पटना: बिहार में विधान परिषद की शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्र की आठ सीटों पर होने वाला चुनाव इस बार बेहद दिलचस्प होने जा रहा है। बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव में जीत के बाद जन सुराज के प्रशांत किशोर ने सभी आठ सीटों पर उम्मीदवार उतारने का ऐलान किया है। उनकी एंट्री से एनडीए और महागठबंधन के सामने नई चुनौती खड़ी हो गई है।

मुख्य बिंदु

  • बिहार विधान परिषद की 8 सीटों पर होने वाला है चुनाव

  • चार स्नातक और चार शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों में मुकाबला

  • प्रशांत किशोर ने सभी आठ सीटों पर उम्मीदवार उतारने का किया ऐलान

  • पटना स्नातक सीट पर नीरज कुमार के सामने बढ़ी चुनौती

  • अनंत सिंह ने नीरज कुमार के खिलाफ अनुज सिंह को मैदान में उतारा

  • महागठबंधन के पास फिलहाल दो शिक्षक सीटें

  • सीमित मतदाता संख्या के कारण व्यक्तिगत संपर्क और वोट मैनेजमेंट अहम

PK की एंट्री से बढ़ी राजनीतिक हलचल

बांकीपुर उपचुनाव में जीत के बाद प्रशांत किशोर ने विधान परिषद की सभी आठ सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी शुरू कर दी है। जन सुराज की ओर से अलग-अलग निर्वाचन क्षेत्रों में बैठकें की जा रही हैं और जल्द उम्मीदवारों के नाम घोषित किए जाने की बात कही गई है।

प्रशांत किशोर की सक्रियता ने पारंपरिक राजनीतिक दलों की चिंता बढ़ा दी है। खासकर उन सीटों पर मुकाबला रोचक हो गया है, जहां एनडीए या महागठबंधन के उम्मीदवार लंबे समय से मजबूत स्थिति में रहे हैं।

पटना स्नातक सीट पर सबसे ज्यादा नजर

पटना स्नातक निर्वाचन क्षेत्र इस बार सबसे चर्चित सीटों में शामिल है। इस सीट से जदयू के मुख्य प्रवक्ता नीरज कुमार लगातार तीन चुनाव जीत चुके हैं और अब चौथी बार मैदान में हैं।

हालांकि, इस बार उन्हें पार्टी के अंदर से ही चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। मोकामा के पूर्व विधायक अनंत सिंह ने नीरज कुमार के खिलाफ अनुज सिंह को मैदान में उतारने का ऐलान किया है। अनुज सिंह इससे पहले जन सुराज के टिकट पर नवादा से विधानसभा चुनाव लड़ चुके हैं।

इस समीकरण के बीच प्रशांत किशोर की संभावित रणनीति ने मुकाबले को और त्रिकोणीय बना दिया है।

नीरज कुमार का दावा है कि पटना स्नातक क्षेत्र के 88 हजार मतदाताओं में से बड़ी संख्या में मतदाताओं से उनका सीधा संपर्क है। वहीं, पार्टी नेतृत्व लगातार अंदरूनी मतभेद दूर करने की कोशिश में जुटा है।

जदयू में डैमेज कंट्रोल की कोशिश

अनंत सिंह की नाराजगी के बीच जदयू ने डैमेज कंट्रोल शुरू कर दिया है। प्रदेश अध्यक्ष उमेश कुशवाहा ने नेताओं और कार्यकर्ताओं के साथ बैठक कर चुनावी रणनीति पर चर्चा की है। विधायक दल के नेता श्रवण कुमार को भी अनंत सिंह से बातचीत कर स्थिति सामान्य करने की जिम्मेदारी दी गई है।

जदयू नेतृत्व का कहना है कि पार्टी पूरी मजबूती के साथ चुनाव मैदान में उतरेगी और सभी नेताओं से फीडबैक लेने के बाद आगे की रणनीति तय की जाएगी।

आठ सीटों का क्षेत्रवार गणित

विधान परिषद के शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों की आठ सीटों में चार शिक्षक और चार स्नातक सीटें शामिल हैं।

पटना शिक्षक और स्नातक: इन दोनों सीटों के अंतर्गत पटना, नवादा और नालंदा जिले आते हैं।

सारण शिक्षक: इस सीट में सारण, सीवान, गोपालगंज, पूर्वी चंपारण और पश्चिमी चंपारण के क्षेत्र शामिल हैं।

तिरहुत शिक्षक और स्नातक: मुजफ्फरपुर, सीतामढ़ी, शिवहर और वैशाली इन निर्वाचन क्षेत्रों का हिस्सा हैं।

दरभंगा शिक्षक और स्नातक: दरभंगा, समस्तीपुर, मधुबनी और बेगूसराय जिले इन सीटों में आते हैं।

कोसी स्नातक: यह सबसे बड़े निर्वाचन क्षेत्रों में से एक है। इसमें पूर्णिया, अररिया, कटिहार, किशनगंज, सहरसा, सुपौल, मधेपुरा, भागलपुर, बांका, मुंगेर, लखीसराय, शेखपुरा, जमुई और खगड़िया शामिल हैं।

शिक्षक सीटों पर कितने मतदाता?

शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों में मतदाताओं की संख्या अपेक्षाकृत कम है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार पटना शिक्षक क्षेत्र में करीब 16,689 मतदाता हैं। सारण शिक्षक क्षेत्र में लगभग 10,800, तिरहुत शिक्षक में 9,204 और दरभंगा शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में 8,967 मतदाता पंजीकृत हैं।

कम मतदाता होने के कारण इन सीटों पर उम्मीदवारों के लिए व्यक्तिगत संपर्क और मतदाताओं तक सीधी पहुंच बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है।

स्नातक सीटों पर बड़ा वोट बैंक

स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों में शिक्षक सीटों की तुलना में मतदाताओं की संख्या काफी ज्यादा है। तिरहुत स्नातक क्षेत्र में करीब 1.35 लाख मतदाता हैं, जबकि कोसी स्नातक क्षेत्र में लगभग 1.34 लाख मतदाता पंजीकृत हैं।

दरभंगा स्नातक क्षेत्र में करीब 1.27 लाख और पटना स्नातक क्षेत्र में लगभग 88 हजार मतदाता हैं। इसलिए स्नातक सीटों पर उम्मीदवारों को बड़े क्षेत्र में व्यापक चुनाव प्रचार और मतदाता संपर्क अभियान चलाना होगा।

पटना शिक्षक सीट पर नवल यादव की चुनौती

पटना शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से भाजपा के नवल यादव मजबूत दावेदारों में शामिल हैं। वह इस सीट से पांच बार चुनाव जीत चुके हैं और एक बार फिर मैदान में हैं।

वहीं, महागठबंधन की ओर से पूर्व जदयू विधायक डॉ. संजीव के नाम की चर्चा है, हालांकि आधिकारिक घोषणा अभी नहीं हुई है। प्रशांत किशोर की पार्टी भी यहां उम्मीदवार उतारने की तैयारी में है। ऐसे में इस सीट पर त्रिकोणीय मुकाबले की संभावना बन रही है।

महागठबंधन के कब्जे वाली दो सीटों पर नजर

विधान परिषद की आठ सीटों में फिलहाल दो शिक्षक सीटें महागठबंधन के पास हैं। दरभंगा शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष मदन मोहन झा अपनी स्थिति मजबूत करने में जुटे हैं।

वहीं, तिरहुत शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से CPI के संजय सिंह चुनाव मैदान में हैं। वह 2014 और 2020 में इस सीट से जीत दर्ज कर चुके हैं और तीसरी बार चुनाव लड़ रहे हैं। उन्हें एनडीए के साथ-साथ महागठबंधन के भीतर से संभावित बागी उम्मीदवारों की चुनौती का सामना करना पड़ सकता है।

तिरहुत स्नातक सीट पर भी मुकाबला दिलचस्प

तिरहुत स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में जदयू ने अभिषेक झा को एक बार फिर मौका दिया है। पिछली बार के उपचुनाव में शिक्षक नेता बंशीधर बृजवासी ने जीत दर्ज कर सबको चौंका दिया था। इस बार भी वह चुनावी मैदान में हैं।

प्रशांत किशोर की टीम ने भी इस क्षेत्र में सक्रियता बढ़ा दी है। ऐसे में यहां भी मुकाबला बहुकोणीय होने की संभावना है।

सारण में आफाक अहमद पर दांव संभव

सारण शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में आफाक अहमद ने जन सुराज के समर्थन से उपचुनाव में जीत दर्ज की थी। प्रशांत किशोर इस क्षेत्र में बैठक कर चुके हैं। हालांकि, अभी आधिकारिक उम्मीदवार की घोषणा नहीं हुई है, लेकिन आफाक अहमद को दोबारा मौका दिए जाने की चर्चा है।

2025 विधानसभा चुनाव के बाद बदला माहौल

2025 के विधानसभा चुनाव में एनडीए ने 243 में से 202 सीटों पर जीत दर्ज कर राज्य की राजनीति में अपना दबदबा मजबूत किया था। हालांकि, बांकीपुर उपचुनाव में मिली हार के बाद एनडीए की विधानसभा सीटों की संख्या 201 रह गई है।

इसके बावजूद विधान परिषद की इन आठ सीटों पर मुकाबला विधानसभा चुनाव से अलग है। यहां मतदाताओं का वर्ग सीमित और विशिष्ट है। इसलिए विधानसभा चुनाव का आंकड़ा सीधे तौर पर इन सीटों के नतीजे तय करेगा, ऐसा मानना आसान नहीं होगा।

प्रशांत किशोर के लिए बड़ा सियासी टेस्ट

बांकीपुर की जीत के बाद सभी आठ विधान परिषद सीटों पर चुनाव लड़ने का फैसला प्रशांत किशोर और जन सुराज के लिए बड़ा राजनीतिक परीक्षण माना जा रहा है।

राजनीतिक विशेषज्ञों के मुताबिक शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों में उम्मीदवार की व्यक्तिगत पकड़, मतदाता संपर्क, संगठन और वोटरों को मतदान केंद्र तक पहुंचाने की क्षमता निर्णायक भूमिका निभा सकती है।

अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या प्रशांत किशोर की नई राजनीतिक रणनीति विधान परिषद के चुनाव में भी असर दिखा पाएगी या एनडीए और महागठबंधन अपने पारंपरिक वोट बैंक के सहारे बढ़त बनाए रखेंगे। आठ सीटों पर उम्मीदवारों की अंतिम तस्वीर सामने आने के बाद मुकाबले का असली गणित और स्पष्ट होगा।

Share.
Leave A Reply

Exit mobile version