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    Home»Breaking News»मां के ज्ञान से समाज को रोशन करने निकल पड़े हैं दीपक बंका
    Breaking News

    मां के ज्ञान से समाज को रोशन करने निकल पड़े हैं दीपक बंका

    azad sipahiBy azad sipahiNovember 24, 2021No Comments13 Mins Read
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    कभी मां के इलाज के लिए नौकरी छोड़ दी थी, आज 500 लोगों का परिवार चला रहे हैं

    • माताजी के शब्द: जिस तरह तुमने मेरे लिए अपना करियर त्याग दिया, भगवान सब देख रहा है, वह तुम्हें सूद समेत वापस करेगा
    • शिक्षा की ज्योति, बच्चों में संस्कार, गरीबों के प्रति स्नेह और समाज के लिए समर्पित व्यक्तित्व का नाम है दीपक बंका

    नाम दीपक बंका। परिचय: शारदा ग्लोबल स्कूल के संचालक, रियल इस्टेट कारोबारी, बिजनेस कंसलटेंट, चार्टर्ड अकाउंटेंट, सामाजिक कार्यकर्ता और अपनी मां से बहुत प्रेम करनेवाला बेटा और सेवक।

    रांची ही नहीं, पूर्वी भारत के एक सफल व्यवसायी दीपक बंका का जन्म 11 जनवरी 1973 को रांची में हुआ। उनके पिताजी का नाम गौरी शंकर बंका था। दीपक बंका का मानना है कि उन्होंने जिंदगी में जो सफलता पायी है, उसका पूरा श्रेय उनकी माताजी को जाता है। दीपक बंका झारखंड में बिजनेस के क्षेत्र में बहुत ही अच्छा कार्य कर रहे हैं। वह शारदा ग्लोबल नाम से स्कूल भी चला रहे हैं। वह रियल एस्टेट के व्यापार में भी एक्टिव हैं। बिजनेस कंसलटेंट भी हैं। वह सामाजिक कार्य से भी सीधे जुड़े हैं। एक वक्त था, जब उन्होंने अपनी माता के लिए इंडियन आयल की नौकरी छोड़ दी थी। वह भी उस समय, जब एक-एक पैसे के महत्व को वह समझते थे। मां के भक्त दीपक बंका के सिर से पिता का साया मात्र पांच साल की उम्र में ही उठ गया था। बहुत ही कष्ट से उनकी माता ने उन्हें पढ़ाया-लिखाया। दीपक बंका को आज अच्छी तरह याद है कि मां ने कैसे पाई-पाई जोड़ी और उन्हें इस लायक बनाया कि आज उन्होंने पांच सौ से भी अधिक लोगों को रोजगार प्रदान किया है। न्यू इंडिया में न्यू जेनरेशन का कैसे विकास हो, उसके लिए शारदा ग्लोबल स्कूल के माध्यम से वह आनेवाली पीढ़ी को तैयार कर रहे हैं। उस स्कूल के बच्चों को सिर्फ किताबी ज्ञान ही नहीं, भारत की संस्कृति और विरासत को संजोये रखने के गुर सिखाये जाते हैं। आइये, आज उसी विजनरी दीपक बंका के बारे में जानते हैं, जो भारतीय संस्कृति, तहजीब और विकास के मंत्र अपने सीने में संयोये झारखंड के विकास में प्रयत्नशील हैं। यह कहानी खुद दीपक बंका ने आजाद सिपाही के विशेष संवाददाता राकेश सिंह के साथ शेयर की।

    दीपक बंका की पूरी पढ़ाई-लिखाई रांची में ही हुई है। प्रारंभिक शिक्षा रांची के शहीद चौक स्थित रतन लाल तारा चंद जैन स्कूल से हुई। उसके बाद उन्होंने कक्षा छह से लेकर दस तक की पढ़ाई मारवाड़ी हाइस्कूल से की। उन्होंने संत जेवियर्स कॉलेज से कॉमर्स की पढ़ाई पूरी की। उसके बाद उन्होंने चार्टर्ड अकाउंटेंट की पढ़ाई की। उनका कैंपस प्लेसमेंट हुआ और उन्हें इंडियन आयल में नौकरी मिल गयी। 1999 में नौकरी मिलते ही उनकी पहली पोस्टिंग गुजरात के राजकोट में हुई। उस वक्त इंडियन आयल भारत की सर्वश्रेष्ठ कंपनियों में से एक नवरत्न की श्रेणी में आती थी। एकाउंट्स आॅफिसर के रूप में दीपक बंका को अच्छा-खासा पैकेज भी मिल रहा था। फ्लैट, गाड़ी, कई लोग उनके नीचे में काम भी कर रहे थे। करीब एक साल की ही जॉब में वह अच्छे से सेटल भी हो गये थे। दीपक बंका कहते हैं कि रांची से निकले हुए व्यक्ति के लिए यह तो एक सपना जैसा ही था। वहां की चमक-दमक मुझे अपने साथ नये- नये सपनों की दुनिया में ले जाने को बैचेन थी। लेकिन उनकी लाइफ में एक और ट्रेजडी सामने आ खड़ी हुई। उनकी माताजी को कैंसर हो गया था। एक और ट्रेजडी इसलिए, क्योंकि पहली ट्रेजडी तब हुई थी, जब दीपक बंका महज पांच साल के थे। पांच साल की उम्र में दीपक बंका के सिर से पिता का साया उठ गया था। उस वक्त दीपक बंका की माता जी को समझ में नहीं आ रहा था कि क्या किया जाये, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। उन्होंने परिवार की कमान संभाली और आगे बढ़ाया। दीपक बंका जब इंडियन आॅयल की नौकरी में राजकोट में अच्छे से सेटल हो गये थे और आगे का फ्यूचर बहुत ही ब्राइट लग रहा था, तभी एक फोन कॉल ने उनके पैरों तले की जमीन खिसका दी। उस फोन कॉल से सूचना मिली कि उनकी माताजी को कैंसर हो गया है। दीपक बंका मेंटली बहुत डिस्टर्ब हो गये। उन्हें लग रहा था, मानो उनसे उनका संसार ही कोई छीन रहा हो। दीपक बंका बिना कंपनी को बताये फौरन रांची आ गये। वह बहुत ही भावुक होकर बता रहे थे कि मेरे तो पिता भी नहीं थे। सिर्फ मां ही थी और उसे भी कैंसर हो गया। कैंसर सुनते ही डर लग जाता है। मैंने माताजी का ट्रीटमेंट शुरू किया। कुछ दिन रांची में इलाज चला। फिर कोलकाता, दिल्ली, मुंबई सब जगह गया। एक से डेढ़ साल का समय लगा। फिर मेरी मां ठीक हो गयीं और वह सर्वाइव भी कर गयीं, लेकिन इन डेढ़ सालों में मेरी जॉब चली गयी, क्योंकि कोई भी कंपनी इतनी लंबी छुट्टी तो देगी नहीं। कंपनी ने बहुत कोशिश भी की कि आप ज्वाइन कर लीजिए, लेकिन मैं अपनी मां को कैसे छोड़ सकता था। आखिर मुझे त्यागपत्र देना पड़ा। उन दिनों रांची में बहुत बड़े एडवोकेट हुआ करते थे शिव कुमार पोद्दार। वह मेरे पिता तुल्य थे। दीपक बंका कहते हैं कि वह आज जो भी हैं, उनकी ही बदौलत हैं। फिर उन्होंने अपना मोबाइल का डिस्प्ले दिखाया, जहां स्क्रीन पर उनकी तस्वीर लगी हुई थी। कह सकते हैं कि वह मेरे गॉड फादर थे। जब मेरी मां कैंसर से ठीक हो गयीं, तब तक मैं फाइनेंशियली पूरे तरीके से खत्म हो गया था। मैं रोड पर था, इसे कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। जो भी सेविंग्स थे, वह मां के इलाज में ही खत्म हो गये। बस मेरे दिमाग में था कि मेरी मां कैसे भी ठीक हो जायें, क्योंकि मेरी पूंजी मेरी मां ही थीं। ऐसे विकट समय में शिव कुमार पोद्दार जी ने मेरे ऊपर अपना हाथ रखा और कहा, तुम मेरा आॅफिस ज्वाइन कर लो और काम शुरू करो। दीपक बंका कहते हैं कि मैं शुरू से ही सुबह जल्दी उठ जाता हूं और आज भी पांच बजे ही उठ जाता हूं। मेरा रूटीन यही है कि मैं सुबह छह बजे ही आॅफिस चला जाता हूं और काम शुरू कर देता हूं। काम जल्दी खत्म कर मैं सोशल वर्क में लग जाता हूं। चूंकि मैंने अपनी जिंदगी में इतनी तकलीफ सही है, तो मैं समझता हूं कि अगर ईश्वर ने मुझे कुछ करने की ताकत दी है, तो मैं सेवा का कार्य जरूर करूं। मैं उन दिनों दस बजे से लेकर रात आठ बजे तक शिव कुमार पोद्दार जी के यहां काम करने लगा। लेकिन एक काम मैं जरूर करता था कि मैं कोई भी काम कल के लिए पेंडिंग नहीं रखता था। यदि कोई फाइल कंप्लीट नहीं होती थी या मेरा भी कोई काम हुआ करता था, तो रात आठ बजे से मैं उस काम में लग जाता था। उस दौरान दो-तीन घंटे मैं खुद के लिए निकाल लिया करता था। कुछ मेरे पर्सनल क्लाइंट भी थे। उनका काम मैं आॅफिस से आने के बाद किया करता था। धीरे-धीरे मेरे पर्सनल क्लाइंट्स की भी संख्या बढ़ने लगी और मेरी मेहनत से, ईश्वर के आशीर्वाद से मेरी गाड़ी ठीक-ठाक चल निकली। जैसा कि मैंने कहा कि पोद्दार साहब बहुत बड़े वकील थे। उनका पूर्वी भारत में बहुत नाम था। उनके चलते मैं बहुत ही बड़े-बड़े क्लाइंट्स के संपर्क में आया। मेरा भाग्य कहिये कि मुझे बहुत ही जल्द बड़े-बड़े क्लाइंट्स का काम मिलने लगा। शिव कुमार पोद्दार जी की विशेषज्ञता थी इनकम टैक्स में सर्च मैटर और रेड। उस काम में उन्होंने मेरी एंट्री करवा दी। इसके बाद मेरी भी विशेषज्ञता इनकम टैक्स में सर्च केसेस हो गयी। उसके बाद बहुत लंबे समय तक मैंने सर्च और रेड केसेस को देखा। रांची, जमशेदपुर, धनबाद और झारखंड के हर बड़े जिले में मेरा काम चलने लगा। इस दौरान मुझे जिंदगी की बहुत बड़ी सीख भी मिली। यह सीख थी कि मां की सेवा कभी व्यर्थ नहीं जाती। मेरी मां आज इस दुनिया में नहीं हैं। आज वह मुझे ऊपर से देख रही होंगी, लेकिन जब वह जिंदा थीं, तब वह कहा करती थीं कि बेटा, जिस तरह तुमने मेरे लिए अपना करियर त्याग दिया, भगवान सब देख रहा है। वह तुम्हें सब सूद समेत वापस देगा। तुम कभी भी निराश मत होना। मेरा मानना है कि जो भी मैंने आज तक अचीव किया है, वह मेरी मां के आशीर्वाद के कारण ही हुआ है। आज मेरा आॅफिस रांची, पटना, जशपुर, कोलकाता और दूसरी कई जगहों पर है। जब मुझे लगा कि अब मैं बहुत कुछ अचीव कर चुका हूं, तो लगा कि समाज ने मुझे बहुत कुछ दिया है। अब मेरी बारी है समाज तो वापस देने की। ऐसे बहुत सारे एनजीओ हैं, सोसाइटी हैं, ट्रस्ट हैं, जिनका मैं फाउंडर हूं या ट्रस्टी हूं या पदधारी हूं। इसी के माध्यम से हम समाज सेवा का काम करते हैं। काम करते-करते मैंने पाया कि झारखंड में शिक्षा के क्षेत्र में बहुत सारी संभावनाएं हैं। झारखंड में शुरू से ही शिक्षा का स्तर बहुत अच्छा रहा है। यहां से बहुत ऐसे स्टूडेंट्स हुए हैं, जो देश-विदेश में नाम कर रहे हैं। भारत में जो टॉपर्स भी हुए, उनमें झारखंड के स्टूडेंट्स की संख्या भी अधिक रही। लेकिन ये बात सच है कि झारखंड में शिक्षा के माध्यम बहुत सारे नहीं थे। अच्छे इंजीनियरिंग कॉलेज, मेडिकल कॉलेज, कोचिंग इंस्टीट्यूट, शिक्षा का इंफ्रास्ट्रक्चर, जो होना चाहिए, वह झारखंड में अभी पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं है। जब मैंने पाया कि शिक्षा के क्षेत्र में झारखंड बहुत अच्छा कर सकता है, तो मैं और कुछ लाइक माइंडेड सोच वाले, जो समाज के लिए कुछ करना चाहते थे, के साथ आगे बढ़ा। आज कांके के बुकुड़ू में हम ट्रस्ट के अंदर एक स्कूल चला रहे हैं, जिसका कैंपस 10 एकड़ में फैला है। इस स्कूल का नाम है शारदा ग्लोबल। आज इस स्कूल में करीब तीन हजार बच्चे पढ़ रहे हैं। यहां करीब 135 शिक्षक हैं और नन टीचिंग स्टाफ की संख्या भी 80 है। शारदा ग्लोबल स्कूल बनाने के पीछे का कारण पैसे कमाना नहीं है। इस स्कूल का विजन है कि जो बच्चे यहां पढ़ रहे हैं, वही हमारा कल हैं। कैसे हम इस स्कूल के माध्यम से भारत का फ्यूचर निर्माण करें, यही इस स्कूल का विजन है। कल कोई अच्छा डॉक्टर बने, इंजीनियर बने, अच्छा स्पोर्ट्समैन बने और समाज को कैसे आगे लेकर जाये, नये भारत में कैसे नया मुकाम हासिल कर देश का नाम रोशन करे, यही इस स्कूल बनाने के पीछे की मंशा है। आगे मैं शिक्षा के क्षेत्र में और काम करना चाहता हूं। मैं चाहता हूं कि झारखंड शिक्षा के क्षेत्र में बहुत आगे बढेÞ। इसके लिए मेरे पास कई योजनाएं हैं, जो आगे चल कर धरातल पर भी नजर आयेंगी। हम शारदा ग्लोबल स्कूल में शिक्षा के साथ-साथ भारतीय परंपरा और संस्कृति को बताने का काम करते हैं। हम बच्चों को यह बताते हैं कि आपके माता-पिता आपके लिए कितने पूज्य होने चाहिए। उनका आशीर्वाद आपके लिए क्या मायने रखता है। इसी कड़ी को आगे बढ़ाते हुए मैं कुछ जोड़ना चाहता हूं। हम अपने स्कूल में ग्रैंड पेरेंट्स डे करते हैं। बच्चों को बोलते हैं कि आप अपने दादा-दादी को लेकर आइये। इस ग्रैंड पेरेंट्स डे में हम उनके दादा-दादी को सम्मानित करते हैं। इस सम्मान के पीछे का कारण भी भारत का वह संस्कार है, जो आज के मॉडर्न बच्चों को समझना बहुत जरूरी है। बच्चों को यह समझना जरूरी है कि उनके माता पिता, उनके दादा-दादी भगवान स्वरूप हैं। उनकी सेवा ही असली शिक्षा है। सिर्फ किताब पढ़ना ही शिक्षा ग्रहण करना नहीं। हम शारदा ग्लोबल के माध्यम से भारतीय परंपरा, भारतीय विरासत और भारत के संस्कार क्या हैं, उनसे बच्चों को अवगत करवाते हैं।

    आजकल के बच्चों में जेनरेशन गैप बहुत ज्यादा है। पेरेंट्स और बच्चों के जो माइंडसेट है, उसमें भी बहुत गैप है। आजकल के बच्चे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, मॉडर्न टेक्नोलॉजी से बहुत ज्यादा गाइडेड हैं। इसी कारण उनका ज्यादा समय कंप्यूटर और मोबाइल पर ही गुजरता है। तो असली शिक्षा तो माता या पिता ही देते हैं और वही शिक्षा उनसे दूर हो रही है। मेरा वही प्रयास है कि बच्चे मॉडर्न टेक्नोलॉजी को जरूर अपनायें, लेकिन माता-पिता का जो समय है, वह उनका ही होना चाहिए। क्योंकि जिंदगी के असली और पहले शिक्षक तो वही हैं।

    सवाल : आपके लिए सफलता का क्या मतलब है?
    दीपक बंका का मानना है कि सफलता की कोई परिभाषा लिखित नहीं हो सकती। सभी लोग या यूं कहें कि सभी वर्ग के लोगों के लिए सफलता के अलग-अलग मायने हैं। जैसे एक रिक्शा वाले की सफलता उसकी एक दिन की कमाई है। वह अगर एक सौ या दो सौ रुपये घर लेकर जाता है, तो उसकी सफलता यह है कि उसने आज अपने और परिवार का पेट भरने का जुगाड़ कर लिया। वहीं देश के सबसे बड़े उद्योगपति मुकेश अंबानी के लिए सफलता किसी प्रोजेक्ट में करोड़ों रुपये का फायदा हो सकता है। मेरे हिसाब से सक्सेस को पैसे के रूप में नहीं देखा जा सकता। मेरे लिए पहले सफलता हुआ करती थी कि मैं सीए बन जाऊं, मैं अपनी माता का इलाज ठीक तरीके से करा पाऊं। समाज को सेवा भाव के जरिये वापस करूं, जो कुछ मुझे मिला है। कोई स्टूडेंट के लिए होता है कि वह मैट्रिक पास कर ले। किसी के लिए होता है कि वह 90 प्रतिशत से ऊपर मार्क्स लाये। सफल इंसान वही होता है, जो समाज, माता-पिता और खास कर अपनी नजरों में सफल हो। उसकी सफलता से अगर समाज को फायदा मिल रहा है, तो वह इंसान सफल है। उसकी सफलता से उसका परिवार हंस रहा है, तो वह सफल है। सफलता मन का सुख है, न कि धन का सुख।

    सवाल : आप सीए भी हैं, तो आपको इकोनोमिकल ग्रोथ के बारे में ज्यादा पता होगा। झारखंड कितना इकोनोमिकल ग्रोथ कर पाया।
    मैं सीए प्रोफेशन में भी हूं, स्कूल भी चलाता हूं, रियल इस्टेट का भी काम कर रहा हूं, मैं बिजनेस कंसलटेंट का भी काम करता हूं। मैं बहुत एक्टीवली काफी सारे प्रोजेक्ट्स से जुड़ा हूं। मैं ये बातें अच्छी तरह से समझ सकता हूं कि झारखंड बनने से लेकर और आज जहां खड़ा है, उसकी क्या स्थिति है। झारखंड जबसे बना है, इसका ग्रोथ हुआ है, इसमें कोई दो राय नहीं है। लेकिन झारखंड में जो अपार संभावनाएं हैं, उसे देख लगता है कि झारखंड देश में आर्थिक रूप से बहुत विकसित हो सकता है। झारखंड में शिक्षा, स्वास्थ्य, उद्योग के क्षेत्र में बहुत उज्ज्वल संभावना है। झारखंड में जो खनिज संपदा है, वह भारत निर्माण के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। कुछ साल पहले आर्सेलर मित्तल भी झारखंड की ओर देख रहे थे, लेकिन बात नहीं बन पायी। झारखंड के साथ दो और राज्य बने, उत्तराखंड और छत्तीसगढ़, लेकिन जिस तरीके से वहां डेवलपमेंट हुआ, उसकी तुलना में झारखंड पिछड़ गया। झारखंड तभी बुलंदियों को छुयेगा, जब यहां पर लोगों के लिए बुनियादी सुविधाएं मजबूत हों। झारखंड एक टैलेंटेड राज्य है। हर क्षेत्र में यहां से लोग भारत में अपना लोहा मनवा रहे हैं। चाहे वह शिक्षा का क्षेत्र हो, खेल का क्षेत्र हो, मेडिकल का क्षेत्र हो, मीडिया का क्षेत्र हो, हर फील्ड में यहां से लोग शीर्ष स्थान पर विराजमान हैं या हुए हैं। इसीलिए मैं कहता हूं कि हम अगर झारखंड में एक बार बुनियादी ढांचा मजबूत कर लें। तब हमारी स्वास्थ्य, शिक्षा, खेल सब खुद-ब-खुद विकास की और बढ़ने लगेंगे।

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