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    Home»Top Story»बंगला का मोह नहीं छोड़ पा रहे पूर्व ‘माननीय’
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    बंगला का मोह नहीं छोड़ पा रहे पूर्व ‘माननीय’

    azad sipahi deskBy azad sipahi deskFebruary 7, 2020No Comments5 Mins Read
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    बंगला को लेकर ‘माननीयों’ का मोह पुराना है। ज्यादातर ‘माननीय’ चुनाव हारकर या कुर्सी से बेदखल होकर ‘पूर्व’ हो जाने के बाद भी सरकारी बंगले का मोह नहीं छोड़ पाते। झारखंड में भी कुछ ऐसे ही हालात हैं। सत्ता परिवर्तन के बाद से जो नयी सरकार बनी है, उसमें नवचयनित विधायकों और मंत्रियों के लिए आवास की व्यवस्था करना विधानसभा के लिए टेढ़ी खीर बनता जा रहा है, क्योंकि ज्यादातर पूर्व मंत्रियों और विधायकों ने अभी तक अपना आवास खाली नहीं किया है। बार-बार नोटिस दिये जाने के बाद भी पूर्व मंत्री और विधायक बंगला खाली नहीं करना चाहते। वैसे झारखंड में ‘पूर्व’ की हैसियत वालों का भी खास खयाल रखे जाने का चलन है। शीर्ष अदालत पूर्व मुख्यमंत्रियों को आवास आवंटित किये जाने को अवैध घोषित कर चुकी है। अदालती आदेश पर यूपी जैसे राज्यों में पूर्व मुख्यमंत्रियों के सरकारी आवास खाली कराये जा चुके हैं, लेकिन झारखंड में यह चलन बरकरार है। झारखंड में सरकारी बंगले और आवास के लिए मची होड़ पर नजर डालती दयानंद राय की रिपोर्ट।

    बड़े बंगलों पर टिकी हैं नये विधायकों-मंत्रियों की निगाहें
    एक बंगला मिले न्यारा…. ! झारखंड के मंत्रियों और विधायकों में बंगला या बंगले जैसा सरकारी आवास हासिल करने की तमन्ना जोर मारने लगी है। वहीं, रघुवर सरकार में जिन मंत्रियों और विधायकों को बंगला या बंगले जैसा आवास आवंटित हुआ था, वे इसे खाली करने में ना-नुकूर कर रहे हैं। बंगले और सरकारी आवास का मोह उनमेें इतना घर कर गया है कि इसे छोड़ने में उन्हें परेशानी हो रही है। झारखंड सरकार में आदिवासी कल्याण और परिवहन मंत्री चंपई सोरेन के पुत्र अपने पिता के लिए न्यारा बंगला चाहते हैं।
    चाहत इस कदर बढ़ी कि वह पूर्व मंत्री और चंदनकियारी के विधायक अमर बाउरी के डिप्टीपाड़ा स्थित आवास में बेडरूम देखने पहुंच गये। उनका कहना था कि वे चंपाई सोरेन टास्क फोर्स के लोग हैं और आवास का मुआयना करना चाहते हैं। हेमंत सोरेन के साथ 29 दिसंबर को झारखंड के कैबिनेट मंत्री के रूप में शपथ लेनेवाले आलमगीर आलम को जहां नीलकंठ सिंह मुंडा का बंगला पसंद है, वहीं डॉ रामेश्वर उरांव को एक पूर्व मंत्री का बंगला पसंद आया है।

    खाली नहीं किया है आवास
    ज्यादातर पूर्व मंत्रियों और विधायकों ने अपना आवास खाली नहीं किया है। ऐसे में हेमंत सरकार के मंत्रियों और राज्य के नवनिर्वाचित विधायकों को आवास का आवंटन करना मुश्किल काम हो गया है। आवास खाली न होने से परेशान होकर विधानसभा प्रशासन ने पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास समेत 39 पूर्व विधायकों को फिर से आवास खाली करने का नोटिस दिया है। पूर्व में उन्हें दस दिनों का समय दिया गया था, पर उन्होंने आवास खाली नहीं किया। इसके बाद उन्हें सात दिनों का समय और दिया गया है। मुख्यमंत्री रघुवर दास की बात करें तो उन्होंने मुख्यमंत्री आवास तो खाली कर दिया पर उन्होंने पूर्व मुख्यमंत्री की हैसियत से राजधानी में आवास आवंटित करने का आवेदन दिया है। हालांकि उनके आवेदन पर सरकार की ओर से कोई निर्णय नहीं लिया गया है। रघुवर दास एचइसी सेक्टर तीन स्थित एफ टाइप आवास संख्या 33 में रह रहे हैं। झारखंड का मुख्यमंत्री बनने के पूर्व उन्हें यह आवास आवंटित किया गया था।
    शुचिता का भी ध्यान नहीं रखते मंत्री-विधायक
    नियमों का तकाजा यह है कि मंत्री पद से हटते या फिर विधायकी खत्म होते ही इन्हें सरकारी आवास खाली कर देना चाहिए। पर सरकारी बंगले या आवास का मोह इन्हें ऐसा घेरता है कि फिर इसे छोड़ना उनके लिए मुश्किल हो जाता है। नतीजा यह होता है कि जो नये विधायक जीत कर आते हैं उन्हें आवास आवंटित करना मुश्किल होता जाता है। झारखंड की राजनीति के जानकारों का कहना है कि एक बार जो जनप्रतिनिधि मंत्री या विधायक बन जाते हैं, उनमें विशेषाधिकार का भाव आ जाता है। मंत्री पद से हटने और विधायकी जाने के बाद भी उनमें यह भाव बना रहता है और इससे वे उबर नहीं पाते। ऐसे में उनके लिए बंगले या आवास खाली करना मुश्किल हो जाता है। हालांकि सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर गौर करें तो पूर्व मुख्यमंत्रियों को बंगला या सरकारी आवास देने का प्रावधान नहीं है, पर इसका झारखंड में अनुपालन नहीं होता। पटना हाईकोर्ट ने बीते वर्ष राज्य के पूर्व मुख्यमंत्रियों को मिलनेवाली सरकारी सुविधा पर एक बड़ा फैसला सुनाया था। इस फैसले के तहत राज्य के पूर्व मुख्यमंत्रियों को मिलनेवाले सरकारी आवास की सुविधा समाप्त कर दी गयी थी। इस संबंध में अपने फैसले में हाइकोर्ट ने कहा था कि यह सुविधा असंवैधानिक और आम जनता की गाढ़ी कमाई का दुरुपयोग है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया था कि पद से हटने के बाद इस तरह की सुविधाएं दिया जाना गलत है। इसी तरह के एक फैसले में नैनीताल हाइकोर्ट ने उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्रियों को आजीवन आवास आवंटन असंवैधानिक और अवैध बताया था तथा पूर्व मुख्यमंत्रियों को छह माह के भीतर बकाया किराया बाजार दर से जमा करने का आदेश दिया था।
    इधर, पूर्व के मंत्रियों और विधायकों के द्वारा आवास खाली न करने के कारण हुसैनाबाद से जीतकर आये कमलेश सिंह जहां लालपुर स्थित अपने आवास में रह रहे हैं, वहीं छतरपुर विधायक पुष्पा देवी गौरीशंकर नगर स्थित अपने किराये के आवास में रह रही हैं। बड़कागांव से जीतकर विधायक बनी अंबा प्रसाद को भी आवास उपलब्ध न कराये जाने के कारण असुविधा हो रही है। वहीं, पूर्व मंत्री और विधायक विधानसभा से मिली सात दिनों की मोहलत पूरी होने से पहले बंगला और सरकारी आवास खाली करने के मूड में नहीं हैं।
    इन्हें भेजा गया है आवास खाली करने का नोटिस
    रघुवर दास, ताला मरांडी, साइमन मरांडी, अशोक कुमार, जानकी प्रसाद, मनोज कुमार यादव, निर्मला देवी, गणेश गंझू, जय प्रकाश सिंह भोक्ता, राजकुमार यादव, नागेंद्र महतो, जय प्रकाश वर्मा, निर्भय कुमार शाहाबादी, बबीता देवी, नागेश्वर महतो, फूलचंद मंडल अरूप चटर्जी, संजीव सिंह, राजकिशोर महतो,कुणाल षाडंगी, लक्ष्मण टुडू, मेनका सरदार, रामचंद्र सहिस, साधुचरण महतो, शशिभूषण सामड, सीमा देवी, रामकुमार पाहन, जीतूचरण राम, गंगोत्री कुजूर, पौलूस सुरीन, शिवशंकर उरांव, विमला प्रधान, सुखदेव भगत, हरिकृष्ण सिंह, प्रकाश राम, देवेंद्र कुमार सिंह, राधाकृष्ण किशोर, कुशवाहा शिबपूजन मेहता और सत्येंद्र नाथ तिवारी।

    Former 'Honorable' unable to give up the bungalow
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