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    Home»Top Story»झारखंड में ‘रीचेबल’ भाजपा बनाम ‘नॉट रीचेबल’ विपक्ष
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    झारखंड में ‘रीचेबल’ भाजपा बनाम ‘नॉट रीचेबल’ विपक्ष

    azad sipahi deskBy azad sipahi deskSeptember 30, 2019No Comments8 Mins Read
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    जनता हो या कार्यकर्ता, उनके लिए पार्टी के बड़े नेताओं की सहज उपलब्धता आज भी दूर की कौड़ी ही है। बात चाहे फोन पर बात करने की हो या कार्यालय में सीधे मुलाकात की, अभी झारखंड के विपक्षी दलों में वह कार्य संस्कृति विकसित नहीं हो पायी है, जिसमें वे जनता से सीधे और सहज संपर्क में हों। हालांकि राज्य के मुखिया रघुवर दास ने इस दिशा में पहल की है। वह अब लोगों के सीधे संपर्क में हैं। पहले रघुवर दास पर गंभीर मुख्यमंत्री होने का आरोप लगता था, पर पिछले पांच साल में वह इस छवि को तोड़ चुके हैं। अब वह हमेशा हंसते-मुस्कुराते हैं और लोगों के लिए आसानी से उपलब्ध होते हैं। आज कोई भी व्यक्ति मुख्यमंत्री रघुवर दास से फोन पर सीधे बात कर सकता है। दूसरी तरफ विपक्ष के बड़े नेता आज भी जनता के लिए उतने आसानी से बातचीत के लिए उपलब्ध नहीं हैं। उनसे फोन पर बात करना काफी मुश्किल है। इसलिए लोग कहने लगे हैं कि भाजपा जहां ‘रीचेबल’ हो गयी है, वहीं विपक्षी दल ‘नॉट रीचेबल’ हो गये हैं और इसका असर कहीं न कहीं चुनाव पर भी पड़ना स्वाभाविक है। झारखंड में पक्ष और विपक्ष के प्रमुख नेताओं की जनता और कार्यकर्ताओं के लिए उपलब्धता की पड़ताल करती दयानंद राय की रिपोर्ट।

    बात दो महीने पहले की है। झारखंड के प्रमुख विपक्षी दल झामुमो के एक स्थानीय नेता के दिल में ख्वाहिश जगी कि वह पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष हेमंत सोरेन के साथ बैठ कर उनसे बातचीत कर सकें। उन्होंने प्रॉपर चैनल के जरिये यह सूचना हेमंत सोरेन तक पहुंचायी, पर उनकी यह इच्छा आज तक अधूरी है। अब झारखंड विकास मोर्चा के सुप्रीमो बाबूलाल मरांडी की बात करते हैं।
    विनम्र, सहज और माटी के नेता बाबूलाल चाहें तो वह किसी से भी बात कर सकते हैं, पर कोई्र व्यक्ति उनसे फोन पर बात करना चाहे, तो यह आसान नहीं है। बाबूलाल कभी सीधे फोन नहीं उठाते। उनसे बात तभी हो पाती है, जब यह पता चले कि उनके साथ कौन है। उसके

    अब बात करते हैं कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष डॉ रामेश्वर उरांव की। आइपीएस अधिकारी रहे डॉ रामेश्वर उरांव कड़क मिजाज के अधिकारी रहे हैं और पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद भी उनसे बातचीत कर पाना आसान नहीं है, ऐसा कुछ कार्यकर्ताओं का कहना है। पर डॉ रामेश्वर उरांव के कार्यकर्ताओं के फोन कॉल न उठाने और सहज उपलब्ध न रहने की बाबत जब उनसे उनके मोबाइल नंबर पर बात की गयी, तो डॉ रामेश्वर उरांव ने कहा कि कार्यकर्ताओं के लिए उपलब्ध न रहने का आरोप लगानेवाला कांग्रेस का नहीं, भाजपा का कार्यकर्ता होगा। मैं जब रांची में रहता हूं, तो प्रदेश कार्यालय में दिन के 11 बजे से छह बजे तक कार्यकर्ताओं के लिए उपलब्ध रहता हूं। फोन पर तो मैं हमेशा उपलब्ध रहता हूं। वहीं फील्ड में रहूं तो चाहे लातेहार रहूं या गुमला या फिर लोहरदगा हर जगह कार्यकर्ताओं और लोगों से मिलता रहता हूं। यह आरोप गलत है।
    अब बात करते हैं झारखंड सरकार के मुखिया मुख्यमंत्री रघुवर दास की। पार्टी के एक कार्यकर्ता को उनसे कुछ बात करनी थी। उसने सीधे रघुवर दास को फोन लगाया। रघुवर दास उस समय संथाल परगना के दौरे पर थे। कार्यकर्ता ने समझा शायद वह फोन नहीं उठायेंगे। आधे घंटे के बाद उस कार्यकर्ता के मोबाइल पर फोन आया। फोन करनेवाला कह रहा था, मैं मुख्यमंत्री रघुवर दास बोल रहा हूं, कहिए क्या बात है।
    कार्यकर्ता हतप्रभ था। खैर, दूसरी तरफ मुख्यमंत्री रघुवर दास ही थे। कार्यकर्ता ने अपनी समस्या फोन पर उनके सामने रखी और अगले दिन उसकी समस्या सुलझ गयी थी।
    प्राथमिकताओं के आधार पर ही बात करते हैं नेता
    हेमंत सोरेन या बाबूलाल मरांडी या फिर रामेश्वर उरांव, ये नेता विपक्षी राजनीति की मुख्य धुरी हैं। हेमंत सोरेन की खासियत यह है कि वे प्राथमिकताएं तय करने के बाद ही बातचीत को तैयार होते हैं। उदाहरण के लिए एक प्रेस फोटोग्राफर को एक ठेकेदार ने पीट दिया। उन्हें सूचना मिली। बिना कोई देर किये वे उसके घर गये। हाल-चाल पूछा और यह जता दिया कि मीडिया के किसी साथी के साथ अगर कुछ होता है, तो वे खड़े रहेंगे। इसी तरह के एक प्रकरण में विधायक ढुल्लू महतो से परेशान झारखंड चैंबर आॅफ कॉमर्स से जुड़ा व्यापारियों का एक दल उनसे मिलना चाहता था। प्रॉपर चैनल के माध्यम से यह बात हेमंत तक पहुंची। हेमंत ने अपने आवास पर न सिर्फ उनसे बात की बल्कि उनकी समस्याएं धैर्यपूर्वक सुनीं। बाबूलाल मरांडी भी झारखंड के कुछ बड़े मीडियाकर्मियों और दिल्ली के बड़े दलों के नेताओं के तो संपर्क में रहते हैं, पर आम लोग भी उनसे इतनी आसानी से कनेक्ट कर सकें यह स्थिति फिलहाल नहीं बन पायी है। एक कारण इसका यह लगता है कि विपक्षी नेताओं ने जीवंत संपर्क को अभी उतनी गंभीरता से नहीं लिया है जितना भाजपा लेती है। भाजपा जहां मीडिया कार्यशालाओं का आयोजन करती है वहीं विपक्षी नेता इसकी जरूरत महसूस नहीं करते।

    भाजपा के नेताओं में परिवर्तन क्यों आया है
    16 सितंबर को भाजपा के प्रदेश कार्यालय में पार्टी की मीडिया कार्यशाला आयोजित की गयी। इससे पहले राष्टÑीय स्तर पर भाजपा के कार्यकर्ताओं को बकायदा सुझाव देते हुए कहा गया था कि वे मीडिया से मधुर संबंध बनायें। रांची में आयोजित मीडिया कार्यशाला में मुख्यमंत्री रघुवर दास ने जहां सरकार की 100 दिनों की उपलब्धियों का बखान किया वहीं कार्यकर्ताओं को कहा कि वे सरकार की उपलब्धियां लेकर आम जनता के बीच जायें। वहीं पार्टी के प्रवक्ताओं से कहा कि आप पर विशेष जिम्मेवारी है कि आप पार्टी के नीति-सिद्धांत और कार्यों को जनता तक पहुंचायें। असल में भाजपा ने केंद्र स्तर पर ही यह तय कर लिया है कि उनके नेताओं की छवि अच्छी बने, जिससे वे जनता का दिल जीत सकें। इसी कवायद का हिस्सा जनता से जुड़ाव भी है। पार्टी के नेताओं चाहे वह नंदकिशोर यादव हों या मुख्यमंत्री रघुवर दास तथा अन्य कोई मंत्री या विधायक सभी इसी वजह से जनता के बीच पहुंच में हैं। दुर्भाग्य से स्थानीय दलों के नेताओं को इसकी कोई जरुरत महसूस नहीं होती और वह अपनी रिजर्व छवि से बाहर नहीं निकलना चाहते। इसलिए उनसे बातचीत या मुलाकात वाया मीडिया ही होती है। इस प्रक्रिया में जहां नेताओं की प्राइवेसी बरकरार रहती है वहीं यह नुकसान भी होता है कि आम आदमी हो या पार्टी कार्यकर्ता उसकी बात चाहे महत्वपूर्ण हो या सतही वह पार्टी के सुप्रीमो तक पहुंचेगी या नहीं यह पूरी तौर पर कनेक्टिंग लिंक पर निर्भर करती है। हेमंत सोरेन से बात या मुलाकात में कई चैनल काम करता है, कुछ लोग चाहेंगे तभी उनसे बात हो सकती है। वहीं वर्तमान में स्थिति यह है कि रात के ग्यारह बजे भी कोई मुख्यमंत्री रघुवर दास को फोन करेगा तो वह स्वयं फोन उठायेंगे। यह विपक्ष और पक्ष के मुख्य नेताओं की कार्यसंस्कृति का उदाहरण है। अब सवाल यह उठता है बाबूलाल हों या हेमंत ऐसा क्यों करते हैं। दोनों पार्टियों से जुड़े सूत्रो ंने बताया कि दरअसल हेमंत हों या बाबूलाल जनता से कनेक्ट रहने के लिए दोनों तत्पर रहते हैं, पर कई बार उनकी यह आसान उपलब्धता उनके लिए परेशानी खड़ी करती है। कई बार वेवजह भी लोग उनका फोन लगा देते हैं और बेमतलब की अर्थहीन मुलाकात के लिए लोग कोशिश करते हैं। चुनाव की तैयारियों में जुटे ये नेता इन दिनों अपनी-अपनी पार्टियों के लिए जीत की रणनीति बनाने में इतने मशगूल रहते हैं कि उनके लिए आसान और व्यावहारिक रास्ता यही होता है कि वे वाया मीडिया लोगों के संपर्क में रहें।
    एक तरह से यह उनका शौक नहीं, उनकी राजनीतिक मजबूरी है। ऐसा नहीं है कि पहले रघुवर दास भी इसी तरह जनता से जुड़े होते थे। पहले कार्यकर्ता अक्सर शिकायत करते थे कि वे मुस्कुराते नहीं हैं। हमेशा गंभीर रहते हैं। पर समय के साथ मुख्यमंत्री रघुवर दास ने खुद को बदल दिया है। अब उनके चेहरे पर मुस्कान और बातचीत में नम्रता झलकती है। असल में यह उन्हें मिली जिम्मेदारियों का असर है, जिसने उनके व्यवहार में परिवर्तन ला दिया है। विपक्षी दलों के नेता भी इसी तरह जनता के लिए आसानी से रिचेबल हो जायें तो हो सकता है कि जनता तक इनकी पहुंच आसान हो जाये पर जब तक ऐसा नहीं होता वाया मीडिया इन तक पहुंचना जनता हो या कार्यकर्ता दोनों की मजबूरी ही है। पार्टी के नेता हों या कार्यकर्ता फोन पर आसानी से उपलब्धता न होने पर पर जब हेमंत सोरेन का पक्ष जानने के लिए उनके मोबाइल नंबर पर कॉल किया गया, तो तीन बार रिंग होने के बाद भी उन्होंने फोन नहीं उठाया। बाबूलाल मरांडी के नंबर पर भी तीन बार कॉल करके उनका पक्ष जानने की कोशिश की गयी पर नंबर नॉट रिचेबल रहा। यही हाल कांग्रेस के सुबोधकांत सहाय का भी है।

    'Reachable' BJP vs 'Not Reachable' Opposition in Jharkhand
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