नई दिल्ली: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने परस्पर सीखने, एक-दूसरे की बात ध्यान से सुनने और निःस्वार्थ भाव से व्यवहार करने के महत्व पर जोर दिया है। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर एक सुभाषितम् साझा करते हुए भारतीय ज्ञान परंपरा में निहित इन मूल्यों को सामने रखा।
प्रधानमंत्री ने साझा किया संस्कृत सुभाषितम्
प्रधानमंत्री मोदी ने लिखा:
“ज्ञानवृद्धाः प्रशंसन्ति शुश्रूषन्तः परस्परम्।
विनिवृत्ताभिसन्धानाः सुखमेधन्ति सर्वशः॥”
इस सुभाषितम् में आपसी संवाद, सीखने की इच्छा और निःस्वार्थ आचरण को जीवन की उन्नति से जोड़ा गया है।
क्या है सुभाषितम् का अर्थ?
सुभाषितम् का भावार्थ है कि जो लोग एक-दूसरे से सीखने और उनकी बात सुनने के लिए हमेशा तत्पर रहते हैं, उनकी विद्वान लोग प्रशंसा करते हैं।
- परस्पर सीखने और सुनने की भावना व्यक्ति को ज्ञानवान बनाती है।
- ऐसे लोग स्वार्थपूर्ण उद्देश्यों और छिपे हितों से दूर रहते हैं।
- निःस्वार्थ भाव से सहयोग और संवाद करने से सकारात्मक संबंध मजबूत होते हैं।
- आपसी सीख और सहयोग से जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में सुख और उन्नति प्राप्त होती है।
भारतीय ज्ञान परंपरा के मूल्यों पर जोर
प्रधानमंत्री मोदी के साझा किए गए इस सुभाषितम् के माध्यम से संवाद, विनम्रता, पारस्परिक सीख और निःस्वार्थ आचरण जैसे मूल्यों को रेखांकित किया गया है। संदेश में इस बात पर जोर है कि दूसरों से सीखने और उनकी बात समझने की प्रवृत्ति व्यक्तिगत तथा सामाजिक विकास का आधार बन सकती है।



