रांची की धड़कनों में आज भी जीवित हैं उदय शंकर ओझा
कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं, जिनकी पहचान केवल उनके पद, संगठन या सार्वजनिक भूमिका से नहीं होती। वे अपने समय के लोगों की स्मृतियों में बसे रहते हैं—किसी के संघर्ष के साथी बनकर, किसी की परेशानी में खड़े होकर, किसी श्रमिक की आवाज बनकर और किसी जरूरतमंद के लिए उम्मीद की किरण बनकर। रांची के चर्चित समाजसेवी तथा राजनीतिक-श्रमिक नेता उदय शंकर ओझा भी ऐसे ही व्यक्तित्व थे। उनकी पुण्यतिथि केवल उन्हें याद करने का अवसर नहीं, बल्कि उस जन सरोकार की स्मृति को पुनर्जीवित करने का दिन है, जिसके लिए उन्होंने अपना सार्वजनिक जीवन समर्पित किया। उदय शंकर ओझा को याद करते हुए सबसे पहले जो बात मन में उभरती है, वह है लोगों के बीच उनकी सहज उपस्थिति। सार्वजनिक जीवन में रहने वाले व्यक्ति और जन सरोकार से जुड़े व्यक्ति में एक महीन अंतर होता है। पहला व्यक्ति लोगों तक पहुंचता है, जबकि दूसरा लोगों के बीच रहता है। ओझा जी की छवि उन लोगों में थी, जिनसे आम आदमी अपनी बात कहने में संकोच नहीं करता था। उनके पास पहुंचने वाले व्यक्ति को यह भरोसा रहता था कि उसकी बात सुनी जायेगी और उसकी समस्या को गंभीरता से लिया जायेगा। रांची जैसे शहर की सामाजिक संरचना को समझने के लिए यहां के छात्र और श्रमिक जीवन को समझना जरूरी है। शिक्षा, औद्योगिक और संस्थागत गतिविधियों के साथ इस शहर में छात्रों और श्रमिक वर्ग की एक लंबी और महत्वपूर्ण भूमिका रही है। ऐसे माहौल में राजनीतिक-श्रमिक नेतृत्व की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो जाती है। उदय शंकर ओझा ने पहले छात्र राजनीति में और फिर इसी क्षेत्र में अपनी सक्रियता के माध्यम से लोगों के बीच अपनी पहचान बनायी। उनके व्यक्तित्व की विशेषता यह थी कि सामाजिक सरोकार और राजनीतिक सक्रियता उनके लिए अलग-अलग रास्ते नहीं थे। राजनीति उनके लिए केवल सत्ता और पद का माध्यम नहीं, बल्कि समाज की समस्याओं को उठाने का एक रास्ता थी। श्रमिकों के सवालों को सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा बनाना और जरूरतमंद लोगों के साथ खड़ा होना उनके सार्वजनिक जीवन की महत्वपूर्ण विशेषताओं में रहा। उनके सहयोगियों और परिचितों के लिए उनकी यही प्रतिबद्धता उनकी सबसे बड़ी पहचान थी। आज उदय शंकर ओझा की पुण्यतिथि पर उनके प्रति श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उनके व्यक्तित्व के विभिन्न पहलुओं को शब्दों में पिरोया है आजाद सिपाही के प्रधान संपादक राकेश सिंह ने।
समय गुजरता है, चेहरे स्मृतियों में बदल जाते हैं और आवाजें धीरे-धीरे अतीत का हिस्सा हो जाती हैं। लेकिन कुछ लोगों की उपस्थिति उनके जाने के बाद भी खत्म नहीं होती। वे अपने कार्यों, संबंधों और लोगों के दिलों में जीवित रहते हैं। उदय शंकर ओझा भी ऐसी ही स्मृति हैं—एक ऐसे सामाजिक और श्रमिक नेता की स्मृति, जिसने अपने सार्वजनिक जीवन को लोगों से जोड़कर देखा। उनकी पुण्यतिथि पर विनम्र श्रद्धांजलि केवल एक औपचारिक वाक्य नहीं, बल्कि उन मूल्यों को याद करने का अवसर है जिनसे उनका सार्वजनिक जीवन जुड़ा रहा। उनकी स्मृतियां आने वाली पीढ़ियों को यह संदेश देती रहें कि समाज में परिवर्तन की शुरूआत अक्सर बड़े मंचों से नहीं, बल्कि किसी जरूरतमंद व्यक्ति के साथ खड़े होने से होती है। पुण्यतिथि पर किसी व्यक्ति को याद करना दरअसल उसके जीवन से संवाद करना है। हम अपने आप से पूछते हैं कि उन्होंने क्या किया, किन लोगों के लिए किया और उनके जाने के बाद उनकी सोच हमारे बीच कितनी जीवित है। उदय शंकर ओझा को श्रद्धांजलि देने का सबसे सार्थक तरीका यही होगा कि समाज के कमजोर वर्गों, श्रमिकों और जरूरतमंद लोगों के प्रति संवेदनशीलता को अपने व्यवहार का हिस्सा बनाया जाये।
छोटी-छोटी घटनाओं ने बड़ा किया उदय शंकर ओझा का कद
संस्मरणों की अपनी एक दुनिया होती है। उसमें बड़े-बड़े भाषणों से ज्यादा महत्व छोटी-छोटी घटनाओं का होता है। किसी मुश्किल समय में मिला साथ, किसी पीड़ित परिवार के दरवाजे तक पहुंच जाना, किसी कर्मचारी या श्रमिक की समस्या को लेकर संबंधित व्यक्ति से बात करना—यही वे प्रसंग हैं, जो वर्षों बाद भी स्मृति में बने रहते हैं। उदय शंकर ओझा की स्मृतियां भी ऐसे ही मानवीय प्रसंगों से जुड़ी हुई हैं। उनके साथ काम करने या उन्हें करीब से जानने वाले लोगों के लिए उनकी पहचान किसी औपचारिक परिचय से कहीं अधिक व्यापक थी।
जनसेवा और मजदूर अधिकार के अमर संवाहक
रांची की आबोहवा में जब-जब जनसेवा, सामाजिक सद्भाव और श्रमिकों के संघर्ष की बात चलती है, तब-तब एक बेबाक, हंसमुख और निर्भीक चेहरा स्वत: ही जेहन में उभर आता है — उदय शंकर ओझा। चर्चित समाजसेवी, जुझारू छात्र और मजदूर नेता और राजनीतिक व्यक्तित्व के रूप में पहचान बनाने वाले उदय शंकर ओझा की पुण्यतिथि केवल एक तिथि मात्र नहीं है, बल्कि वह उन असंख्य मजदूरों, ठेला-खोमचा चालकों और आम नागरिकों के लिए कृतज्ञता व्यक्त करने का दिन है, जिनके जीवन को उन्होंने अपने निस्वार्थ भाव से संवारा था।
संघर्ष से उपजा जुझारू नेतृत्व
उदय शंकर ओझा का जीवन कभी भी सत्ता या पद के इर्द-गिर्द नहीं घूमता था, बल्कि उनका जीवन धरातल पर पसीना बहाने वाले इंसानों की आवाज बनने में बीता। उन्होंने राजनीति और समाजसेवा को करियर नहीं, बल्कि पीड़ित जनता की सेवा का माध्यम माना। पंडरा कृषि बाजार समिति परिसर हो या अपर बाजार की तंग गलियां, उन्होंने हमेशा मजदूरों और छोटे व्यवसायियों के हकों की लड़ाई अगली पंक्ति में खड़े होकर लड़ी। झारखंड जनशक्ति मजदूर यूनियन के माध्यम से उन्होंने संगठित और असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों को एक ऐसी ताकत दी, जिससे प्रशासन और बड़े-बड़े व्यापारी भी मजदूरों के हितों की अनदेखी करने से हिचकते थे। ट्रक मालिक संघ, मंडी व्यापारी और हर तबके के मजदूरों के बीच वे एक भरोसेमंद मध्यस्थ और रक्षक की तरह खड़े रहते थे।
धार्मिक और सामाजिक सद्भाव के प्रतीक
राजनीतिक विचारधाराओं और मजदूर आंदोलनों से परे, उदय शंकर ओझा की एक सबसे बड़ी पहचान रांची के सामाजिक और सांस्कृतिक ताने-बाने को मजबूत करने वाले जन नायक के रूप में थी। वे रांची की प्रतिष्ठित धार्मिक और सामाजिक संस्थाओं के मुख्य आधार स्तंभ थे। महावीर मंडल और रामनवमी शृंगार समिति जैसे संगठनों का उन्होंने सफल नेतृत्व किया। रांची के ऐतिहासिक रामनवमी जुलूस को भव्य, शांतिपूर्ण और अनुशासित रूप देने में उनका योगदान अतुलनीय था। रांची महानगर दुर्गा पूजा समिति एवं चैती महानगर दुर्गा पूजा समिति के अध्यक्ष के रूप में उन्होंने हमेशा धार्मिक सहिष्णुता और आपसी भाईचारे का संदेश दिया। वे हर धर्म और वर्ग के उत्सवों में समान उत्साह से भाग लेते थे। उनका आवास सदैव जरूरतमंदों के लिए खुला रहता था, चाहे किसी गरीब की बेटी की शादी हो, किसी मरीज का इलाज हो या किसी पीड़ित को न्याय दिलाना हो।
राजनीति में बेबाकी और निडरता
राजनीतिक दल से जुड़े होने के बावजूद उनकी छवि किसी एक दलीय सीमा में बंधी नहीं थी। वे दलगत राजनीति से ऊपर उठकर हर पार्टी के नेताओं के साथ आत्मीय संबंध रखते थे। यही कारण था कि उनकी पुण्यतिथि के अवसर पर केवल किसी एक दल के नहीं, बल्कि भाजपा, कांग्रेस और झारखंड मुक्ति मोर्चा सहित सभी विचारधाराओं के शीर्ष नेता एक मंच पर आकर उन्हें नमन करते हैं। वे सही को सही और गलत को गलत कहने का साहस रखते थे। सार्वजनिक मंचों से अपनी बात बेबाकी से रखना और जनहित के मुद्दों पर सरकार या प्रशासन से सीधी टक्कर लेना उनकी कार्यशैली का अहम हिस्सा था।
वह काला दिन, जब थम गयी रांची की धड़कन
सितंबर 2016 में अचानक जब उनके दिल का दौरा पड़ने से असमय निधन की खबर आयी, तो पूरी रांची स्तब्ध रह गयी। एक ऐसा जननेता, जो कुछ घंटे पहले तक लोगों के बीच हंस-बोल रहा था, अचानक हमेशा के लिए खामोश हो गया। उनकी अंतिम यात्रा का दृश्य यह बताने के लिए काफी था कि रांची की जनता के दिल में उनके लिए कितना सम्मान था। हरमू मुक्तिधाम तक निकली उस अंतिम यात्रा में उमड़ी हजारों की भीड़, नम आंखें और सड़कों के किनारे खड़े होकर श्रद्धांजलि देते लोग इस बात का प्रमाण थे कि उन्होंने जीवन में कोई भौतिक धन दौलत नहीं, बल्कि अपार जन-स्नेह कमाया था। उनकी अंतिम यात्रा के सम्मान में अपर बाजार और पंडरा मंडी जैसी बड़ी व्यापारिक मंडियों की दुकानें स्वत:स्फूर्त बंद रही थीं।
अमर विरासत और प्रेरणा
आज जब वे हमारे बीच भौतिक रूप से उपस्थित नहीं हैं, तब भी उनकी कार्यशैली और विचार रांची की आबोहवा में जिंदा हैं। पंडरा कृषि बाजार समिति परिसर में हर वर्ष आयोजित होने वाली श्रद्धांजलि सभा में उमड़ने वाली श्रमिकों की भीड़ इस बात का सबूत है कि सच्चे जनसेवक कभी मरा नहीं करते।
उदय शंकर ओझा आज हमारे बीच भौतिक रूप से नहीं हैं, लेकिन उनकी स्मृति उन लोगों के अनुभवों में जीवित है, जिनके जीवन को उन्होंने किसी न किसी रूप में छुआ। यही किसी सामाजिक कार्यकर्ता और जननेता की सबसे बड़ी उपलब्धि है। पुण्यतिथि पर उन्हें शत-शत नमन।

