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    Home»विशेष»पीढ़ियों के अवसान-उदय का गवाह बनेगा झारखंड का चुनाव
    विशेष

    पीढ़ियों के अवसान-उदय का गवाह बनेगा झारखंड का चुनाव

    shivam kumarBy shivam kumarOctober 24, 2024No Comments7 Mins Read
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    विशेष
    इस बार के चुनावी मैदान में पहली बार उतरने वाले प्रत्याशियों की संख्या बढ़ी
    प्रदेश के कई राजनीतिक परिवारों की विरासत के विस्तार की है पूरी संभावना

    नमस्कार। आजाद सिपाही विशेष में आपका स्वागत है। मैं हूं राकेश सिंह।
    भारतीय लोकतंत्र का चुनावी इतिहास हमेशा से रोमांचक संघर्षों का गवाह रहा है, लेकिन इसके अलावा एक और बात, जो भारत के चुनावों ने कई बार प्रमाणित की है, वह है इसकी अनिश्चितता और मतदाताओं की निर्णय क्षमता। हर चुनाव भारत की लोकतंत्र को मजबूती प्रदान करता आया है, नये किस्से, नये समीकरण और नयी सियासी परिस्थितियों का निर्माण करता रहा है। चुनावों में कई नेता खोते रहे हैं, तो कई नये नेताओं के अभ्युदय का गवाह भी चुनावी मैदान बने हैं। लेकिन ऐसा बहुत कम बार हुआ है कि कोई चुनाव पीढ़ियों के बदलाव का गवाह बने। झारखंड में इस बार का चुनाव ऐसा ही कुछ है, जिसमें पुरानी पीढ़ी के मुकाबले और नयी पीढ़ी के उदय होने के साफ संकेत मिल रहे हैं। राज्य में चुनावी मुकाबले की जो तस्वीर तैयार हो रही है, उससे साफ है कि इस बार मुकाबले में पुरानी पीढ़ी के नेता कम ही दिखेंगे और युवा या पहली बार चुनाव लड़नेवाले नेताओं की क्षमता की अग्निपरीक्षा होगी। झारखंड के चुनावी रण में उतरनेवाले हरेक दल ने इस बार अपने बुजुर्ग नेताओं की अपेक्षा युवाओं को तरजीह दी है। इस चुनाव की एक खास बात यह भी है कि इस बार पहली बार चुनाव लड़नेवाले उम्मीदवारों की संख्या भी अच्छी-खासी है। पहली बार चुनाव मैदान में उतरनेवाले कई प्रत्याशी ऐसे हैं, जो अपने परिवार की विरासत का विस्तार करने के साथ अपनी राजनीतिक पहचान भी स्थापित करेंगे।
    इससे झारखंड की राजनीतिक परंपरा में नया अध्याय शुरू होगा, जो ढाई दशक पुराने इस राज्य के विकास के लिए लाभदायक होगा। राजनीति में परिवारवाद से इतर यह नया राजनीतिक प्रयोग कितना कारगर होगा और क्या हो सकता है इसका असर, बता रहे हैं आजाद सिपाही के विशेष संवाददाता राकेश सिंह।

    भारतीय राजनीति में 1974 के छात्र आंदोलन को बड़ा टर्निंग प्वाइंट माना जाता है। उस आंदोलन की खास बात यह थी कि वह राजनीति में पीढ़ियों के बदलाव का गवाह बना था। जेपी आंदोलन के नाम से मशहूर उस आंदोलन के बाद पहली बार लागू की गयी इमरजेंसी और बाद में गैर-कांग्रेसी दलों का उदय भी उसी आंदोलन का परिणाम माना जाता है। उस आंदोलन के पांच दशक बाद आज जब झारखंड में विधानसभा के चुनाव हो रहे हैं, तो एक बार फिर पीढ़ियों के बदलाव का नजारा सामने दिख रहा है। जेपी आंदोलन ने बिहार से देश को नया संदेश दिया था, तो क्या इस बार झारखंड के चुनाव में वही इतिहास दोहराया जायेगा। अभी यह कहना जल्दबाजी होगी, लेकिन एक बात तय है कि झारखंड की धरती इस बार युवा नेतृत्व के उदय और पुरानी पीढ़ी के अवसान की गवाह जरूर बनेगी।

    यह बात इसलिए भी पक्की है, क्योंकि झारखंड में इस बार चुनाव मैदान में उतरनेवाले युवाओं की संख्या पहले की अपेक्षा बहुत अधिक है। पहली बार चुनाव मैदान में उतरनेवाले इन नेताओं की अग्नि परीक्षा इस बार होगी, जिन्होंने अलग किस्म की परिस्थितियों में अपनी राजनीति शुरू की है। इन युवा और नये चेहरों को चुनाव मैदान में उतारने में कोई भी दल पीछे नहीं है। भाजपा ने सबसे अधिक 21 ऐसे प्रत्याशियों को टिकट दिया है, जो पहली बार चुनाव मैदान में उतर रहे हैं।

    इनमें कुछ चेहरे ऐसे भी हैं, जो सियासत में अपने परिवार की विरासत का विस्तार करेंगे, लेकिन कुछ ऐसे भी हैं, जिन्होंने सियासत की राह पकड़ी है। झामुमो ने भी कम से कम पांच ऐसे प्रत्याशियों को मैदान में उतारा है, जो पहली बार चुनाव लड़ रहे हैं। इनमें पार्टी के दो सांसदों के पुत्र भी शामिल हैं। कांग्रेस और राजद ने भी नये चेहरों पर भरोसा जताया है।

    झारखंड के चुनाव में इस बार कई पुराने चेहरे नहीं दिखेंगे। इनमें से सबसे प्रमुख नाम शिबू सोरेन का है, जो उम्र संबंधी समस्याओं के कारण राजनीतिक नेपथ्य में हैं। पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास और अर्जुन मुंडा भी सीधे तौर पर चुनाव मैदान में नहीं हैं, बल्कि उनके परिजन प्रत्याशी के तौर पर जनता की अदालत में हैं। इसके अलावा जगन्नाथ महतो, हाजी हुसैन अंसारी और राजेंद्र प्रसाद सिंह सरीखे राजनीति के दिग्गज अब हमारे बीच नहीं हैं। इन सबकी कमी जरूर खलेगी। इन सभी नेताओं में एक बात समान रूप से लागू होती है कि इन सभी ने सुदूर गांव और कमजोर आर्थिक पृष्ठभूमि से निकल कर सत्ता के शिखर तक की यात्रा तय कर मिसाल भी कायम की।

    झारखंड के आसन्न चुनाव में इस बार इन युवा नेताओं की खूब चर्चा है। इन युवाओं या यों कहें, नये चेहरों के साथ भी एक बात समान रूप से लागू होती है कि इन्होंने उन परिस्थितियों का सामना कभी नहीं किया, जो उन पुराने नेताओं ने किया था। इन नये चेहरों में से कुछ सन्नी टोप्पो (मांडर से भाजपा प्रत्याशी) जैसे भी हैं, जिन्होंने पार्टी के लिए अपना सब कुछ झोंक दिया, तो कुछ पूर्णिमा दास साहू (जमशेदपुर पूर्वी से भाजपा प्रत्याशी), मीरा मुंडा (पोटका से भाजपा प्रत्याशी), आलोक सोरेन (शिकारीपाड़ा से झामुमो प्रत्याशी) और जगत मांझी (मनोहरपुर से झामुमो प्रत्याशी) जैसे भी हैं, जो अपने परिवार की राजनीतिक विरासत का विस्तार करने के लिए चुनाव मैदान में उतरे हैं। इन सभी में एक समानता यह भी है कि सियासत का सफर न तो इन्होंने गांव से शुरू किया और न आर्थिक तंगी में रहते। ये युवा चेहरे जिन रघुवर दास, नलिन सोरेन और जोबा मांझी की विरासत के विस्तार के लिए राजनीति के मैदान में उतरे हैं, वे बहुत साधारण पारिवारिक पृष्ठभूमि से आये और सियासत की बुलंदियों तक पहुंचे। वैचारिक प्रतिबद्धता और बदलाव की सामाजिक चाहत ने उनकी राह आसान की। इसलिए इनके उत्तराधिकारी बने इन नये चेहरों की राह साधन संपन्नता और मजबूत सियासी संरचना के बावजूद आसान नहीं है।

    इन युवा नेताओं के अलावा कई कई नेता ऐसे भी हैं, जिन्होंने अपने रिश्तेदारों के जरिये भी अपनी मौजूदगी दर्ज कराने के लिए कमर कसी है। यह सभी दलों में हो रहा है। चाहे भाजपा हो या झामुमो, कांग्रेस हो या राजद, सभी पार्टियों में पत्नी, पुत्र-पुत्री या पुत्रवधुओं को टिकट मिला है।

    जहां तक झारखंड की बात है, तो नये चेहरों के चुनाव मैदान में उतरने का सकारात्मक प्रभाव पड़ना स्वाभाविक जान पड़ता है। यदि युवा चेहरे राजनीति के मैदान में सक्रिय होते हैं, तो इसका पहला असर तो यह होगा कि राजनीति के प्रति लोगों का नजरिया बदलेगा। इससे नयी सोच और नये प्रयोगों के लिए जो उत्साह पैदा होगा, उसका सीधा असर झारखंड के विकास पर पड़ेगा। आंध्रप्रदेश में 1995 में जब पहली बार चंद्रबाबू नायडू ने सत्ता संभाली थी, तो कुछ ऐसा ही माहौल था, क्योंकि उस बार वहां की विधानसभा में करीब 30 फीसदी सदस्य पहली बार चुन कर आये थे। झारखंड का राजनीतिक इतिहास तो अभी महज ढाई दशक का है, इसलिए उसके सामने अवसरों का पहाड़ मौजूद है और ये युवा चेहरे यदि चुने गये, तो इनके नेतृत्व में राज्य जरूर तेजी से आगे बढ़ेगा। इतनी बड़ी संख्या में युवा नेताओं के चुनाव मैदान में उतरने से ही साफ हो जाता है कि झारखंड का यह चुनाव दो पीढ़ियों के बीच विरासत के हस्तांतरण का गवाह जरूर बनेगा।
    लेकिन भारतीय मतदाताओं ने वंशवाद की इस परंपरा को बहुत अधिक पसंद नहीं किया है। इसके बावजूद यदि राजनीतिक दल झारखंड में इसे जारी रखे हुए हैं, तो कुछ तो बात जरूर होगी।

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