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    Home»Jharkhand Top News»कांग्रेस को संजीवनी बूटी की जरूरत
    Jharkhand Top News

    कांग्रेस को संजीवनी बूटी की जरूरत

    azad sipahi deskBy azad sipahi deskJanuary 10, 2021No Comments7 Mins Read
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    मनोज मिश्र
    2019 के आम चुनाव में भाजपा की प्रचंड जीत के छह माह बाद हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के रणनीतिकारों ने एक दांव खेला और शानदार सफलता हासिल की। लेकिन उस सफलता के एक साल बाद अब स्थिति बदल रही है। इसलिए कांग्रेस को अब अपनी रणनीति बदलनी होगी, क्योंकि जनता की अपेक्षाएं बढ़ रही हैं। सरकार में सहयोगी होने के नाते उसकी जिम्मेवारी भी अधिक है। सत्ता हासिल करने के लिए लगातार संघर्ष की जरूरत होती है। पूर्व में कांग्रेस सत्ता की चाबी सत्ता पक्ष की विफलता से हासिल करना चाहती रही है। ऐसे में झारखंड की राजनीति में आनेवाले चार साल बहुत दिलचस्प होंगे।

    कांग्रेस के अंदर तीन तरह की कांग्रेस
    कहा जाता है कि कांग्रेस के अंदर के तीन स्वरूपों को एकाकार करना सबसे जरूरी है। इस समय तीन तरह के कांग्रेसी हैं। इनमें इंदिरा गांधी के समय के, संजय गांधी के समय या इमरजेंसी के कांग्रेसी और तीसरे विपक्ष या राहुल गांधी के कांग्रेसी शामिल हैं। इनमें दूसरे किस्म के कांग्रेसियों को किसी आंदोलन का अनुभव नहीं है और यह पार्टी की सबसे बड़ी समस्या है। इन नेताओं से कांग्रेस को सबसे अधिक नुकसान हुआ है। इसे एकाकार करने के लिए निचले स्तर से काम करना होगा।
    कांग्रेस को चाहिए ब्राह्मण कार्ड
    कांग्रेस के लिए ब्राह्मण वोटर संजीवनी बूटी के समान हैं। लेकिन, कांग्रेस इनके साथ दलितों और अल्पसंख्यकों को साधने में कतई दिलचस्पी नहीं दिखा रही, जबकि झारखंड में करीब 8-10 फीसदी ब्राह्मण मतदाता हैं। कांग्रेस का यह परंपरागत वोट माना जाता था, लेकिन बीजेपी के उभार के बाद ये वोट कांग्रेस से छिटक गया है। ऐसे में कांग्रेस को झारखंड में ब्राह्मण कार्ड के जरिये अपने मतों को और मजबूत करने के मकसद पर गंभीरता से काम करना होगा।
    ….और ब्राह्मणों ने बीजेपी में तलाश लिया ठिकाना
    ब्राह्मणों ने कांग्रेस की कमजोरी के बाद लगभग 20 साल तक राजनीतिक रूप से अनाथ रहने और कभी यहां तो कभी वहां भटकने के बाद 2014 में बीजेपी में अपना ठिकाना तलाश लिया है। उनके पास फिलहाल ऐसा कोई कारण नहीं है कि वे बीजेपी को छोड़कर किसी और पार्टी का दामन थाम लें। ब्राह्मणों के एक हिस्से में बीजेपी से क्षणिक नाराजगी हो सकती है, लेकिन इसका स्तर ऐसा नहीं है कि किसी के लुभाने भर से वे उनके पीछे चल दें। ऐसे में कांग्रेस को ब्राह्मण वोटरों को लुभाने के लिए ठोस रणनीति बनानी होगी।
    देखा जाये तो ब्राह्मण बेशक कांग्रेस से अब पंडित नेहरू, गोविंद वल्लभ पंत, इंदिरा गांधी या नरसिम्हा राव के जमाने की तरह जुड़े हुए नहीं हंै, फिर भी कांग्रेस का पुराना सांगठनिक ढांचा बरकरार है, जिसमें ब्राह्मणों का वर्चस्व कायम है। लेकिन, दुर्भाग्य यह है कि झारखंड में बहुत कम नेता ऐसे हैं, जो सर्वमान्य हैं। आज 65 फीसदी मतदाता युवा हैं, जो नरेंद्र मोदी को जानते हैं। इन युवाओं के लिए कांग्रेस को अपने अंदर बहुत बदलाव लाना होगा। कांग्रेस को बूथ स्तर से संगठन को मजबूत बनाना होगा।
    यहां बता दें कि ब्राह्मणों को लुभाने की तमाम कोशिशों के बावजूद जेएमएम या कांग्रेस झारखंड में ब्राह्मण वोट बैंक में सेंध नहीं लगा पायी है। 2019 के लोकसभा चुनाव में 80 प्रतिशत से भी ज्यादा ब्राह्मणों ने बीजेपी को वोट दिया। राजपूतों का वोटिंग व्यवहार भी इसी तरह का रहा। 2014 के बाद से ही ये सिलसिला चला आ रहा है, जो 2019 के विधानसभा चुनाव में भी जारी रहा। सवर्ण बीजेपी के कोर वोटर हैं, जिनकी बुनियाद पर बीजेपी बाकी जातियों और समुदायों को जोड़ती है। ब्राह्मण वोटर 2014 के बाद से लगातार बीजेपी के साथ हैं।
    बीजेपी की शानदार है ब्राह्मण राजनीति
    बीजेपी ब्राह्मणों की चिंताओं और उनसे जुड़े मुद्दों पर लगातार काम कर रही है। मिसाल के तौर पर, बीजेपी लगातार संदेश दे रही है कि उसके राज में मुसलमानों का तुष्टिकरण नहीं होगा। अनुच्छेद 370 निरस्त किया जा चुका है और जम्मू-कश्मीर को बांट दिया गया है। इस तरह कश्मीरी पंडितों और ब्राह्मणों के आहत मन पर मरहम लगाने की कोशिश की गयी है।
    कांग्रेस को नीति स्पष्ट करनी होगी
    बीजेपी का कोर वोटर मन से आरक्षण विरोधी है। उसकी मान्यता है कि ब्राह्मण वर्चस्व वाली प्राचीन समाज व्यवस्था को फिर से कायम करने के लिए आरक्षण को खत्म या कमजोर करना जरूरी है। बीजेपी टुकड़े-टुकड़े में ये काम कर रही है। संविधान के मूल स्वरूप में आर्थिक आधार पर आरक्षण की कोई व्यवस्था नहीं थी। गरीबी के नाम पर सवर्णों को आरक्षण देने के लिए बीजेपी ने संविधान में संशोधन कर इडब्ल्यूएस आरक्षण लागू कर दिया। बेशक कांग्रेस ने इसका स्वागत और समर्थन किया, लेकिन इससे लाभान्वित होने वाले जानते हैं कि ये काम कांग्रेस कभी नहीं करती। ऐसे में कांग्रेस को इस संदर्भ में नीति स्पष्ट करनी होगी।
    कांग्रेस और उसकी सीमाएं….
    बीजेपी जितना आगे बढ़कर ब्राह्मणों का तुष्टिकरण कर रही है, वह कर पाना कांग्रेस और जेएमएम के लिए संभव नहीं है। बीजेपी ने धार्मिकता और मुस्लिम विरोध के नाम पर अपने बाकी वोट को जोड़े रखा है और इसकी वजह से उसके लिए हदों से बढ़कर ब्राह्मण हित में काम करना संभव हो पा रहा है। जबकि कांग्रेस और जेएमएम को अपने कोर वोट की भी चिंता सताती है। कांग्रेस को दलित-मुस्लम वोट और जेएमएम को जनजातीय वोट को बचाये रखने के लिए भी सोचना पड़ता है। ये बात उन्हें एक सीमा से बढ़कर ब्राह्मण तुष्टिकरण करने से रोकती है। अगर ये दल एक सीमा से आगे बढ़कर ब्राह्मणों के लिए काम करेंगे, तो इनका कोर वोट खिसक सकता है।
    कांग्रेस को धनबाद-गिरिडीह को साधने की जरूरत
    कांग्रेस में राजपूत, ब्राह्मण और भूमिहार जाति के दावेदारों के बीच धनबाद और गिरिडीह लोकसभा सीट का समीकरण घूमता रहा है। इन्हीं तीनों जातियों में से कोई एक यहां कांग्रेस का परचम बुलंद करने का हौसला रखता है। लेकिन विडंबना यह है कि कांग्रेस ने इन तीनों जातियों को दरकिनार किया है। कई नेता उभरे, लेकिन उन्हें अपेक्षित समर्थन नहीं मिला।
    ओबीसी बहुल संसदीय क्षेत्र होने के बावजूद गिरिडीह से अब तक मात्र चार बार ही कुरमी प्रत्याशी की जीत हुई है। साल 2019 से पहले छह चुनाव यहां से रवींद्र पांडेय चुनाव जीते। वह ब्राह्मण जाति से आते हैं। साल 2019 संसदीय चुनाव में भाजपा ने यह सीट गठबंधन के साथी आजसू पार्टी को दे दी और चंद्रप्रकाश चौधरी जीते। इससे पहले बिनोद बिहारी महतो ने गिरिडीह संसदीय क्षेत्र का प्रतिनिधित्व 1991 में किया था। उनके निधन के बाद राज किशोर महतो उप चुनाव जीते। इसके बाद से इस सीट से चार बार रवींद्र कुमार पांडेय जीते। केवल बीच में एक बार 2004 में यह सीट झामुमो के टेकलाल महतो ने जीती थी। बिनोद बिहारी महतो, राज किशोर महतो और टेकलाल महतो को छोड़ दें, तो अन्य सभी विजेता कोयला क्षेत्र से जुड़े रहे हैं। इसमें भाजपा के रामदास सिंह भी शामिल हैं। उन्होंने इस क्षेत्र का नेतृत्व दो बार किया है। कांग्रेस के सरफराज अहमद भी एक बार जीते हैं। बिंदेश्वरी दुबे भी यहां के सांसद रह चुके हैं।
    धनबाद : कांग्रेस- बीजेपी में टक्कर
    धनबाद सीट पर कांग्रेस- बीजेपी में टक्कर होती रही है। धनबाद लोकसभा सीट पर शहरी मतदाताओं का दबदबा है। यहां अनुसूचित जाति की तादाद 16 फीसदी और अनुसूचित जनजाति की तादाद 8 फीसदी है। इसके अलावा उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल के लोगों की अच्छी आबादी है। इस संसदीय क्षेत्र के तहत 6 विधानसभा सीटें, बोकारो, सिंदरी, निरसा, धनबाद, झरिया और चंदनकियारी आती हैं। इनमें से झरिया पर कांग्रेस की विधायक हैं। बाकी चार सीटें बीजेपी के खाते में हैं। यहां के कुल 18.89 लाख मतदाताओं को अपने पाले में करने के लिए कांग्रेस को जमीनी स्तर पर गांव-गांव और गली-गली जाकर कांग्रेस संगठन को मजबूत करना होगा। सियासत में उभर रहे युवाओं को सींचना होगा, ब्राह्मण, दलित मतदाताओं का ध्रुवीकरण कर कांग्रेस के जनाधार को मजबूत करना होगा।
    कांग्रेस नेतृत्व ने कीर्ति आजाद को धनबाद से 2019 में उतारा। 2004 में कांग्रेस के ददई दुबे ने रीता वर्मा को हराया था, इसलिए कांग्रेस को लगा कि इस सीट को कोई ब्राह्मण उम्मीदवार ही पार्टी की झोली में डाल सकता है। इसलिए कीर्ति आजाद को दरभंगा से धनबाद लाकर दांव खेला गया, लेकिन यह दांव उल्टा गया। वामपंथी पहले से जुझारू तथा कर्मठ नेता के अभाव में बीजेपी के हो गये थे। यहां के ब्राह्मणों ने भी कांग्रेस को दरकिनार करना उचित समझा और भाजपा को पांच लाख वोट का इजाफा इसका परिणाम साबित हुआ।

    Congress needs Sanjeevani Booti
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