काठमांडू: नेपाल की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक पार्टी ‘नेपाली कांग्रेस’ इस समय अपने सबसे गहरे राजनीतिक संकट से गुजर रही है। पार्टी को विभाजन से बचाने के लिए सभापति शेरबहादुर देउवा और असंतुष्ट पक्ष के बीच पिछले दो दिनों से जारी दूसरे स्तर के नेताओं की बातचीत बेनतीजा रही है। दोनों पक्ष अपने-अपने रुख पर अड़े हुए हैं, जिससे पार्टी में फूट पड़ने की आशंका प्रबल हो गई है।
महाधिवेशन को लेकर छिड़ा ‘धर्मयुद्ध’ विवाद की मुख्य जड़ 11-12 जनवरी को भृकुटीमंडप में प्रस्तावित ‘विशेष महाधिवेशन’ है। महामंत्री गगन थापा और विश्वप्रकाश शर्मा के नेतृत्व वाला असंतुष्ट पक्ष हर हाल में महाधिवेशन कराने पर अड़ा है। उनका दावा है कि पार्टी विधान के अनुसार 40% की जगह 54% प्रतिनिधियों के हस्ताक्षर जुटाए जा चुके हैं, जिससे महाधिवेशन बुलाना अनिवार्य है। वहीं, देउवा पक्ष इसे पार्टी को विभाजित करने की साजिश बताते हुए पहले महाधिवेशन स्थगित करने की शर्त रख रहा है।
निर्वाचन आयोग की भूमिका इस बीच मामला निर्वाचन आयोग तक पहुंच गया है। आयोग के प्रवक्ता नारायणप्रसाद भट्टराई ने कहा कि वे पार्टी की गतिविधियों पर नजर रख रहे हैं, लेकिन फिलहाल इसे आंतरिक लोकतांत्रिक मामला मानकर हस्तक्षेप नहीं कर रहे हैं। काठमांडू में देशभर से प्रतिनिधियों का जुटना शुरू हो गया है, जिससे माहौल तनावपूर्ण बना हुआ है। वरिष्ठ नेता शेखर कोइराला भी समाधान की तलाश में लगातार बैठकें कर रहे हैं, लेकिन फिलहाल कोई ठोस रास्ता निकलता नहीं दिख रहा है।

