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    Home»Breaking News»हर सम्मान से ऊपर है झारखंड की माटी का यह नायाब हीरा
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    हर सम्मान से ऊपर है झारखंड की माटी का यह नायाब हीरा

    azad sipahiBy azad sipahiDecember 1, 2021No Comments12 Mins Read
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    गुरुजी के सरकारी आवास को हेरीटेज बिल्डिंग में बदलने का फैसला

    झारखंड के सबसे बड़े नेता और इसकी सवा तीन करोड़ आबादी के अकेले ‘दिशोम गुरु’ के रांची स्थित सरकारी आवास को हेरीटेज बिल्डिंग में बदलने का फैसला कर शिबू सोरेन को एक और सम्मान दिया गया है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की सरकार ने यह फैसला कर झारखंड के जनमानस की उस भावना को ठोस रूप प्रदान किया है, जो गुरुजी से बेपनाह प्यार करता है। गुरुजी अब केवल झारखंड के नेता नहीं हैं, बल्कि एक ऐसी शख्सियत हैं, जिन्होंने हमेशा अलग लकीर खींची है। चाहे सामाजिक आंदोलन हो या राजनीतिक, शिबू सोरेन का तरीका हमेशा से अलग रहा है। महाजनी प्रथा और आदिवासियों में नशापान की बुरी लत के खिलाफ अभियान चलानेवाले शिबू सोरेन ने राजनीति में भी अद्भुत शालीनता का परिचय दिया है। अपने पांच दशक के राजनीतिक जीवन में उन्होंने शायद ही अपने किसी राजनीतिक विरोधी के लिए नकारात्मक बातें कही हैं। यही कारण है कि सभी राजनीतिक दलों में उनके लिए बराबर का सम्मान है। झारखंड की माटी का यह नायाब हीरा दरअसल हर उस सम्मान का हकदार है, जो झारखंड की हवाओं की खुशबू से होकर गुजरती है। केवल झारखंड के लिए जीनेवाले इस शख्स को दिया जानेवाला हर सम्मान खुद उस सम्मान का सम्मान है। शिबू सोरेन को दिये जानेवाले इस सम्मान की पृष्ठभूमि में दिशोम गुरु के व्यक्तित्व पर रोशनी डालती आजाद सिपाही के विशेष संवाददाता राहुल सिंह की खास रिपोर्ट।

    झारखंड ही नहीं, पूरे भारत के जनजातीय समाज में ‘दिशोम गुरु’ के रूप में प्रख्यात शिबू सोरेन भारतीय राजनीतिक क्षितिज के वह चमकते सितारे हैं, जिनकी चमक दिन बीतने के साथ बढ़ती ही गयी। भारत की दो राजनीतिक पीढ़ियों का गवाह बना यह शख्स भारतीय जनमानस में एक किंवदंती बन चुका है। शिबू सोरेन रांची के जिस सरकारी आवास में रहते हैं, उसे झारखंड सरकार ने हेरीटेज बिल्डिंग के रूप में विकसित करने का फैसला कर झारखंड की माटी के इस नायाब हीरे को नहीं, बल्कि झारखंड की सवा तीन करोड़ जनता का सम्मान किया है।
    शिबू सोरेन दुनिया के सबसे लोकतंत्र के अकेले ऐसे नेता हैं, जो आक्रामक राजनीति के इस दौर में भी कभी अपने विरोधियों के खिलाफ कुछ नहीं बोलते। शांत, संयत और शालीन तरीके की राजनीतिक कार्यशैली ही उन्हें दूसरों से अलग करती है और यही कारण है कि वह जननेता कहे जाते हैं। सत्ता के लिए राजनीतिक खुंटचालों को चिमटे से भी नहीं छूनेवाले शिबू सोरेन आज भी निस्पृह तरीके से अपना काम कर रहे हैं। राजनीतिक गहमा-गहमी से परे झारखंड की राजनीति का यह युगपुरुष आज भी रांची में अपने आवास पर निश्छल मुस्कान लिये बैठा रहता है, अपने उन लोगों के लिए, जो हर पल उसके दिलों के करीब होते हैं। झारखंड का हर व्यक्ति इसीलिए गुरुजी को प्यार करता है, क्योंकि उसे पता है कि यह एक व्यक्ति उसके हर दुख-दर्द को दूर करने का माद्दा रखता है।

    शिबू सोरेन के जीवन में कहानियां ही कहानियां हैं। उनका जीवन का हर दिन नयी कहानी लिखता है। जिस तरह से चट्टानें हजारों साल का इतिहास अपने सीने में संजोये रखती हैं, उसी तरह दिशोम गुरु का जीवन किस्सों-कहानियों और असंख्य दुखों से रंगा हुआ है। वह संघर्ष और आंदोलन की जीती-जागती मिसाल हैं। अपने जीवन काल में ही इतिहास पुरुष बन चुके शिबू सोरेन को जानते-समझते हुए सैकड़ों संघर्ष याद आने लगते हैं, जो अपनी माटी, पहाड़, पेड़, पानी और जिंदगी की हिफाजत में लड़े गये। हजारों कविताएं बादल बन कर आकाश को ढंक लेती हैं। याद आने लगते हैं सिदो-कान्हू, तिलका मांझी, बिरसा और तानाजी भगत और याद आने लगती हैं सिनगी दई। अपनी धरती की हिफाजत के लिए आदिवासियों की अनगिनत शहादतों से मस्तिष्क में उजास फैलने लगता है।
    प्रेरणा देता है गुरुजी का संघर्ष

    दिशोम गुरु का संघर्ष हमेशा प्रेरित करता है। उनकी सादगी विरल है। उनकी आंखें अब भी उतनी ही सपनीली हैं, जितनी पहले हुआ करती थीं। बदलाव के तमाम झंझवातों और दबावों में वह आज भी कई मायनों में पहले जैसे ही हैं। एक व्यक्ति और एक राजनेता के रूप में उनके जीवन में इतने उतार-चढ़ाव आये हैं कि कभी-कभी आश्चर्य होता है कि इतना सब कुछ एक ही व्यक्ति के साथ घटित कैसे हो पाया। उनके एक जीवन में कई जिंदगियों की कहानियां सांस ले रही हैं। उनका जीवन फिल्म और उपन्यास के लिए उपयुक्त है। हालांकि ‘समर शेष है’ और ‘रेड जोन’ जैसे उपन्यास लिखे जा चुके हैं, फिर भी साहित्यकारों के लिए दिशोम गुरु अभी भी जिंदा इतिहास के एक ऐसे पात्र हैं, जिनके व्यक्तित्व और कृतित्व के कई पहलुओं पर लिखा जाना अभी बाकी है। जयपाल सिंह मुंडा से लेकर शिबू सोरेन तक भारत की राजनीति, दलित और आदिवासी नेताओं के लिए हमेशा दुरूह रही है। उनकी अगवानी हमेशा जटिल परिस्थितियों ने की है। राजनीति में आने के बाद दिशोम गुरु को भी तमाम जटिल परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। मगर उन्हें राजनीति में लाने के लिए वही परिस्थितियां जिम्मेदार हैं, जिन्होंने उनका बचपन कांटों से भर दिया था।

    बचपन में महाजनों-सूदखोरों ने छीना पिता का साया
    रांची से लगभग 70 किलोमीटर दूर रामगढ़ जिले के गोला से एक पतली-सी सड़क पहाड़ों पर नागिन की तरह डोलती जाती है। यह सड़क जहां खत्म होती है, वहीं एक गांव है नेमरा। वहीं एक छोटा-सा रेलवे स्टेशन है, जिसका नाम है बड़गल्ला। इसी नेमरा में शिबू सोरेन का जन्म 11 जनवरी, 1944 को हुआ। नेमरा गांव विशालकाय चंदू पहाड़ के बीच बसा हुआ है। गांव के आसपास महाजनों-बनियों की अजगर सी कतारें फैली हुई हैं। चंदू पहाड़ से शिबू सोरेन का बड़ा गहरा नाता है, क्योंकि इसी पहाड़ के आंचल में उनके पिता सोबरन मांझी की समाधि है, जिनकी महाजनों और बनियों ने 27 नवंबर, 1957 को हत्या कर दी थी।

    शिक्षाप्रेमी थे सोबरन मांझी
    सोबरन मांझी, ज्योतिराव फुले की तरह निडर और शिक्षा प्रेमी अध्यापक थे। वे अपने समुदाय के लोगों को हड़िया पीने से रोकते थे। पढ़ा-लिखा आदिवासी महाजनी सभ्यता को आज भी खटकता है, पहले भी खटकता था। सोबरन मांझी की रुचि राजनीति में भी थी और वे अपने आसपास के आदिवासियों को अंधविश्वास से दूर करने का प्रयास भी कर रहे थे। उन्हें (सोबरन मांझी) अपने संथाल भाइयों की गरीबी परेशान करती थी। वे जानते थे कि जब तक हमारे अपने दारू पीना बंद नहीं करेंगे, तब तक उनका भला नहीं हो सकता। इनकी जमीनें और इनके घर की इज्जत की सबसे बड़ी दुश्मन हड़िया है। दूसरी तरफ महाजन लोग आदिवासियों को कर्ज देकर एक का डेढ़ वसूलने में लगे हुए थे। कर्ज़ न चुका पाने की स्थिति में वे उनकी जमीनें हड़प लेते थे और आसपास महुआ लगवाकर लोगों को दारू का लती बनाने में लगे हुए थे। गाफिल आदिवासी अपनी जमीनें खोकर अपनी ही जमीन पर मजदूरी करने को मजबूर हो रहे थे। आदिवासी किसान, मजदूर बनते जा रहे थे और बिना काम किये सूदखोर जातियां दिन-प्रतिदिन अमीर होती जा रही थीं। सोबरन मास्टर अपने समाज को समझाने में सफल हो रहे थे। उनकी सफलता महाजनों को पच नहीं पा रही थी। इसलिए वे सोबरन मास्टर के आने-जाने पर नजर रखने लगे। कई दिन की रेकी के बाद 27 नवंबर, 1957 का वह दिन आ गया, जिस दिन अहले सुबह सोबरन मांझी गोला के एक हॉस्टल में रहकर पढ़नेवाले अपने दो बेटों, राजाराम और शिबू को राशन, गुड़ और चूड़ा पहुंचाने के लिए निकले। महाजनों ने चंदू पहाड़ी के पास सोबरन मास्टर का कत्ल कर दिया। उस समय शिबू लगभग 12 साल के थे। पिता के कत्ल ने उनके जीवन को बदल कर रख दिया। पति के कातिलों को सजा दिलाने के लिए सोनामणि (शिबू सोरेन की मां) भटकती रहीं। साथ-साथ मेहनत करके बच्चों को पालती भी रहीं। साल पर साल बीतते गये, मगर सोबरन मांझी के कातिलों को सजा नहीं मिली।

    चिंगारी से जली मशाल
    इस पूरी घटना का किशोर शिबू सोरेन पर गहरा प्रभाव पड़ा। थोड़ा बड़ा होते ही शिबू सोरेन ने दुश्मनों को नहीं, बल्कि दुश्मनी पैदा करने वाली व्यवस्था अर्थात महाजनी सभ्यता को समाप्त करने के लिए ‘धनकटनी आंदोलन’ छेड़ दिया और आदिवासियों के मन में यह बात बिठा दी कि जल-जंगल-जमीन पर उनका प्राकृतिक अधिकार है। इस आंदोलन ने महाजनी सभ्यता की नींव को खोखला कर दिया। साथ ही साथ धरती की लूट से बचाने वाले दूसरे आंदोलन (कोयलांचल की कोयला माफिया के खिलाफ लड़ाई) भी इस आंदोलन से जुड़ते चले गये। एक महाआंदोलन खड़ा होने से महाजनी सभ्यता की नुमाइंदगी करने वाले परेशान हो गये। इसी क्रम में बिनोद बिहारी महतो और एके राय से भी शिबू सोरेन का मिलना हुआ। झारखंड की भूमि की लूट को रोकने के लिए सांगठनिक प्रयास के रूप में 1972 में झारखंड मुक्ति मोर्चा का जन्म हुआ।

    पहला सार्वजनिक भाषण
    झामुमो के स्थापना के मौके पर अपने संबोधन में गुरुजी ने कहा था, मुझे झारखंड मुक्ति मोर्चा का महासचिव बनाया गया है। पता नहीं मैं इस योग्य हूं भी या नहीं। लेकिन मैं अपने मृत पिता की सौगंध खाकर कहता हूं कि शोषणमुक्त झारखंड के लिए अनवरत संघर्ष करता रहूंगा। हम लोग दुनिया के सताये हुए लोग हैं। अपने अस्तित्व के लिए हमें लगातार संघर्ष करते रहना पड़ा है। हमें बार-बार अपने घरों से, जंगल से और जमीन से उजाड़ा जाता है। हमारे साथ जानवरों जैसा बर्ताव किया जाता है। हमारी बहू-बेटियों की इज्जत से खिलवाड़ किया जाता है। दिकुओं के शोषण, उत्पीड़न से परेशान होकर हमारे लोगों को घर-बार छोड़कर परदेस में मजूरी करने जाना पड़ता है। हरियाणा-पंजाब के ईंट के भट्ठों में, असम के चाय के बागानों में, पश्चिम बंगाल के खलिहानों में मांझी, संथाली औरतें, मरद मजूरी करने जाते हैं। वहां भी उनके साथ बंधुआ मजदूरों जैसा व्यवहार किया जाता है। यह बात नहीं कि हमारे घर, गांव में जीवन यापन करने के साधन नहीं, लेकिन उन पर बाहर वालों का कब्जा है। झारखंड की धरती का, यहां की खदानों का दोहन कर, उनकी लूट-खसोट कर नये शहर बन रहे हैं। जगमग आवासीय कॉलोनियां बन रही हैं और हम सब गरीबी-भुखमरी के अंधकार में धंसे हुए हैं। लेकिन अब यह सब नहीं चलेगा। हम इस अंधेरगर्दी के खिलाफ संघर्ष करेंगे। (टुंडी द्वारा विनोद कुमार, पृष्ठ -40)

    नया सामाजिक प्रयोग
    दिशोम गुरु ने आदिवासी समाज के लिए धनकटनी आंदोलन के माध्यम से सूदखोरी करने वाले महाजनों से बहुत सारी जमीन अर्जित कर ली। लहलहाती फसलों को काटकर आश्रम में रखा जाने लगा। ‘सभी को काम और सभी को आराम’ के सिद्धांत पर सामुदायिक खेती शुरू की गयी। लोगों को काम के साथ-साथ पढ़ाया भी जाने लगा। रात्रिकालीन स्कूलों की स्थापना से आदिवासियों को अक्षर ज्ञान दिया गया। औरतों की हाथों के हुनर को निखारने के लिए उन्हें मौका दिया जाने लगा। रचनात्मक होने के कारण झामुमो का कारवां विशाल होता जा रहा था। परंतु बड़ी राजनीतिक परिघटना के घटित होने के पहले ही 26 जून, 1975 को पूरे देश में आपातकाल लगा दिया गया, जिसका असर झामुमो और गुरुजी पर भी पड़ा।

    इसलिए कहलाये दिशोम गुरु
    शिबू सोरेन ने महाजनी प्रथा के खिलाफ बड़े आंदोलन की शुरूआत की और आदिवासी समाज में जागृति लाने के लिए अभियान प्रारंभ किया। पोखरिया आश्रम में रहने के दौरान ही उन्हें जनजातीय समाज की ओर से दिशोम गुरु की संज्ञा दी गयी। अलग झारखंड राज्य आंदोलन के दौरान संथाल परगना, छोटानागपुर, कोयलांचल और कोल्हान इलाके में उनकी तूती बोलती थी। सिर्फ नगाड़े (पारंपरिक वाद्य यंत्र) की आवाज सुनकर ही लोग शिबू सोरेन के संदेश को सुनने के लिए एकत्रित हो जाते थे।

    आपातकाल और शिबू सोरेन
    आपातकाल ने झामुमो को उसी तरह डंस लिया, जिस तरह बाढ़ के पानी के सहारे घर में घुस आया सांप घर की संचालन शक्ति अर्थात घरनी को डंस लेता है और बिना किसी कसूर के घरनी मारी जाती है तथा घर अनाथ हो जाता है। झामुमो के आंदोलन के कारण महाजनों से टकराहट होती रहती थी। दुश्मनों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही थी और इसी बीच चिरूडीह कांड हो गया, जिसमें कई आदिवासियों के साथ महाजनों के पक्ष के दर्जन भर आदमी मारे गये, जो अल्पसंख्यक समुदाय से थे। इसके साथ-साथ शिबू सोरेन दूसरे कई मामलों में आरोपी हो चुके थे। वे दिन-प्रतिदिन कानून के शिकंजे में फंसते चले जा रहे थे। उन्हें जिंदा या मुर्दा पकड़ने तक की बात भी प्रशासन में उठने लगी थी। झामुमो द्वारा किये जा रहे आंदोलनों, जिसमें उनके कई साथी मारे गये थे से, वे लगातार कमजोर महसूस करते जा रहे थे। आपातकाल के दौरान पूंजीवाद और महाजनी सभ्यता के लोग अवसर का इस्तेमाल तमाम जनवादी संगठनों को मिटाने में करने लगे थे। प्रशासन से उनको किसी न किसी रूप में सहयोग मिल रहा था। वे शिबू सोरेन को रोकना चाहते थे। इसी क्रम में केबी सक्सेना को उपायुक्त बनाकर धनबाद भेजा गया। उनके कहने पर एवं साथियों की मौत और झामुमो के बिखरते भविष्य को देखते हुए शिबू सोरेन ने आत्मसमर्पण कर दिया। कुछ दिन धनबाद जेल में रखने के बाद उन्हें मुक्त कर दिया गया।

    रोमांचक है रिहाई की कहानी
    धनबाद जेल से शिबू सोरेन की रिहाई की वह घटना भी बेहद रोमांचक है। उनकी रिहाई नाटकीय अंदाज में हुई। एक रात धनबाद जेल का सायरन बज उठा और सोरेन को जेल से निकाल कर एक बख्तरबंद गाड़ी में किसी अज्ञात स्थल पर ले जाया गया। इंदिरा गांधी और संजय गांधी के करीबी बिहार के एक शीर्ष नेता से उनकी लंबी बातचीत हुई और उसके बाद उन्हें मुक्त कर दिया गया।

    शिबू सोरेन से उम्मीदें बरकरार
    जेल से मुक्त होकर शिबू सोरेन मुख्यधारा की राजनीति में हिस्सा लेने लगे। सार्वजनिक राजनीति में रहते हुए उन्हें अपने बड़े बेटे दुर्गा सोरेन को खोना पड़ा। उनकी राजनीति का दायरा बढ़ा और वे केंद्र में मंत्री भी बनाये गये। फिर तीन बार झारखंड के सीएम भी बने। शिबू सोरेन ने 1980 में दुमका से लोकसभा का पहला चुनाव जीता। बाद में वह 1989, 1991, 1996, 2002, 2004, 2009 और 2014 में भी दुमका संसदीय क्षेत्र से चुने गये। वर्ष 2002 में वह राज्यसभा के लिए भी चुने गये। दूसरी बार 2020 में वह संसद के उच्च सदन के लिए चुने गये।

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