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    Home»Jharkhand Top News»जयपाल सिंह मुंडा की 123वीं जयंती: आदर्श गांव ‘टकरा’ में आज भी अधूरा है विकास का सपना
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    जयपाल सिंह मुंडा की 123वीं जयंती: आदर्श गांव ‘टकरा’ में आज भी अधूरा है विकास का सपना

    shivam kumarBy shivam kumarJanuary 3, 2026No Comments3 Mins Read
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    खूंटी। भारतीय राजनीति के पुरोधा, संविधान सभा के सदस्य और हॉकी के जादूगर मारंग गोमके जयपाल सिंह मुंडा की आज 123वीं जयंती मनाई जा रही है। खूंटी संसदीय क्षेत्र के पहले सांसद और 1928 ओलंपिक में भारत को पहला स्वर्ण पदक दिलाने वाले इस महानायक के पैतृक गांव ‘टकरा’ में आज उत्सव का माहौल तो है, लेकिन इस चमक-धमक के पीछे विकास की एक कड़वी सच्चाई भी छिपी है। करीब एक दशक पहले इस गांव को ‘आदर्श ग्राम’ बनाने का जो सपना दिखाया गया था, वह आज भी फाइलों और अधूरी घोषणाओं के बीच दम तोड़ रहा है।

    घोषणाओं का अंबार, हकीकत में लाचारी साल 2015 में तत्कालीन मुख्यमंत्री रघुवर दास ने टकरा गांव को गोद लेते हुए इसे एक मॉडल विलेज के रूप में विकसित करने का वादा किया था। सरकार ने कागजों पर मिनी हॉकी स्टेडियम, अस्पताल भवन, मिनी जिम और सोलर जलमीनार जैसी योजनाओं की लंबी फेहरिस्त तैयार की। लेकिन आज जमीन पर स्थिति इसके उलट है। गांव के मुहाने पर जयपाल सिंह मुंडा की प्रतिमा तो लगी है, लेकिन गांव की गलियां और बुनियादी ढांचा आज भी उपेक्षा का शिकार है।

    हॉकी के मसीहा के गांव में हॉकी ही गायब सबसे विडंबनापूर्ण स्थिति खेल संसाधनों की है। जिस महापुरुष ने विश्व पटल पर भारतीय हॉकी का लोहा मनवाया, उनके ही गांव में बना ‘मिनी हॉकी स्टेडियम’ इस कदर जर्जर है कि वहां हॉकी खेलना मुमकिन नहीं है। वर्तमान में स्टेडियम के नाम पर केवल एक मैदान बचा है जहां बच्चे फुटबॉल खेलते हैं। खेल प्रेमियों और स्थानीय ग्रामीणों के लिए यह किसी अपमान से कम नहीं है।

    उपेक्षा का शिकार समाधि स्थल जयपाल सिंह मुंडा की समाधि स्थल, जो पूरे राज्य के लिए एक प्रेरणा केंद्र होना चाहिए था, आज अपनी बदहाली पर आंसू रो रहा है। पिछले दो सालों से इसकी रंगाई-पुताई तक नहीं की गई है। देखरेख के अभाव में दीवारें काली पड़ चुकी हैं, जो शासन और प्रशासन की संवेदनशीलता पर गंभीर सवालिया निशान खड़े करती हैं।

    पुत्र का छलका दर्द: “सिर्फ जयंती पर याद आते हैं पिता” जयपाल सिंह मुंडा के पुत्र जयंत जयपाल सिंह मुंडा ने अपनी पीड़ा साझा करते हुए कहा कि हर साल 3 जनवरी को राजनेताओं का जमावड़ा लगता है और बड़ी-बड़ी घोषणाएं की जाती हैं, लेकिन उन पर अमल करने में दशकों बीत जाते हैं। उन्होंने बताया कि गांव की शिक्षा व्यवस्था इतनी खराब है कि उनके परिवार को स्वयं गांव के बच्चों को शिक्षित करने का बीड़ा उठाना पड़ा है। हालांकि उन्होंने जयपाल सिंह मुंडा स्कॉलरशिप की तारीफ की, लेकिन यह भी जोड़ा कि इसका लाभ राज्य के मुट्ठी भर आदिवासी बच्चों को ही मिल पा रहा है।

    जयंती समारोह और दिग्गजों का आगमन आज जयंती के मौके पर टकरा गांव में राजनीतिक दिग्गजों का तांता लगा रहेगा। सांसद कालीचरण मुंडा, विधायक राम सूर्या मुंडा, पूर्व केंद्रीय मंत्री अर्जुन मुंडा और नीलकंठ सिंह मुंडा जैसे नेता श्रद्धासुमन अर्पित करने पहुंचेंगे। सांस्कृतिक कार्यक्रम और खेल प्रतियोगिताओं का आयोजन भी होगा, लेकिन ग्रामीणों के मन में एक ही सवाल है— क्या इस बार की घोषणाएं भी पिछली बार की तरह अधूरी रह जाएंगी?

    जयपाल सिंह मुंडा ने लगातार पांच बार खूंटी का प्रतिनिधित्व किया और झारखंड आंदोलन की नींव रखी। आज उनके आदर्श गांव की यह स्थिति झारखंड के विकास के दावों की पोल खोलती है।

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