दुमका: झारखंड का ऐतिहासिक जनजातीय हिजला मेला शुक्रवार की शाम शुरू हो गया. दुमका शहर से चार किमी दूर मयूरक्षी नदी के तट और हिजला पहाड़ी के बीच की मनोरम भूमि पर आदिवासी पारंपरिक वाद्ययंत्र सिंगा और सकवा के वादन, झिंझरी गायन और पायका नृत्य के साथ इस मेले की शुरुआत हुई. मेले का उद्घाटन इस बार भी हिजला के ग्राम प्रधान ने किया. उद्घाटन के अवसर पर संताल परगना के प्रमंडलीय आयुक्त के अलावा दुमका के उपायुक्त, एसपी, अन्य अधिकारी और जनप्रतिनिधि मौजूद थे. यह मेला 17 फरवरी तक चलेगा.

हिजला मेले इस साल अपनी 127 साल गिरह मना रहा है. 1855 में ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ संताल विद्रोह हुआ था, जिसका अंग्रेजी प्रशासन ने रंक्तरंजित दमन किया था.

इससे प्रशासन और आदिवासी समाज के बीच दूरी बन गयी थी. इस दूरी को कम करने के लिए 1889 में दुमका के तत्कालीन उपायुक्त बी कास्टियार्स ने इस मेले की शुरुआत की थी. तब से यह मेला हर साल इसी स्थान पर लगता आ रहा है. आजादी के पहले तक यह मेला संताल परगना के विकास के लिए नियम और योजना बनाने का महत्वपूर्ण अवसर था. संताल परगना काश्तकारी कानून भी इसी मेले में बहस का परिणाम था.

मेले में इस साल भी कृषि, पशुपालन, हस्तशिल्प, ग्रामीण विकास, सूचना, स्वास्थ्य और तकनीक से संबंधित प्रदर्शनी लगायी गयी है. मेला क्षेत्र में झारखंड और दूसरे राज्यों के 108 कलाकार दल सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत करेंगे. आज से हिजला मेला खेलकूद सप्ताह भी शुरू हुआ.

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