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    Home»Top Story»आजाद भारत के इतिहास का काला अध्याय
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    आजाद भारत के इतिहास का काला अध्याय

    azad sipahi deskBy azad sipahi deskJune 26, 2019No Comments8 Mins Read
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    25 जून 1975 की वह काली रात

    वह देश में असंतोष का काल था। राजनीतिक असंतोष का काल। केंद्र की कांग्रेस सरकार के खिलाफ देश भर में आवाजें बुलंद हो रही थीं। बिहार और गुजरात में विधानसभाएं भंग की जा चुकी थीं। विपक्षी पार्टी के बड़े कद्दावर नेता आंदोलन कर रहे थे। देश के युवा उनके साथ थे। जनता में असंतोष तेजी से बढ़ रहा था। बेरोजगारी चरम पर थी। युवा आक्रोशित थे। देश में बदलाव की लहर हिलोरें मार रही थीं। राजनीतिक रूप से बेहद मजबूत बन चुकीं तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी कहीं भीतर से भयभीत हो गयी थीं। उन्हें लग रहा था कि यह असंतोष उनकी सत्ता को मटियामेट कर देगा। वह अपनी कुर्सी को बचाने के लिए कुछ सख्त कदम उठाना चाह रही थीं। उन्हें यह भी खौफ था कि कहीं अमेरिका उनके खिलाफ कोई बड़ी चाल न चल दे और उनका तख्ता पलट न हो जाये।
    अमेरिका का यह डर इंदिरा के सिर चढ़ कर बोल रहा था। उन्होंने एक साक्षात्कार में स्वीकार किया था कि वह अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन की ‘हेट लिस्ट’ में सबसे ऊपर थीं और उन्हें डर था कि कहीं उनकी सरकार का भी सीआइए की मदद से चिली के राष्ट्रपति साल्वाडोर अयेंदे की तरह तख्ता न पलट दिया जाये।
    लेकिन राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि हालात ऐसे नहीं थे कि इमरजेंसी लगा दी जाये। इंदिरा गांधी इसके विपरीत सोचती थीं। उनका मानना था कि देश की व्यवस्था चरमरा गयी है।
    तख्ता पलट का डर तो था ही और तानाशाह का चोला पहन चुकीं इंदिरा गांधी के कतिपय सलाहकारों ने आपातकाल की कहानी लिख डाली।
    25-26 जून, 1975 की आधी रात को तत्कालीन राष्टपति डॉ फखरुद्दीन अली अहमद ने इमरजेंसी लागू करने के आदेश पर हस्ताक्षर किया। और दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश में लोकतंत्र का गला घोंट दिया गया।
    पहले ही पड़ चुकी थी नींव
    प्रख्यात पत्रकार कुलदीप नैयर अपनी किताब ‘इमरजेंसी रीटोल्ड’ में कहते हैं कि देश में आपातकाल की नींव तो 1971 के आम चुनाव के बाद से ही रख दी गयी थी। लेकिन 1975 आते-आते इमारत बुलंद हो चुकी थी। विपक्ष का विरोध अपने चरम पर पहुंच चुका था। इमरजेंसी के बहुत बाद एक साक्षात्कार में इंदिरा ने कहा था कि उन्हें लगता था कि भारत को शॉक ट्रीटमेंट की जरूरत है। लेकिन इस शॉक ट्रीटमेंट की योजना 25 जून की रैली से छह महीने पहले ही बन चुकी थी। आठ जनवरी 1975 को सिद्धार्थ शंकर रॉय ने इंदिरा को एक चिट्ठी में आपातकाल की पूरी योजना भेजी थी। चिट्ठी के मुताबिक यह योजना तत्कालीन कानून मंत्री एचआर गोखले, कांग्रेस अध्यक्ष देवकांत बरुआ और बांबे कांग्रेस के अध्यक्ष रजनी पटेल के साथ उनकी बैठक में बनी थी।
    फोन की वह घंटी और इमरजेंसी
    वह 25 जून 1975 की सुबह थी, जब पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर राय के फोन की घंटी बजी। वह उन दिनों दिल्ली में थे और बंग भवन के अपने कमरे में लेटे हुए कुछ पढ़ रहे थे। फोन इंदिरा गांधी के आॅफिस से था और फोन पर थे उनके विशेष सहायक आरके धवन, जो उन्हें प्रधानमंत्री निवास पर जल्द से जल्द आने के लिए कह रहे थे। तब इंदिरा गांधी का आवास 1, सफदरजंग रोड पर था। रॉय जैसे ही पहुंचे, उन्होंने इंदिरा को अपनी स्टडी में ढेर सारी रिपोर्टों के ढेर के बीच खुद को उलझा हुआ पाया। वह काफी परेशान दिख रही थीं। देश के बिगड़ते हालात पर बातचीत करते हुए इंदिरा ने रॉय को कहा कि समय आ गया है कि हम कड़े फैसले लें। अचानक इंदिरा की ऐसी बातें सुनकर रॉय पहले घबराए। फिर उन्होंने कुछ मोहलत मांगी।
    रॉय दो घंटे बाद वापस इंदिरा के पास पहुंचे और देश की आंतरिक गड़बड़ियों से निपटने का एक सूत्री उपाय आपातकाल को बताया। रॉय ने इंदिरा को यह भी सुझाया कि वह सीधे राष्ट्रपति से धारा 352 पर बात करें और आपातकाल की घोषणा कर दें।
    और राष्टÑपति ने कर दिया हस्ताक्षर
    फिर सिद्धार्थ शंकर और इंदिरा शाम पांच बजे राष्ट्रपति भवन पहुंचे और देश और सारी परिस्थितियां समझायीं। दोनों वापस आये और आपातकाल के कागजात तैयार कराये गये। राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने उन आपातकाल के घोषणा वाले कागजात पर आधी रात के करीब हस्ताक्षर कर दिये।
    आपातकाल के कागजात पर राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद इंदिरा ने सुबह छह बजे कैबिनेट की बैठक बुलायी। इसी बीच संजय गांधी कई बार इंदिरा से मिले और गिरफ्तार किये जानेवालों की सूची तैयार की गयी। मीडिया संस्थानों और न्यायपालिका पर लगाम लगाने के उपायों पर विचार-विमर्श किया गया। नैयर लिखते हैं कि मीडिया पर पाबंदी को लेकर पार्टी में बड़ा विरोध था। सिद्धार्थ शंकर रॉय भी इसके खिलाफ थे, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। इंदिरा संजय गांधी के हाथों की कठपुतली हो चुकी थीं।
    यह थी मूल वजह
    इमरजेंसी लगाने की जड़ में 1971 में हुआ लोकसभा चुनाव था, जिसमें इंदिरा गांधी ने अपने मुख्य प्रतिद्वंद्वी राजनारायण को पराजित किया था। लेकिन चुनाव परिणाम आने के चार साल बाद राजनारायण ने इलाहाबाद हाइकोर्ट में चुनाव परिणाम को चुनौती दी। 12 जून, 1975 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश जगमोहन लाल सिन्हा ने इंदिरा गांधी का चुनाव निरस्त कर उन पर छह साल तक चुनाव लड़ने का प्रतिबंध लगा दिया।
    फैसले की घड़ी
    दुबले-पतले 55 साल के न्यायमूर्ति जगमोहन लाल सिन्हा गाड़ी से सीधे कोर्ट पहुंचे थे। कमरा नंबर 24 में वह जैसे ही कुर्सी पर बैठे, अच्छे कपड़ों में तैयार होकर आये, पेशकार ने खचाखच भरी कोर्ट में ऊंची आवाज में कहा, ध्यान से सुनिये, जज साहब जब राजनारायण की चुनाव याचिका पर फैसला सुनायेंगे, तो कोई ताली नहीं बजनी चाहिए।
    अपने सामने 258 पेज के फैसले के साथ मौजूद न्यायमूर्ति सिन्हा ने कहा, याचिका स्वीकार की जाती है। एक पल के लिए सन्नाटा छा गया। अखबार वाले टेलीफोन की तरफ भागे और खुफिया विभाग के लोग अपने दफ्तरों की तरफ।
    राजनारायण सिंह की दलील थी कि इंदिरा गांधी ने चुनाव में सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग किया, तय सीमा से अधिक पैसा खर्च किया और मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए गलत तरीकों का इस्तेमाल किया। अदालत ने इन आरोपों को सही ठहराया था। इसके बावजूद श्रीमती गांधी ने इस्तीफा देने से इनकार कर दिया। इसी दिन गुजरात में चिमनभाई पटेल के विरुद्ध विपक्षी जनता मोर्चे को भारी विजय मिली। इस दोहरी चोट से इंदिरा गांधी बौखला गयीं।
    राजीव गांधी ने अपनी मां को दी थी फैसले की सूचना
    12 जून को इंदिरा गांधी के सबसे वरिष्ठ निजी सचिव नैवुलणे कृष्ण अय्यर शेषन के टेलीप्रिंटर पर मैसेज आने का इंतजार कर रहे थे। सुबह 10:02 बजे शेषन ने मशीन पर घंटी की आवाज सुनी और फ्लैश मैसेज को देखा। उसमें लिखा था, श्रीमती गांधी अपदस्थ। शेषन ने मशीन से पेज को फाड़ा और उस कमरे की तरफ भागे, जहां प्रधानमंत्री बैठी थीं। कमरे के बाहर उनकी मुलाकात बड़े बेटे राजीव से हुई, जो इंडियन एयरलाइंस में पायलट थे। उन्होंने वह संदेश राजीव को दिया। राजीव ने अपनी मां से कहा, उन्होंने आपको अपदस्थ कर दिया है। इसी बीच एक और फ्लैश आया कि उन्हें छह वर्षों के लिए किसी निर्वाचित पद पर बने रहने से वंचित कर दिया गया है। इसने उन्हें झकझोर दिया था।
    राष्ट के नाम संदेश
    अगली सुबह समूचे देश ने रेडियो पर इंदिरा गांधी की आवाज में संदेश सुना कि भाइयों और बहनों, राष्ट्रपति जी ने आपातकाल की घोषणा की है। लेकिन इससे सामान्य लोगों को डरने की जरूरत नहीं है। उस समय आकाशवाणी ने रात के अपने एक समाचार बुलेटिन में यह प्रसारित किया कि अनियंत्रित आंतरिक स्थितियों के कारण सरकार ने पूरे देश में आपातकाल की घोषणा कर दी गयी है। आकाशवाणी पर प्रसारित अपने संदेश में इंदिरा गांधी ने कहा था, जब से मैंने आम आदमी और देश की महिलाओं के फायदे के लिए कुछ प्रगतिशील कदम उठाये हैं, तभी से मेरे खिलाफ गहरी साजिश रची जा रही थी।
    मीसा-डीआइआर का कहर
    मीसा और डीआइआर के तहत देश में एक लाख से ज्यादा लोगों को जेलों में ठूंस दिया गया। आपातकाल के खिलाफ आंदोलन के नायक जयप्रकाश नारायण की किडनी कैद के दौरान खराब हो गयी थी । उस काले दौर में जेल-यातनाओं की दहला देने वाली कहानियां भरी पड़ी हैं। देश के जितने भी बड़े नेता थे, सभी के सभी सलाखों के पीछे डाल दिये गये। एक तरह से जेलें राजनीतिक पाठशाला बन गयीं। एक तरफ नेताओं की नयी पौध राजनीति सीख रही थी, दूसरी तरफ देश को इंदिरा के बेटे संजय गांधी अपने दोस्त बंसीलाल, विद्याचरण शुक्ल और ओम मेहता की तिकड़ी के जरिये चला रहे थे। संजय गांधी ने वीसी शुक्ला को नया सूचना प्रसारण मंत्री बनवाया, जिन्होंने मीडिया पर सरकार की इजाजत के बिना कुछ भी लिखने-बोलने पर पाबंदी लगा दी। जिसने भी इससे इनकार किया, उसे जेलों में डाल दिया गया।

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