स्वतंत्रता आंदोलन की विरासत से निकला व्यक्तित्व, जिसने संगठन को गांव-गांव तक पहुंचाया
-स्वतंत्रता सेनानी परिवार से निकले उस कांग्रेसी की कहानी, जिसने छह दशक तक संगठन को दिया था जीवन
-अब सच्चे कांग्रेसी की तरह उनका परिवार आगे बढ़ा रहा उनकी विरासत
आज कांग्रेस के निष्ठावान, वयोवृद्ध नेता पीएन सिंह हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनसे जुड़ी यादें, उनके साथ बिताया समय और उनके व्यक्तित्व की छाप इतनी गहरी है कि उन्हें भूल पाना आसान नहीं। कुशल व्यवहार, मृदुभाषी स्वभाव, स्पष्ट विचार और कांग्रेस के प्रति अटूट निष्ठा, पीएन सिंह की पहचान इन्हीं शब्दों में समायी हुई थी। उन्होंने राजनीति में कई दौर देखे। सत्ता बदली, राजनीतिक समीकरण बदले, कांग्रेस का स्वरूप बदला, झारखंड अलग राज्य बना और राज्य की राजनीति भी पूरी तरह बदल गयी। लेकिन एक चीज नहीं बदली। वह था पीएन सिंह का कांग्रेस से रिश्ता। उन्होंने कभी पाला नहीं बदला। पद के लिए लालायित नहीं हुए। राजनीतिक परिस्थितियां चाहे जितनी बदलीं, उनकी पहचान एक सच्चे कांग्रेसी की रही। आज पीएन सिंह का परिवार एक सच्चे कांग्रेसी की तरह उनकी विरासत आगे बढ़ा रहा है। लेकिन हाल में एक ऐसी घटना ने सबका ध्यान अपनी और खींच लिया, जिस पर लोग चर्चा करने को बाध्य हैं। 28 अगस्त 2026 को कांग्रेस भवन में स्वर्गीय पीएन सिंह की 13वीं पुण्यतिथि मनायी गयी, वहीं ठीक अगले दिन 29 अगस्त 2026 को पीएन सिंह के पुत्र अमरेंद्र सिंह को कांग्रेस की अनुशासन समिति द्वारा सस्पेंड कर दिया गया। अमरेंद्र सिंह एक सच्चे कांग्रेसी हैं। उनका परिवार कांग्रेस को जीता है। कांग्रेस की विचारधारा उनके रोम-रोम में बसता है। आज एक सच्चे कांग्रेसी स्वर्गीय पीएन सिंह की बात करेंगे। पद आये और चले गये। चुनाव जीते और हारे गये। सरकारें बनीं और बदलीं। नेता बदले। राजनीतिक समीकरण बदले। लेकिन पीएन सिंह कांग्रेस के रहे और कांग्रेस से उनका अटूट नाता आखिरी सांस तक बना रहा। इन्ही पीएन की कहानी को बता रहे हैं आजाद सिपाही के प्रधान संपादक राकेश सिंह।
-स्वतंत्रता आंदोलन की विरासत में जन्म
2 जून 1942 में को पीएन सिंह का जन्म ऐसे परिवार में हुआ, जिसकी सांसों में ही स्वतंत्रता आंदोलन की चेतना रची-बसी थी। उनके पिता स्व. रामाश्रय सिंह स्वतंत्रता सेनानी थे और देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद से उनके बेहद करीबी संबंध थे। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान रामाश्रय सिंह ने लंबा समय जेल में बिताया। परिवार की राजनीतिक और सामाजिक चेतना इससे भी पुरानी थी। उनके दादा जमधारी सिंह और परिवार के दूसरे सदस्य भी अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ चल रहे आंदोलन से जुड़े रहे। परिवार का घर स्वतंत्रता सेनानियों की बैठकों का केंद्र हुआ करता था। अंग्रेजी सरकार ने जब इन बैठकों की भनक पायी, तो उसने परिवार को चेतावनी दी। बैठकों पर रोक लगाने की कोशिश हुई। लेकिन आजादी के दीवानों के हौसले कहां टूटने वाले थे। गुप्त बैठकें चलती रहीं और स्वतंत्रता आंदोलन को आगे बढ़ाने की रणनीति बनती रही।
-महात्मा गांधी का चंपारण सत्याग्रह
महात्मा गांधी के चंपारण सत्याग्रह से जुड़े आंदोलन में भी परिवार की भूमिका रही। पीएन सिंह की दादी स्वतंत्रता सेनानी थीं। स्वतंत्रता आंदोलन में उनके योगदान के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उन्हें ताम्रपत्र से सम्मानित किया था। उन्हें स्वतंत्रता सेनानी पेंशन भी मिली। यानी पीएन सिंह के लिए कांग्रेस केवल एक राजनीतिक पार्टी नहीं थी। यह उनके परिवार की विरासत थी, उनके संस्कार थे और उनके जीवन का हिस्सा थी।
-जन्म से ही कांग्रेसी
ऐसे माहौल में पले-बढ़े पीएन सिंह के लिए राजनीति कोई अचानक चुना गया पेशा नहीं थी। वह बचपन से ही कांग्रेस और स्वतंत्रता आंदोलन की कहानियों के बीच बड़े हुए। जगदंबा कॉलेज, छपरा से स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के बाद वह सक्रिय राजनीति की ओर बढ़े। 1960-61 में वह अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी से जुड़े। उसके बाद 1964 के आसपास उन्होंने सक्रिय राजनीतिक जीवन को पूरी तरह अपना लिया। उस समय रांची जिला आज के मुकाबले बहुत बड़ा था। सिमडेगा, गुमला, खूंटी और लोहरदगा जैसे इलाके भी उसी बड़े रांची जिले का हिस्सा थे। पीएन सिंह ने कांग्रेस संगठन को मजबूत करने के लिए शहर से निकलकर गांवों का रास्ता पकड़ा।
-गांव-गांव घूमकर खड़ा किया संगठन
आज जब राजनीति में सोशल मीडिया और बड़े मंचों का महत्व बढ़ गया है, उस दौर की राजनीति को समझने के लिए पीएन सिंह का सफर एक अलग तस्वीर पेश करता है। वह गांव-गांव जाते थे। पंचायतों में पहुंचते थे। कार्यकतार्ओं से मिलते थे। आम लोगों की समस्याएं सुनते थे। कांग्रेस की विचारधारा को लोगों तक पहुंचाते थे। वह सिर्फ संगठन की बैठक कर वापस लौट जाने वाले नेता नहीं थे। जिस इलाके में जाते, वहां कार्यकर्ताओं से व्यक्तिगत संबंध बनाते। बाद में जब वे जिला संगठन में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों पर पहुंचे, तो उन्होंने रांची जिले के 42 प्रखंडों का दौरा किया और संगठन को मजबूत करने का प्रयास किया। उस समय कांग्रेस का संगठन जमीन से जुड़ा हुआ था और पीएन सिंह उस जमीनी संगठन की महत्वपूर्ण कड़ी थे।
-1964 के दंगे और सामाजिक सौहार्द
1964 में रांची सांप्रदायिक तनाव के दौर से गुजरा। उस कठिन समय में भी पीएन सिंह ने सामाजिक सौहार्द कायम रखने की कोशिश की। उनके लिए राजनीति का मतलब केवल पार्टी की सीमा तक सीमित रहना नहीं था। समाज में लोगों के बीच विश्वास और संवाद बनाये रखना भी उनकी जिम्मेदारी थी। शायद यही कारण रहा कि कांग्रेस के बाहर भी विभिन्न राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों से जुड़े लोग उनके पास अपनी समस्याएं लेकर आते थे।
-कांग्रेस के बंटवारे के दौर में भी निष्ठा कायम
कांग्रेस के इतिहास में वह दौर भी आया, जब पार्टी का विभाजन हुआ। संगठन दो धाराओं में बंट गया। चुनाव चिह्न बदले। देश और प्रदेश की राजनीति में बड़े बदलाव आये। लेकिन पीएन सिंह की प्रतिबद्धता कांग्रेस के साथ बनी रही। वह कांग्रेस की विचारधारा को गांवों तक ले जाते रहे। समाज के अलग-अलग वर्गों के लोगों को संगठन से जोड़ते रहे और कार्यकर्ताओं के बीच अपनी जगह मजबूत करते रहे। यही वह दौर था, जब उनकी पहचान केवल रांची के नेता के रूप में नहीं, बल्कि बिहार के व्यापक राजनीतिक परिदृश्य में एक प्रभावशाली संगठनकर्ता के रूप में बनने लगी।
-मुख्यमंत्री से लेकर दिल्ली के बड़े नेताओं तक सीधी पहुंच
समय के साथ पीएन सिंह का राजनीतिक कद बढ़ता गया। बिहार के मुख्यमंत्री बिंदेश्वरी दूबे और केदार पांडेय जैसे नेताओं के साथ उनकी सीधी बातचीत होती थी। कांग्रेस के दिल्ली नेतृत्व में भी उनकी पहचान थी। इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, संजय गांधी, माधवराव सिंधिया, राजेश पायलट, वसंत दादा पाटिल और बलराम जाखड़ जैसे राष्ट्रीय स्तर के नेताओं से उनके सीधे संपर्क रहे। छोटानागपुर क्षेत्र में कांग्रेस की चुनावी रणनीति और संगठन से जुड़े मुद्दों पर बड़े नेता उनकी राय सुनते थे। उनकी खासियत यह थी कि वह केवल दिल्ली के नेताओं तक पहुंच रखने वाले नेता नहीं थे। दिल्ली और गांव के बीच वे एक सेतु की तरह काम करते थे।
-विधानसभा चुनाव भी लड़ा, लेकिन किस्मत ने साथ नहीं दिया
1990 में कांग्रेस ने उन्हें हटिया विधानसभा क्षेत्र से चुनाव मैदान में उतारा। यह उनके राजनीतिक जीवन का महत्वपूर्ण चुनाव था। संगठन में मजबूत पकड़ और लंबे राजनीतिक अनुभव के बावजूद चुनावी किस्मत ने उनका साथ नहीं दिया। वह मामूली अंतर से चुनाव हार गये। लेकिन यह हार उनके राजनीतिक जीवन की दिशा नहीं बदल सकी। चुनाव हारने के बावजूद संगठन और कांग्रेस के प्रति उनका समर्पण पहले जैसा ही बना रहा।
-पद मिलते रहे, लेकिन पद कभी मंजिल नहीं बनी
पीएन सिंह ने अपने लंबे राजनीतिक जीवन में कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभालीं। वह बिहार प्रदेश कांग्रेस कमेटी के महासचिव रहे। बिहार स्टेट स्मॉल स्केल इंडस्ट्रीज के अध्यक्ष के रूप में 1986 से 1990 तक जिम्मेदारी संभाली। वर्ष 1981 में रेलवे बोर्ड के सदस्य बने। वह बिहार राज्य किसान कांग्रेस के अध्यक्ष भी रहे। खनिज विकास निगम कर्मचारी संघ के अध्यक्ष रहे। 1983 से 1988 तक बिहार हिल एरिया लिफ्ट इरिगेशन के निदेशक रहे। बाद में झारखंड प्रदेश कांग्रेस में भी उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी और कार्यकारी अध्यक्ष की जिम्मेदारी संभाली। लेकिन इन पदों के बावजूद उनकी असली पहचान पदाधिकारी की नहीं, बल्कि कार्यकर्ता और संगठनकर्ता की रही।
-कार्यकर्ताओं के नाम याद रखना उनकी खासियत थी
पीएन सिंह के व्यक्तित्व की सबसे बड़ी विशेषता उनका सहज व्यवहार था। कांग्रेस के छोटे से छोटे कार्यकर्ता से लेकर बड़े नेता तक, वे सभी से समान आत्मीयता से मिलते थे। एक बार मिलने के बाद किसी कार्यकर्ता का नाम याद रख लेना उनकी खासियत थी। रांची ही नहीं, झारखंड के किसी दूरदराज इलाके का कार्यकर्ता भी यदि उन्हें फोन करता, तो वे अक्सर उसे नाम से पुकारते। यह सिर्फ स्मरण शक्ति नहीं थी। यह उन रिश्तों की गहराई थी, जिन्हें उन्होंने दशकों की राजनीति में बनाया था। उनका घर और उनका संपर्क क्षेत्र पार्टी की सीमाओं से भी आगे था। दूसरे दलों के कार्यकर्ता भी अपनी परेशानी लेकर उनके पास पहुंचते थे और पीएन सिंह बिना राजनीतिक भेदभाव के उनकी मदद करने की कोशिश करते थे। जाति, धर्म, समुदाय या राजनीतिक दल, इनमें से कोई भी उनके लिए मदद का पैमाना नहीं था।
-राजनीति के साथ समाज से भी गहरा रिश्ता
पीएन सिंह की राजनीति सिर्फ चुनाव और संगठन तक सीमित नहीं थी। समाज से उनका गहरा जुड़ाव रहा। नया साल, होली और दशहरा जैसे अवसरों पर लोगों को पोस्टकार्ड के जरिये शुभकामनाएं भेजना उनकी आदत थी। आज के डिजिटल दौर में शायद यह बात छोटी लगे, लेकिन उस समय किसी व्यक्ति के नाम पोस्टकार्ड भेजकर शुभकामना देना संबंधों को जीवित रखने का एक आत्मीय तरीका था। वह हर परिचित के सुख-दुख में शामिल होने की कोशिश करते थे। राजनीतिक कार्यक्रमों के अलावा सामाजिक आयोजनों में भी उनकी सक्रियता बनी रहती थी।
-झारखंड बना, राजनीति बदली, लेकिन पीएन सिंह नहीं बदले
झारखंड बनने के बाद राज्य की राजनीति का स्वरूप तेजी से बदला। आदिवासी राजनीति, क्षेत्रीय दलों का उभार, नये राजनीतिक समीकरण और बदलते सामाजिक समीकरणों ने कांग्रेस की भूमिका को भी प्रभावित किया। लेकिन उन्होंने कांग्रेस का साथ नहीं छोड़ा। उम्र बढ़ती गयी। स्वास्थ्य कमजोर होता गया। सक्रियता कम हुई, लेकिन कांग्रेस की गतिविधियों को लेकर उनकी उत्सुकता बनी रही। कभी-कभी उन्हें इस बात की पीड़ा भी होती थी कि पार्टी में अब पुराने नेताओं से सलाह-मशविरा नहीं लिया जाता। लेकिन इस पीड़ा को भी वे अक्सर मुस्कुराकर टाल दिया करते। कहते ‘अब यूथ पॉलिटिक्स का जमाना है। उन्हें भी मौका मिलना चाहिए।’ यह वाक्य उनके व्यक्तित्व को समझने के लिए काफी है। उपेक्षा की पीड़ा थी, लेकिन नयी पीढ़ी के लिए मन में शिकायत नहीं।
-आखिरी दिनों तक कांग्रेस की चिंता
जब सेहत ने उनका साथ देना लगभग छोड़ दिया, तब भी कांग्रेस से उनका रिश्ता खत्म नहीं हुआ। पार्टी में क्या हो रहा है? कौन सक्रिय है? संगठन की क्या स्थिति है? राजनीतिक परिस्थितियां किस दिशा में जा रही हैं? इन सवालों को लेकर उनकी दिलचस्पी आखिरी दिनों तक बनी रही। वह सक्रिय राजनीति से भले दूर हो गये थे, लेकिन राजनीतिक चेतना से कभी दूर नहीं हुए।
-एक युग का अंत
पीएन सिंह की कहानी केवल एक कांग्रेस नेता की जीवनी नहीं है। यह उस दौर की राजनीति की कहानी है, जब नेता कार्यकर्ताओं को नाम से जानते थे, गांवों की पगडंडियों पर संगठन खड़ा करते थे और राजनीतिक संबंध चुनावी मौसम तक सीमित नहीं होते थे। स्वतंत्रता सेनानी परिवार की विरासत से निकले पीएन सिंह ने कांग्रेस को सिर्फ राजनीतिक दल के रूप में नहीं देखा। उन्होंने उसे अपने जीवन का हिस्सा माना। उन्होंने सत्ता देखी, संगठन देखा, हार देखी, पार्टी का विभाजन देखा, बदलती राजनीति देखी और अंतत: अपनी ही पार्टी में बदलते दौर को भी देखा। लेकिन उनके जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि शायद यही रही कि उन्होंने अपनी राजनीतिक निष्ठा नहीं बदली। पद आये और चले गये। चुनाव जीते और हारे गये। सरकारें बनीं और बदलीं। नेता बदले। राजनीतिक समीकरण बदले। लेकिन पीएन सिंह कांग्रेस के रहे और कांग्रेस से उनका अटूट नाता आखिरी सांस तक बना रहा। रांची और झारखंड की राजनीति में उनका नाम अब एक ऐसे दौर की स्मृति बन चुका है, जब राजनीति में विचारधारा, संगठन, कार्यकर्ता और व्यक्तिगत रिश्तों की अपनी अलग अहमियत थी। 28 अगस्त 2013 को पीएन सिंह इस दुनिया को अलविदा कर चले गये हैं, लेकिन उनके साथ जुड़ी यादें, उनका सहज व्यवहार और कांग्रेस के प्रति उनकी निष्ठा आने वाली पीढ़ियों के लिए उस राजनीतिक दौर की कहानी कहती रहेगी।
-क्या पीएन सिंह का योगदान पार्टी के लिए कोई मोल नहीं रखता ?
फिलहाल पीएन सिंह का परिवार उनकी विरासत को आगे बढ़ा रहा है। एक सच्चे कोंग्रेसी की तरह। उनके चार पुत्र हुए। शैलेंद्र सिंह, धर्मेंद्र सिंह, अमरेंद्र सिंह और राघवेंद्र सिंह लोहा। ये सभी कांग्रेसी हैं। दिल से, दिमाग से, मन से और तन से। इनकी रग-रग में कांग्रेस है, उसके संस्कार हैं। इन सभी भाइयों में अमरेंद्र सिंह कांग्रेस के सक्रिय सदस्य हैं। वह कांग्रेस के को-आॅर्डिनेटर रहे। 28 अगस्त 2026 को कांग्रेस भवन में स्वर्गीय पीएन सिंह की 13वीं पुण्यतिथि मनायी गयी। कांग्रेस के कई बड़े नेता और कार्यकर्ताओं ने उसमें अपनी उपस्थिति दर्ज करायी। लेकिन ठीक अगले ही दिन 29 अगस्त को उनके पुत्र अमरेंद्र सिंह को कांग्रेस सस्पेंड कर देती है। कारण एक तथाकथित वायरल वीडियो के आधार पर प्रदेश अनुशासन समिति ने तत्काल प्रभाव से पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से उन्हें निलंबित कर दिया। पत्र के मुताबिक, इरबा सड़क जाम के दौरान वीडियो वायरल होने के मामले में अनुशासन समिति ने सुनवाई की थी। अगले आदेश तक पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से उन्हें निलंबित कर दिया गया। लेकिन अमरेंद्र सिंह का सस्पेंड होना कई लोगों को आश्चर्यचकित कर गया। किसी ने सोचा भी नहीं था कि कांग्रेस पार्टी अमरेंद्र सिंह पर इतनी कड़ी कार्यवाई करेगी। जिस परिवार ने सदियों से कांग्रेस की सेवा की, पार्टी के लिए परिवार ने खुद को समर्पित कर दिया। न दिन देखा, न रात, अपना सर्वस्वा न्योछावर कर दिया। उस परिवार के सदस्य के साथ कांग्रेस का इतना कड़ा रुख कई सवालों को जन्म दे गया। कई लोगों द्वारा इस मामले को लेकर सोशल मीडिया पर भी आवाज उठायी गयी। कइयों ने कहा कि एक सच्चे कांग्रेसी के साथ ऐसा नहीं होना चाहिए था। कइयों ने आरोप लगाया कि अमरेंद्र सिंह साजिश के शिकार हो गये। और भी कई तरह की बातें लिखी गयीं। कई कांग्रेसी भी इसे लेकर दबी जुबान में बातें कर रहे हैं कि ऐसा नहीं होना चाहिए था। राजनीतिक और सामजिक गलियारे में इस मामले को लेकर चर्चाएं जोर पकड़ रही हैं कि कांग्रेस ने यह गलत कदम उठा लिया। कांग्रेस को इसकी समीक्षा करनी चाहिए। खैर यह कांग्रेस का अंदरूनी मामला है। जो कांग्रेस के आलाकमान को सही लगे, वे करेंगे। लेकिन ऐसा नहीं है कि झारखंड कांग्रेस के नेताओं ने पार्टी का अनुशासन पहले नहीं तोड़ा है। बड़े-बड़े नेताओं ने पार्टी लाइन से इतर कई ऐसे बयान दिये हैं, कार्य किये हैं, जो पार्टी की छवि के लिए मुफीद नहीं। लेकिन पार्टी ने उन पर ऐसी कोई कठोर कार्रवाई नहीं की। और जिन पर पार्टी ने कार्यवाई की, तो तुरंत उन्हें वापस पार्टी में भी ले आया गया। बल्कि वे पार्टी में आज अच्छी पोजीशन और पावर में हैं। कुछ तो सत्ता सुख का अनुभव भी ले रहे हैं। लेकिन यहां सवाल यह उठता है कि क्या कांग्रेस को अब पीएन सिंह जैसे समर्पित परिवारों की जरूरत नहीं। क्या पीएन सिंह का योगदान पार्टी के लिए कोई मोल नहीं रखता। क्योंकि एक वक्त था जब कांग्रेसी होने पर लोग गर्व की अनुभूति करते थे। लेकिन आज ऐसा नहीं है। ऐसा क्यों नहीं है, कांग्रेस को इसपर मंथन करना चाहिए।
-पीएन सिंह के राजनीतिक सफर पर एक नजर
सदस्य, आॅल इंडिया कांग्रेस कमेटी
राज्य और केंद्र सरकार/बोर्ड/कॉरपोरेशन में पद:
चेयरमैन, बिहार राज्य लघु उद्योग निगम (1986-1990)
डायरेक्टर, बिहार पहाड़ी क्षेत्र लिफ्ट सिंचाई निगम (1983-85)
सदस्य, रेलवे बोर्ड/कार्यक्रम कार्यान्वयन समिति, रेल मंत्रालय (1981-83)
सदस्य, राज्य टेलीफोन सलाहकार समिति।
कांग्रेस पार्टी में पद:
अध्यक्ष, रांची जिला युवा कांग्रेस (1969-72)
महासचिव – रांची जिला कांग्रेस कमेटी (1972-82)
प्रतिनिधि, बिहार राज्य कांग्रेस कमेटी (1972-82)
संयुक्त सचिव, बिहार राज्य कांग्रेस कमेटी (1972-82)
सदस्य, आॅल इंडिया कांग्रेस कमेटी (1982 से अंतिम समय तक)
महासचिव, छोटानागपुर संथाल परगना क्षेत्रीय कांग्रेस कमेटी (1992-95)
अध्यक्ष, रांची महानगर कांग्रेस (1996-97)
कार्यकारी अध्यक्ष, झारखंड क्षेत्रीय कांग्रेस कमेटी (1998-2000)
कार्यकारी और मुख्य पीसीसी कांग्रेस कमेटी
सदस्य, कांग्रेस कार्यसमिति, जेपीसीसी

