुगर ने सैटेलाइट तस्वीरों का विश्लेषण किया है। उनके मुताबिक ग्लेशियर का एक बड़ा हिस्सा टूटकर करीब 4,000 फीट नीचे घाटी में गिरा।
वैज्ञानिकों के अनुसार इतनी ऊंचाई से गिरने वाली बर्फ में अत्यधिक ऊर्जा होती है। जमीन से टकराने के बाद बर्फ टूटकर पानी और मलबे के साथ मिल सकती है, जिससे बेहद शक्तिशाली मलबा-प्रवाह पैदा होता है।
घटनास्थल की तस्वीरों में घाटी के निचले हिस्से में बड़े पैमाने पर बर्फ और मलबा जमा दिखाई देता है। वैज्ञानिकों ने इसकी तुलना किसी बड़े विस्फोट से बने गड्ढे जैसी स्थिति से की है।
कहां से शुरू हुआ तबाही का सिलसिला?
शुरुआती वैज्ञानिक आकलन के मुताबिक यह घटना काठमांडू से लगभग 40 मील उत्तर में हुई। ग्लेशियर से टूटकर आया बर्फ और मलबा घाटी में तेजी से आगे बढ़ा और अंततः भोटे कोशी नदी की ओर पहुंचा।
इस तरह कुछ ही मिनटों में हुई घटनाओं की श्रृंखला ने एक सामान्य जलप्रवाह को बेहद विनाशकारी बाढ़ में बदल दिया।
क्या भूकंप इसकी वजह था?
शुरुआत में 4.4 तीव्रता के भूकंप की जानकारी सामने आने के बाद माना गया कि शायद भूकंप ने ग्लेशियर को अस्थिर किया होगा। लेकिन बाद के विश्लेषण में तस्वीर बदल गई।
USGS के अनुसार शुरुआती सिस्मिक सिग्नल वास्तव में किसी प्राकृतिक भूकंप के नहीं, बल्कि बड़े पैमाने पर हुए लैंडस्लाइड/ग्लेशियर गिरने की घटना से उत्पन्न हो सकते हैं। इस घटना से जुड़ा सिग्नल लगभग 5.2 तीव्रता के भूकंप जैसा प्रभाव दिखाता था।
फ्रांस की यूनिवर्सिटी ग्रेनोबल एल्प्स की वैज्ञानिक क्रिस्टन कुक के मुताबिक स्थानीय सिस्मिक रिकॉर्ड में सुबह करीब 8:40 बजे अचानक बड़े पैमाने पर किसी चीज के नीचे की ओर खिसकने का संकेत मिला। इसके तुरंत बाद पानी और मलबे के तेज बहाव के संकेत दिखाई दिए।
क्या बढ़ता तापमान भी जिम्मेदार है?
वैज्ञानिकों ने जलवायु परिवर्तन और बढ़ते तापमान की भूमिका से भी इनकार नहीं किया है। शुरुआती सैटेलाइट तस्वीरों में घटना से एक दिन पहले क्षेत्र में बर्फ की सतह में बदलाव दिखाई देने की बात सामने आई है।
संभव है कि तापमान बढ़ने से ग्लेशियर की स्थिरता प्रभावित हुई हो और बर्फ का बड़ा हिस्सा टूटने की स्थिति में पहुंच गया हो। हालांकि वैज्ञानिक अभी इसे अंतिम कारण नहीं मान रहे हैं।
बादलों के कारण घटनास्थल की सभी स्पष्ट सैटेलाइट तस्वीरें अभी उपलब्ध नहीं हैं। आने वाले दिनों में नई तस्वीरों और अन्य वैज्ञानिक आंकड़ों से आपदा की पूरी कड़ी और स्पष्ट हो सकती है।
वैज्ञानिकों के सामने अब भी कई सवाल
सबसे बड़ा सवाल यह है कि वीडियो और घटनास्थल पर दिखाई दे रही पानी की मात्रा केवल ग्लेशियर टूटने से बनी थी या इसके पीछे कोई अतिरिक्त जलस्रोत भी मौजूद था।
वैज्ञानिकों का कहना है कि उपलब्ध जानकारी अभी प्रारंभिक है। इसलिए यह निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी कि केवल ग्लेशियर का टूटना ही पूरी बाढ़ के लिए जिम्मेदार था।
फिलहाल सबसे संभावित तस्वीर यह है कि ग्लेशियर का विशाल हिस्सा टूटा, बर्फ और मलबा घाटी में गिरा, उससे पानी का दबाव बढ़ा, अस्थायी झील टूटी और फिर पानी-बर्फ-मलबे का शक्तिशाली सैलाब नदी घाटी में फैल गया।
यानी नेपाल की इस त्रासदी को समझने के लिए सिर्फ बारिश या भूकंप को देखना पर्याप्त नहीं है। यह एक ग्लेशियर टूटने, मलबा-प्रवाह और अचानक झील टूटने जैसी घटनाओं की श्रृंखला हो सकती है, जिसने कुछ ही मिनटों में विनाशकारी रूप ले लिया।

