-लंबे संगठनात्मक अनुभव के साथ बूथ से लेकर आदिवासी बेल्ट तक संगठन को मजबूत करना बड़ी परीक्षा
भारतीय जनता पार्टी ने झारखंड संगठन में बड़ा बदलाव करते हुए पवन साय को प्रदेश महामंत्री (संगठन) की जिम्मेदारी सौंपी है। इससे पहले वे छत्तीसगढ़ भाजपा के संगठन महामंत्री की भूमिका में थे। झारखंड में उनके सामने संगठन को नयी ऊर्जा देने, चुनावी हार के बाद कार्यकतार्ओं का मनोबल मजबूत करने और आदिवासी बहुल इलाकों में पार्टी की राजनीतिक पकड़ को फिर से विस्तार देने जैसी कई जिम्मेदारियां होंगी। राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा ने इसी फेरबदल के तहत झारखंड के संगठन महामंत्री रहे कर्मवीर सिंह को छत्तीसगढ़ भेजा है, जबकि सौदान सिंह को फिर से झारखंड में संगठनात्मक समन्वय की जिम्मेदारी दी गयी है।
पवन साय के लिए अपरिचित नहीं है झारखंड
पवन साय के लिए झारखंड पूरी तरह अपरिचित जमीन नहीं है। छत्तीसगढ़ से उनका संगठनात्मक अनुभव और लंबे समय तक संघ-भाजपा के ढांचे में काम करने की पृष्ठभूमि उनके लिए उपयोगी हो सकती है। वे करीब एक दशक तक छत्तीसगढ़ भाजपा के प्रदेश संगठन महामंत्री रहे और 2023 के विधानसभा तथा 2024 के लोकसभा चुनावों में पार्टी के संगठनात्मक कामकाज में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। लेकिन झारखंड की सामाजिक और राजनीतिक संरचना छत्तीसगढ़ से कई मायनों में अलग है। यही अंतर उनके सामने पहली बड़ी परीक्षा होगा।
चुनावी आंकड़ों से शुरू होती है चुनौती
पवन साय जब झारखंड पहुंचे हैं, तब भाजपा के सामने सबसे महत्वपूर्ण संदर्भ 2024 का विधानसभा चुनाव है। 81 सदस्यीय विधानसभा में भाजपा को 21 सीटें मिलीं, जबकि झारखंड मुक्ति मोर्चा को 34 और कांग्रेस को 16 सीटें मिलीं। झामुमो-कांग्रेस-राजद गठबंधन ने कुल 56 सीटें हासिल कीं। भाजपा का वोट प्रतिशत 33.2 प्रतिशत रहा, यानी उसका जनाधार पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ, लेकिन वह सीटों में पर्याप्त रूपांतरण नहीं कर सका।
यहीं पवन साय की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। संगठन महामंत्री का काम केवल चुनाव के समय रणनीति बनाना नहीं होता। बूथ से लेकर मंडल तक संगठन को सक्रिय रखना, कार्यकर्ताओं और नेतृत्व के बीच संवाद कायम करना, चुनावी आंकड़ों का विश्लेषण करना और सामाजिक समूहों के बीच पार्टी की पहुंच बढ़ाना इस जिम्मेदारी का हिस्सा है। इसलिए उनके सामने मूल सवाल यह होगा कि भाजपा के पास मौजूद वोट को व्यापक सामाजिक और भौगोलिक समर्थन में कैसे बदला जाये।
आदिवासी राजनीति सबसे बड़ी कसौटी
झारखंड की राजनीति में आदिवासी मतदाताओं की भूमिका केंद्रीय है। 2024 के लोकसभा चुनाव में राज्य की सभी पांच अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सीटें विपक्षी गठबंधन के खाते में गयीं, जबकि भाजपा और उसके सहयोगी दलों ने कुल 14 में से नौ सीटें जीतीं। यह अंतर बताता है कि सामान्य और आदिवासी सीटों के बीच पार्टी के प्रदर्शन में महत्वपूर्ण भिन्नता रही। यही स्थिति विधानसभा चुनाव में भी रही। राज्य की 28 आरक्षित सीटों में से भाजपा केवल एक सीट जीत सकी। स्थानीयता, आदिवासी अस्मिता और आदिवासियों से जुड़े दूसरे भावनात्मक मुद्दों पर भाजपा बुरी तरह पिछड़ गयी। इस परिस्थिति में पवन साय के सामने सिर्फ संगठन खड़ा करने की चुनौती नहीं है, बल्कि यह समझने की भी चुनौती है कि आदिवासी समाज के विभिन्न हिस्सों में पार्टी के प्रति राजनीतिक धारणा किन मुद्दों से प्रभावित हो रही है। जल-जंगल-जमीन, वनाधिकार, स्थानीय रोजगार, विस्थापन, खनन, सरना धर्म कोड, आदिवासी पहचान और स्थानीय नेतृत्व जैसे प्रश्न झारखंड के राजनीतिक विमर्श में लगातार मौजूद हैं। इन मुद्दों पर पार्टी का संदेश और स्थानीय स्तर पर उसके नेताओं की विश्वसनीयता, दोनों संगठनात्मक रणनीति का हिस्सा बनेंगे।
शहरी आधार बनाम ग्रामीण विस्तार
भाजपा के लिए झारखंड में एक दूसरा महत्वपूर्ण प्रश्न उसके शहरी और ग्रामीण आधार के बीच संतुलन का है। 2024 में रांची जैसी शहरी सीटों पर भाजपा का प्रदर्शन मजबूत रहा। रांची विधानसभा सीट पर भाजपा के चंद्रेश्वर प्रसाद सिंह ने 54 प्रतिशत से अधिक मत हासिल किये। लेकिन ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में पार्टी को अपेक्षित सफलता नहीं मिली। ऐसे में पवन साय को संगठन का विस्तार उन इलाकों तक करना होगा, जहां पार्टी का चुनावी प्रदर्शन कमजोर रहा है। यह काम केवल बड़े नेताओं की सभाओं से संभव नहीं होगा। बूथ समितियों की सक्रियता, स्थानीय कार्यकर्ताओं की उपलब्धता, पंचायत और प्रखंड स्तर पर नियमित संपर्क तथा स्थानीय मुद्दों पर निरंतर उपस्थिति संगठन के लिए महत्वपूर्ण होगी।
स्थानीय नेतृत्व के साथ तालमेल
झारखंड भाजपा में प्रदेश अध्यक्ष, विधायक दल के नेता, सांसदों और संगठन के बीच बेहतर तालमेल भी पवन साय की प्राथमिक चुनौतियों में शामिल होगा। संगठन महामंत्री का पद राजनीतिक रूप से चुनाव लड़ने वाले नेता की भूमिका से अलग है। यहां समन्वय और संगठन निर्माण प्रमुख है। इसलिए स्थानीय नेताओं की महत्वाकांक्षाओं और केंद्रीय संगठन की प्राथमिकताओं के बीच संतुलन बनाना जरूरी होगा। यह चुनौती इसलिए भी अहम है, क्योंकि झारखंड की राजनीति में क्षेत्रीय नेतृत्व की अपनी मजबूत भूमिका है। भाजपा को राज्य में अपना राजनीतिक आधार बढ़ाने के लिए राष्ट्रीय मुद्दों के साथ स्थानीय नेतृत्व और स्थानीय सवालों को भी समान महत्व देना होगा। पवन साय की संगठनात्मक क्षमता की वास्तविक परीक्षा इसी समन्वय में होगी।
छत्तीसगढ़ का अनुभव कितना काम आयेगा
पवन साय के पक्ष में उनका छत्तीसगढ़ का लंबा संगठनात्मक अनुभव है। वहां लंबे समय तक संगठन में काम करने के कारण उन्हें बूथ प्रबंधन, कार्यकर्ता नेटवर्क और चुनावी तैयारी का अनुभव मिला है। रिपोर्टों में उनके कार्यकाल को 2023 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के प्रदर्शन से भी जोड़ा गया है। लेकिन किसी दूसरे राज्य का मॉडल हूबहू झारखंड में लागू नहीं किया जा सकता। दोनों राज्यों में आदिवासी समाज की संरचना, क्षेत्रीय पहचान, दलों का इतिहास और स्थानीय राजनीतिक मुद्दे अलग हैं। इसलिए साय के सामने अपने पुराने अनुभव को झारखंड की परिस्थितियों के अनुरूप ढालने की चुनौती होगी।
2024 के परिणामों से आगे की रणनीति
2024 के विधानसभा चुनाव का एक महत्वपूर्ण संकेत यह भी है कि भाजपा का वोट प्रतिशत 33.2 प्रतिशत रहा, जो उसके लिए एक बड़ा आधार है। लेकिन सीटों की संख्या 21 तक सीमित रही। इसका अर्थ यह है कि संगठन के सामने केवल मत प्रतिशत बढ़ाने की चुनौती नहीं, बल्कि मौजूदा मतों को सीटों में बदलने की चुनावी दक्षता बढ़ाने की भी चुनौती है। इसके लिए उम्मीदवार चयन, स्थानीय समीकरण, सहयोगी दलों के साथ सीटों का तालमेल, बागी उम्मीदवारों से निपटना और कमजोर बूथों की पहचान जैसे विषय महत्वपूर्ण होंगे। 2024 में निर्दलीय उम्मीदवारों और छोटे दलों को भी उल्लेखनीय मत मिले। एडीआर के आंकड़ों के अनुसार निर्दलीय उम्मीदवारों का वोट शेयर 6.3 प्रतिशत और झारखंड लोकतांत्रिक क्रांतिकारी मोर्चा का 6.1 प्रतिशत रहा। इन मतों का भौगोलिक वितरण और भविष्य के चुनावों में उनका प्रभाव भी भाजपा की रणनीति के लिए अध्ययन का विषय रहेगा।
सामने लंबी राजनीतिक तैयारी
पवन साय की नियुक्ति को केवल संगठनात्मक फेरबदल के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। यह झारखंड में भाजपा के संगठन को चुनावी अनुभवों के आधार पर पुनर्गठित करने की कोशिश भी है। हालांकि इसका परिणाम तत्काल दिखाई देगा, ऐसा मानना जल्दबाजी होगी। संगठन का पुनर्निर्माण समय लेने वाली प्रक्रिया है।
साय के सामने सबसे पहले कार्यकर्तार्ओ तक पहुंचने और राज्य के अलग-अलग क्षेत्रों की राजनीतिक वास्तविकता समझने की जरूरत होगी। संथाल परगना, कोल्हान, दक्षिण छोटानागपुर, पलामू और उत्तरी छोटानागपुर—हर क्षेत्र की अपनी राजनीतिक प्राथमिकताएं हैं। एक समान रणनीति की जगह क्षेत्रवार संगठनात्मक दृष्टिकोण अधिक उपयोगी हो सकता है।
कुल मिलाकर, पवन साय के पास संगठनात्मक अनुभव जरूर है, लेकिन झारखंड उनके लिए नयी राजनीतिक परीक्षा की जमीन है। यहां भाजपा का जनाधार मजबूत होने के बावजूद आदिवासी क्षेत्रों में उसका प्रदर्शन, ग्रामीण संगठन की सक्रियता, स्थानीय नेतृत्व के साथ तालमेल और चुनावी मतों को सीटों में बदलने की क्षमता बड़े सवाल बने हुए हैं। इसलिए झारखंड में पवन साय की राह आसान नहीं होगी। उनकी सफलता का आकलन अंतत: इस बात से होगा कि वे संगठन की मौजूद ताकत को राज्य की विविध सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियों के अनुरूप कितनी प्रभावी ढंग से ढाल पाते हैं।

