रांची। जिन पुस्तकों का विमोचन हुआ है, उसमें महाजनी आंदोलन के संबंध में लिखा गया है। इस प्रथा का अंत भी हुआ। झारखंड अलग राज्य के लिए हमने आंदोलन किया। आज हम सब अलग झारखंड राज्य में हैं। समाज में उन्नति बोलने से नहीं करने से आयेगी। अभी तक आदिवासियों, किसानों तथा मजदूरों को उनका पूरा हक नहीं मिल पाया है। सोमवार को अपने 77वें जन्मदिन पर आर्यभट्ट सभागार में अपने जीवन संघर्ष से जुड़ी तीन पुस्तकों के विमोचन समारोह में ये बातें राज्यसभा सांसद और झामुमो के केंद्रीय अध्यक्ष शिबू सोरेन ने कहीं। यह पुस्तक लिखी है पत्रकार अनुज सिन्हा ने। महाजनी प्रथा के खिलाफ किये गये अपने आंदोलन के संबंध में शिबू सोरेन ने कहा कि आंदोलन के दौरान सैकड़ों मुकदमे लड़े गये। किसानों के हक के लिए प्रयास किया जाता रहा। फिर एक दिन मेहनत करनेवालों के खेत से धान खलिहान और फिर खलिहान से घर आया। आदिवासी समाज में शिक्षा को लेकर जागरूकता से संबंधित कई कार्यक्रम का आयोजन किया गया। शराब और हड़िया के खिलाफ भी लोगों को जागरूक किया गया। श्री सोरेन ने कहा कि जंगल संरक्षण की दिशा में भी काम होना चाहिए।
संघर्ष रंग लाया, जीत हमारी हुई
शिबू सोरेन ने कहा कि जब हम महाजनों का शोषण देख रहे थे , उसी समय हमने तय किया था कि हम महाजनी प्रथा के खिलाफ लड़ाई छेड़ेंगे और उसमें जीत भी हमारी ही होगी। उन्होंने कहा कि महाजन आदिवासियों को सूद के चंगुल में इस कदर फंसा देते थे कि वह कभी चुकता ही नहीं होता था। पीढ़ी-दर पीढ़ी सूद चुकाते-चुकाते आदिवासी समाज शोषण की चक्की में पिस रहा था। यह स्थिति बदलनी जरूरी थी इसलिए आंदोलन शुरू किया गया। हमने तय कर लिया था कि आंदोलन के दौरान जेल भी जाना पड़े तो जायेंगे, जेल भी देखना चाहिए। जेल से लोग डरते हैं जबकि ऐसी कोई बात नहीं है। पुलिस आंदोलनकारियों को पैसा लेकर जेल भेजती थी। धनकटनी करनेवालों पर धारा 379 लगायी जाती थी। हमारा संघर्ष रंग लाया और आंदोलन में जीत हमारी हुई।
इन पुस्तकों का हुआ लोकार्पण : दिशोम गुरु: शिबू सोरेन, ट्राइबल हीरो : शिबू सोरेन और सुनो बच्चों, आदिवासी संघर्ष के नायक शिबू सोरेन (गुरुजी) की गाथा

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