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    Home»दुनिया»मध्य पूर्व में बढ़ता संघर्ष: 17 लाख नेपाली श्रमिकों और देश की अर्थव्यवस्था पर मंडराता असर
    दुनिया

    मध्य पूर्व में बढ़ता संघर्ष: 17 लाख नेपाली श्रमिकों और देश की अर्थव्यवस्था पर मंडराता असर

    shivam kumarBy shivam kumarMarch 2, 2026No Comments4 Mins Read
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    काठमांड। मध्यपूर्व क्षेत्र में तेज होते संघर्ष का प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष प्रभाव नेपाली अर्थव्यवस्था पर पड़ने की आशंका व्यक्त की जा रही है। इस क्षेत्र में 17 लाख से अधिक नेपाली कार्यरत हैं। संयुक्त अरब अमीरात के रक्षा मंत्रालय के अनुसार वहां एक नेपाली नागरिक की मृत्यु भी हुई है। विशेषज्ञों का कहना है कि इसका असर नेपाली जनजीवन और अर्थव्यवस्था पर अवश्य पड़ेगा। आयात-निर्भर और वैदेशिक रोजगार पर आधारित अर्थव्यवस्था होने के कारण मध्यपूर्व का संघर्ष नेपाल की अर्थव्यवस्था पर बहुआयामी प्रभाव डाल सकता है। नेपाल की अर्थव्यवस्था का प्रमुख आधार रेमिटेंस है, जो वैदेशिक रोजगार के माध्यम से देश में आता है।

    खाड़ी देश नेपाल के प्रमुख श्रम गंतव्य रहे हैं। नेपाल राष्ट्र बैंक की 2025 की एक रिपोर्ट के अनुसार वैदेशिक रोजगार में जाने वाले नेपाली श्रमिकों में से 58.9 प्रतिशत सऊदी अरब, दुबई, कतर सहित खाड़ी देशों में कार्यरत हैं। अर्थविद् डॉ. केशव आचार्य का कहना है कि नेपाल के प्रमुख श्रम गंतव्य क्षेत्र में संघर्ष होने से अर्थव्यवस्था पर सीधा प्रभाव पड़ेगा। उनका कहना है कि रेमिटेंस का अधिकतम हिस्सा खाड़ी देशों से आता है और यदि युद्ध लंबा खिंचता है तो रेमिटेंस में गिरावट की प्रबल संभावना है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि रेमिटेंस में संकुचन आता है तो नेपाल की अर्थव्यवस्था नकारात्मक दिशा में जा सकती है। वर्तमान में नेपाल की अर्थव्यवस्था लगभग 61 खरब 7 अरब रुपये की है, जिसमें रेमिटेंस का हिस्सा 25 प्रतिशत से अधिक है। पिछले आर्थिक वर्ष में नेपाल में 17 खरब 23 अरब 27 करोड़ रुपये रेमिटेंस के रूप में आए थे।

    डॉ. आचार्य के अनुसार, “यदि रेमिटेंस नहीं आएगा तो उस पर निर्भर परिवारों की खर्च करने की क्षमता घटेगी। पहले से सुस्त अर्थव्यवस्था में रेमिटेंस आपूर्ति कम होने पर आर्थिक संकुचन का जोखिम बढ़ जाएगा।” उनका अनुमान है कि यदि खाड़ी देशों से मात्र 5 प्रतिशत रेमिटेंस भी रुक जाता है तो जीडीपी नकारात्मक दिशा में जा सकता है। श्रम विशेषज्ञ डॉ. गणेश गुरुङ का कहना है कि खाड़ी देशों में युद्ध लंबा खिंचने पर प्रतिदिन नेपाल आने वाली रेमिटेंस पर असर पड़ेगा। उनके अनुसार, युद्ध शुरू होते ही संबंधित देशों और नेपाली दूतावासों ने नागरिकों से सुरक्षित स्थानों पर रहने का आग्रह किया है। ऐसे में उद्योग-धंधे बंद होने से आय के स्रोत प्रभावित होंगे और रेमिटेंस में गिरावट आएगी।

    इसी बीच मध्यपूर्व और खाड़ी क्षेत्र की विषम परिस्थिति को ध्यान में रखते हुए नेपाल सरकार ने सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात (यूएई), कतर, कुवैत, बहरीन, ओमान, इराक, यमन, जॉर्डन, लेबनान, तुर्की और इजरायल सहित 12 देशों के लिए वैदेशिक रोजगार की श्रम स्वीकृति अस्थायी रूप से स्थगित कर दी है। खाड़ी देशों को विश्व में तेल भंडार के प्रमुख केंद्र के रूप में देखा जाता है। विश्व की लगभग एक-तिहाई पेट्रोलियम मांग की आपूर्ति इन्हीं देशों से होती है। अर्थविद् डॉ. केशव आचार्य के अनुसार जब तेल उत्पादक देश युद्ध में उलझते हैं, तो पेट्रोलियम आपूर्ति में बाधा उत्पन्न होती है और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें बढ़ने लगती हैं। उनका कहना है कि मांग के अनुरूप आपूर्ति न होने पर वैश्विक स्तर पर तेल के दाम बढ़ जाते हैं। तेल महंगा होने से परिवहन किराया बढ़ता है, जिसका सीधा प्रभाव सभी वस्तुओं की कीमतों पर पड़ता है और व्यापक महंगाई की स्थिति उत्पन्न होती है। नेपाल राष्ट्र बैंक के आंकड़ों के अनुसार चालू आर्थिक वर्ष के जनवरी तक विदेशी मुद्रा भंडार 32 खरब 42 अरब 45 करोड़ रुपये रहा है।

    विशेषज्ञों का कहना है कि तेल महंगा होने पर नेपाल का आयात व्यय बढ़ेगा और निर्यात कमजोर रहने से विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव पड़ेगा। फिलहाल विदेशी मुद्रा भंडार संतोषजनक स्थिति में है, लेकिन यदि रेमिटेंस घटती है और व्यापार घाटा बढ़ता है, तो विदेशी मुद्रा भंडार में संकुचन आ सकता है, जिससे देश की अर्थव्यवस्था और जटिल स्थिति में पहुंच सकती है। वर्तमान युद्ध का प्रभाव नेपाल के पर्यटन क्षेत्र पर भी पड़ने की आशंका है, जो अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान देता है।

    नेपाल नागरिक उड्डयन प्राधिकरण के पूर्व महानिर्देशक राज कुमार क्षेत्री ने कहा कि खाड़ी देशों में युद्ध की स्थिति बनने से नेपाल का पर्यटन व्यवसाय भी प्रभावित होगा। उनके अनुसार नेपाल आने वाले पर्यटकों और विदेश जाने वाले नेपाली नागरिकों के लिए मध्यपूर्व के देश प्रमुख ट्रांजिट मार्ग हैं। कतर एयरवेज, टर्किश एयरलाइंस, फ्लाई दुबई, ओमान एयर, एयर अरेबिया और एमिरेट्स जैसी विमान सेवाएं इन्हीं देशों से संचालित होती हैं। उन्होंने कहा कि युद्ध के कारण इन देशों के हवाई अड्डे बंद हो रहे हैं। यदि युद्ध लंबा खिंचता है तो असुरक्षा के कारण पर्यटक यात्रा करने से हिचकिचाएंगे। ट्रांजिट मार्गों में उड़ान कटौती होने पर अन्य मार्गों से नेपाल पहुंचना महंगा पड़ेगा।

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    shivam kumar

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