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    विशेष

    झारखंडी युवा मांगे रोजगार

    azad sipahiBy azad sipahiJune 24, 2021Updated:June 24, 2021No Comments7 Mins Read
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    भारत को दुनिया का सबसे युवा देश कहा जाता है, क्योंकि यहां 18 से 40 साल के लोगों की आबादी दुनिया में सर्वाधिक है। यह युवा आबादी भारत की ताकत है। यह भी हकीकत है कि लोकतंत्र के सबसे बड़े यज्ञ, यानी चुनावों में सभी राजनीतिक दलों का मुख्य मुद्दा युवाओं से संबंधित होता है। युवाओं के लिए सबसे बड़ा सवाल रोजगार और सुरक्षित भविष्य होता है। झारखंड भी इससे अछूता नहीं है। एक युवा मुख्यमंत्री के नेतृत्व में यहां के युवाओं की आकांक्षाएं स्वाभाविक तौर पर हिलोरें मार रही हैं। युवाओं ने सोशल मीडिया पर झारखंड के युवा मांगे रोजगार नाम से एक अभियान शुरू किया है। सरकार भी इसे समझती है और वह इन आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए हरसंभव प्रयास भी कर रही है। वहीं अब इस मुद्दे को लेकर राज्य में सियासत शुरू हो गयी है। इसमें भाजपा राज्य सरकार को घेरना चाह रही है कि हर साल पांच लाख युवाओं को रोजगार देने के वादे का क्या हुआ, तो झामुमो और महागठबंधन में शामिल दल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा हर साल दो करोड़ युवाओं को रोजगार देने के वायदे की याद दिला रहे हैं। इन सबके बीच झारखंड में युवाओं को रोजगार देने का मामला सोशल मीडिया पर ट्रेंड कर रहा है। इसमें झामुमो के विधायक सुदिव्य कुमार सोनू के युवाओं के समर्थन में आने और मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के ट्वीटर हैंडल से उसे रिट्वीट करने से युवाओं को काफी बल मिला है और उनमें आशा भी जगी है। हेमंत सरकार बार-बार कह रही है कि वह अपने वादों को हर कीमत पर पूरा करेगी और उसके अब तक के प्रयास इस दिशा में गंभीर दिख रहे हैं, लेकिन कोरोना महामारी और दूसरी परिस्थितियों ने उसके रास्ते में बाधाएं खड़ी कर दी हैं। फिर भी बेरोजगारों के लिए प्रोत्साहन राशि देने और खाली पड़े पदों पर नियुक्तियों की प्रक्रिया शुरू करना सरकार का सकारात्मक कदम कहा जा सकता है। रोजगार के सवाल पर शुरू हुई इस सियासत के कारणों और परिणाम पर आजाद सिपाही ब्यूरो की खास रिपोर्ट।

    झारखंड इन दिनों शायद पहली बार रोजगार के सवाल पर सियासत का गवाह बन रहा है। अब तक राज्य में बनी हर सरकार युवाओं के इस सबसे बड़े सवाल को अपना चुनावी मुद्दा बनाती रही है, कई वादे भी होते रहे, लेकिन कभी इस वादे को पूरा करने की दिशा में गंभीर प्रयास नहीं हुआ। लेकिन यह सच है कि अब हेमंत सोरेन सरकार ने इस दिशा में प्रयास शुरू किया है। झारखंड के युवाओं के प्रति मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन गंभीर हैं। वह चाहते हैं कि बेरोजगारी की दर कम हो, रोजगार के अवसर अधिक से अधिक बढ़ें। चाहे वह सरकारी क्षेत्र हो या निजी, लेकिन कोरोना वायरस ने सरकार के मंसूबे पर पानी फेर दिया है। सीएम बनने के बाद मुख्यमंत्री ने बेरोजगारों को भरपूर अवसर देने का वादा किया था और वह इस दिशा में काम भी कर रहे हैं। यही वजह है कि वर्ष 2021 को नियुक्ति का वर्ष घोषित किया गया।
    जिस समय इसकी घोषणा हुई थी, उस समय कोरोना की पहली लहर अंतिम चरण में थी। किसी को उम्मीद नहीं थी कि फिर दूसरी लहर आयेगी और तीसरी से मुकाबले की तैयारी भी सरकार को करनी होगी। ऐसे में जीवन बचाना सरकार की प्राथमिकता रह गयी, जो स्वाभाविक था। बाकी चीजों पर से ध्यान हट गया।

    अब इसी को लेकर इन दिनों जमकर ट्विटर वार चला हुआ है। ट्विटर पर भले ही सरकार को घेरने की कोशिश की जा रही हो, लेकिन सच यह है कि कोरोना वायरस के कारण पूरा सिस्टम एक तरह से सही ढंग से नहीं चल पा रहा था। ऐसा नहीं है कि बेरोजगारों के सपने या उनकी उम्मीदों का विरोध है, लेकिन हालात का आकलन करना भी उनकी जवाबदेही है। सरकार भी ट्विटर पर चल रहे युवाओं के अभियान का समर्थन करती दिख रही है। झारखंड के बेरोजगार ‘नियुक्ति वर्ष का करो अंतिम संस्कार’ अभियान चला रहे हैं। ट्विटर पर ‘झारखंडी युवा मांगे रोजगार’ हैशटैग के तहत लाखों की संख्या में युवा ट्वीट कर रहे हैं। अब झारखंड मुक्ति मोर्चा के विधायक सुदिव्य कुमार सोनू ने भी युवाओं की इस मांग का समर्थन किया है। उन्होंने इसे लेकर एक ट्वीट किया है। विधायक ने अपने ट्वीट में ‘नियुक्ति वर्ष का करो अंतिम संस्कार’ का बैनर भी लगाया है। इस ट्वीट में उन्होंने लिखा: कुछ दिनों से सोशल मीडिआ के विभिन्न प्लेटफॉर्म पर झारखंड के युवक और युवतियां नौकरियों के प्रश्न पर उद्वेलित हैं। उनके द्वारा, जिन्होंने मुझे टैग किया और आपके द्वारा चलाये जा रहे हैश टैग ‘झारखंडी युवा मांगे रोजगार’ का मैं पूर्ण रूपेण समर्थन करता हूं। उन्होंने कहा है कि आप धैर्य रखिए, अभी छह महीने बाकी हैं। हमने सिर्फ वायदा नहीं किया है, शपथ ली है और उसे पूरा करेंगे। सत्तारूढ़ दल के विधायक का यह ट्वीट भी बेरोजगार युवाओं का उत्साह बढ़ा रहा है। सरकार की गंभीरता का भी अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि खुद सीएम हेमंत सोरेन ने अपने

    आधिकारिक ट्विटर हैंडल से इसे ट्वीट भी किया है।
    मुख्यमंत्री ने सभी विभागों को यह निर्देश दिया था कि राज्य के विभिन्न विभागों में कितने पद खाली हैं और इसे कैसे भरा जाये, इसकी क्या प्रक्रिया होगी, इसकी जानकारी दी जाये। सब कुछ अधिकारियों को तय करना था, लेकिन झारखंड के अधिकारी हैं कि मानते नहीं। वे अपने तरीके से व्यवस्था को चलाना चाहते हैं। यही वजह है कि यहां नियुक्ति की परीक्षाएं विवादों में रहीं, जो नियम बने, कोर्ट उस पर सवाल खड़ा करता रहा। अधिकारियों की नियुक्ति की अनुशंसा करने वाली राज्य की सबसे बड़ी संस्था जेपीएससी खुद कटघरे में रही है। यही वजह है कि अब तक 20 की बजाय सिर्फ छह परीक्षाएं ही हो पायी हैं। इसके लिए सरकार नहीं, वे अधिकारी दोषी हैं, जो समय-समय पर अपने

    मन मुताबिक विज्ञापन जारी करते हैं।
    इस राज्य में बेरोजगारी के आंकड़े को लेकर अलग-अलग दावे हैं, लेकिन अगर निबंधन कार्यालय के आंकड़े पर जायें, तो करीब आठ लाख बेरोजगार हैं। इनमें तीन लाख से अधिक महिलाओं ने रजिस्ट्रेशन करा रखा है। राज्य में प्राथमिक शिक्षकों के 22 हजार और माध्यमिक शिक्षकों के 16 हजार पद खाली हैं। अन्य विभागों में भी यही स्थिति है। स्वास्थ्य सेवा, कृषि सेवा, पुलिस, खनन विभाग सहित अन्य विभागों में बड़े पैमाने पर पद रिक्त हैं।
    अगर नौकरी देने वाली संस्थाएं अपनी जवाबदेही के अनुसार काम करें, तो यह स्थिति उत्पन्न ही नहीं होगी। अभी झारखंड में करीब डेढ़ लाख पद खाली हैं। पदों को भरने की प्रक्रिया भी शुरू की गयी थी, लेकिन सब कुछ नियमावली के पेंच में फंस गया। जेपीएससी के अलावा तीसरे और चौथे दर्जे की नियुक्ति करने के लिए जवाबदेह संस्था कर्मचारी चयन आयोग भी अपना काम नहीं कर पा रहा है। इसका खामियाजा झारखंड के बेरोजगारों को भुगतना पड़ रहा है। कुछ अधिकारियों का कहना है कि स्थानीय नीति के पेंच के कारण भी नियुक्ति नहीं हो पा रही है। यह सही है कि तीसरे और चौथे दर्जे का पद झारखंड के रहनेवाले लोगों को ही मिलना चाहिए। इसलिए तय है कि यह नियमावली एक बार फिर बदलेगी।

    मुख्यमंत्री ने 2021 को नियुक्ति वर्ष घोषित किया। इसके लिए उन्होंने रिक्त पड़े पदों की जानकारी भी मांगी। जेपीएससी को यह निर्देश दिया कि वह एक साथ परीक्षा आयोजित करे। इसकी तैयारी भी चल रही है। कर्मचारी चयन आयोग भी बड़े पैमाने पर नियुक्ति के लिए जल्दी ही इश्तिहार निकालने वाला है, लेकिन यह नौकरी किसको मिलेगी, यह सब कुछ साफ होना चाहिए और इस दिशा में काम चल रहा है। अभी छह माह बाकी है और इस दौरान बहुत कुछ किया जा सकता है, लेकिन सब कुछ ठीक रहने पर ही ऐसा हो सकता है।

    युवा किसी भी राज्य में बड़ा वोट बैंक होते हैं। कोई भी दल इस तबके को हाथ से निकलने देना नहीं चाहता। यही वजह है कि इस पर भाजपा के नेताओं ने जब ट्वीट किया, तो इसके बाद रिट्वीट की झड़ी लग गयी। पहले बाबूलाल मरांडी, फिर नवीन जयसवाल सहित अन्य नेता सरकार को घेरने की कोशिश करने लगे। इसी बीच झामुमो ने बाबूलाल के ट्वीट के जवाब में केंद्र की भाजपा सरकार द्वारा बड़े पैमाने पर हर वर्ष नौकरी देने के वादे की याद दिलायी गयी। उसके बाद अब धीरे-धीरे यह मामला राजनीतिक रंग पकड़ रहा है। बेरोजगारों को नौकरी कैसे मिले, इस दिशा में सही पहल होनी चाहिए। तभी इसका समाधान निकलेगा, ना कि इस मुद्दे पर राजनीति होनी चाहिए।

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